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5 + Rahasyamayi Prachin Tantra Vidya Pdf / रहस्यमयी प्राचीन तंत्र विद्या PDF

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Rahasyamayi Prachin Tantra Vidya Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Rahasyamayi Prachin Tantra Vidya Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी Pdf पढ़ सकते हैं।

 

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Rahasyamayi Prachin Tantra Vidya Pdf / रहस्यमयी प्राचीन तंत्र विद्या पीडीऍफ़ 

 

 

 

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महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी Pdf
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र हिंदी Pdf यहां से डाउनलोड करे।
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Rahasyamayi Prachin Tantra Vidya Pdf
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Note- इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी पीडीएफ बुक, पीडीएफ फ़ाइल से इस वेबसाइट के मालिक का कोई संबंध नहीं है और ना ही इसे हमारे सर्वर पर अपलोड किया गया है।

 

 

 

यह मात्र पाठको की सहायता के लिये इंटरनेट पर मौजूद ओपन सोर्स से लिया गया है। अगर किसी को इस वेबसाइट पर दिये गए किसी भी Pdf Books से कोई भी परेशानी हो तो हमें [email protected] पर संपर्क कर सकते हैं, हम तुरंत ही उस पोस्ट को अपनी वेबसाइट से हटा देंगे।

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्याम और गौर वर्ण है, सुंदर किशोर अवस्था है, दोनों ही परम सुंदर और शोभा के धाम है। शरत पूर्णिमा के समान इनके मुख और शरद ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र है।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- हे सुमुखि! कहो तो अपनी सुंदरता से करोडो कामदेवों को लज्जित करने वाले, ए तुम्हारे कौन है? उनकी ऐसी प्रेम से भरी वाणी सुनकर और सकुचाते हुए मन ही मन मुसकरायी।

 

 

 

2- उत्तम (गौर) वर्ण वाली सीता जी उनको देखकर संकोच वश पृथ्वी की ओर देखती है। वह दोनों तरफ से ही संकोच से घिर गई अर्थात गांव की स्त्रियो को नहीं बताने पर दुःख होने का संकोच है और बताने में लज्जा रूपी संकोच है। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्र वाली और कोयल की जैसी वाणी वाली सीता जी लजाते हुए प्रेम सहित वचन बोली।

 

 

 

3- यह जो सहज स्वभाव, सुंदर और गौर शरीर के है, उनका नाम लक्ष्मण है यह मेरे छोटे देवर है। फिर सीता जी लज्जा वश अपने चंद्र मुख को आंचल से ढकते हुए और प्रियतम श्री जी की ओर देखकर भौहे टेढ़ी करके।

 

 

 

4- खंजन पक्षी के सुंदर नेत्रों के समान अपने नेत्रों को तिरछा करके सीता जी ने इशारे से उन्हें कहा कि यह (श्री राम जी) मेरे पति है। यह जानकर गांव की सब युवती स्त्रियां इस प्रकार आनंदित हुई मानो कंगालों ने धन की राशियां लूट ली हो।

 

 

 

117- दोहा का अर्थ-

 

 

 

वह सब अत्यंत प्रेम से सीता जी के पैरो में पड़ते हुए बहुत प्रकार से आशीष देती है और शुभकामना करती है कि जब तक शेष जी के सिर पर पृथ्वी रहे तब तक तुम सदा ही सुहागिन बनी रहो।

 

 

 

मुनि को चिंता हुई कि हमने बहुत बड़े मेहमान को न्योता (निमंत्रण) दिया है। अब जैसा देवता हो उसी के अनुरूप ही उसकी पूजा भी होनी चाहिए। यह सुनकर सभी सिद्धियां (अविमा, लघुमा, महिमा इत्यादि) आ गई और बोली हे गोसाई! जो आपकी आज्ञा हो वह हम करे।

 

 

 

 

माता की करतूत को समझकर तुम अपने मन में ग्लानि मत करो। हे तात! कैकेयी का कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी।

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- यह कहते भी कोई अच्छा न कहेगा क्योंकि लोक और वेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है। किन्तु हे तात! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों ही बड़ाई पाएंगे।

 

 

 

 

2- यह लोक और वेद दोनों को मान्य है और सब यही कहते है कि पिता जिसको राज्य दे उसे ही मिलता है। राजा सत्यव्रती थे तुमको बुलाकर राज्य देते तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती।

 

 

 

 

3- सारे अनर्थ की जड़ तो श्री राम जी का वनगमन है, जिसे सुनकर समस्त संसार को पीड़ा हुई। वह श्री राम का वनगमन भी तो भावी वश हुआ। बेसमझ रानी रानी तो भावीवश कुचाल करके अंत में पछतायी।

 

 

 

 

4- उसमे भी तुम्हारा कोई तनिक भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हे दोष न होता। बल्कि श्री राम जी को सुनकर भी संतोष होता।

 

 

 

 

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