Radheshyam Ramayan / Gita Press Gorakhpur / Ashtavakra Gita

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Radheshyam Ramayan Pdf 

 

 

 

1- राधेश्याम रामायण पीडीएफ भाग १

 

2- राधेश्याम रामायण पीडीऍफ़ भाग २ 

 

3- राधेश्याम रामायण पीडीएफ भाग ३ 

 

 

 

Gita Press Gorakhpur

 

 

1- सम्पूर्ण महाभारत हिंदी डाउनलोड

 

2-  मनुस्मृति Book PDF फ्री डाउनलोड

 

3- पिता की सीख  Gita Press Pdf

 

4- प्राचीन भक्त 

 

5- भक्त – सौरभ 

 

6- भागवतरत्न प्रह्लाद 

 

7- प्रेम संगीत 

 

8- गर्भ गीता 

 

9- दश महाविद्या 

 

10- अध्यात्म ज्ञानेश्वरी 

 

11- आदर्श रामायण 

 

12- कूर्म पुराण पीडीएफ

 

13- Shiv Puran Gita Press Gorakhpur Pdf शिव पुराण गीता प्रेस गोरखपुर Pdf Download

 

14- मनुस्मृति गीता प्रेस गोरखपुर पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

 

अष्टवक्र गीता पीडीएफ फ्री

 

 

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शरीर के लिए शोक करना व्यर्थ – श्री कृष्ण कहते है – यह आत्मा शाश्वत, अकल्पनीय तथा अपरिवर्तनीय कहा जाता है। यह जानकर तुम्हे शरीर के लिए शोक नहीं करना चाहिए।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि आत्मा इतना सूक्ष्म है कि इसे सर्वाधिक शक्तिशाली, सूक्ष्मदर्शी यंत्र से भी नहीं देखा जा सकता है अतः यह अदृश्य है। जहां तक आत्मा के अस्तित्व का संबंध है श्रुति के प्रमाण के अतिरिक्त अन्य किसी प्रयोग के द्वारा उसके (आत्मा) के अस्तित्व को सिद्ध नहीं किया जा सकता है। हमे अनेक बातें केवल उच्च प्रमाण के आधार पर ही माननी पड़ती है। कोई भी अपनी माता के आधार पर अपने पिता के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं कर सकता है। पिता स्वरुप को जानने का साधन या प्रमाण एक मात्र माता है। हमे इस सत्य को स्वीकार करना पड़ता है कि अनुभवगम्य सत्य होते हुए भी आत्मा के अस्तित्व को समझने के लिए कोई अन्य साधन या विकल्प उपलब्ध नहीं है।

 

 

 

 

 

इसी प्रकार से आत्मा को समझने के लिए वेदाध्ययन ही एकमात्र विकल्प है अन्य दूसरा साधन नहीं है। दूसरे शब्दों में आत्मा मानवीय व्यावहारिक ज्ञान द्वारा अकल्पनीय है। आत्मा में शरीर के जैसा परिवर्तन नहीं होता है। मूलतः अधिकारी रहते हुए आत्मा अनंत परमात्मा की तुलना में अणु रूप है। आत्मा चेतना है और चेतन है। वेदो के इस कथन को हमे स्वीकार करना पड़ेगा। परमात्मा अनंत है और आत्मा अति सूक्ष्म होता है। अतः अतिसूक्ष्म आत्मा अधिकारी होने के कारण अनंत आत्मा भगवान के तुल्य नहीं हो सकता है। यही भाव वेदो में भिन्न भिन्न प्रकार से आत्मा के स्थायित्व की पुष्टि करने के लिए दुहराया गया है। किसी बात का दुहराना उस तथ्य को बिना त्रुटि के समझने के लिए आवश्यक होता है।

 

 

 

 

26- अर्जुन की सोच (आत्मा सदा जन्मता मरता है) -श्री कृष्ण कहते है कि यदि तुम (अर्जुन) सोचते हो कि आत्मा (अथवा जीवन का लक्षण) सदा जन्म लेता है तथा सदा मरता है तो भी हे महाबाहु ! तुम्हारे शोक करने का कोई भी कारण नहीं है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि अर्जुन को आत्मा के अस्तित्व में विश्वास ही था जैसा कि वैभाविक दर्शन में होता है, तो भी उसके शोक करने का कोई कारण नहीं था। कोई भी मानव थोड़े से रसायनो की क्षति के लिए शोक नहीं करता है और अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हो जाता है। दूसरी ओर आधुनिक विज्ञान तथा वैज्ञानिक युद्ध में शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए न जाने कितने टन रसायन फूंक देते है। वैभाषिक दर्शन के अनुसार आत्मा शरीर के क्षय होते ही लुप्त हो जाता है।

 

 

 

 

सदा से दार्शनिको का एक ऐसा वर्ग चला आ रहा है जो बौद्ध लोगो के समान ही यह मानने के लिए तैयार नहीं होता है कि शरीर के परे भी आत्मा का स्वतंत्र अस्तित्व होता है। यहां ऐसा प्रतीत होता है कि जब भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता का उपदेश दिया था तो ऐसे दार्शनिक विद्यमान थे और लोकापतिक या वैभाषिक नाम से जाने जाते थे। उनके अनुसार शरीर भौतिक तत्वों का संयोग है और एक अवस्था ऐसी आती है जब भौतिक तथा रासायनिक तत्वों के संयोग से जीवन के लक्षण विकसित हो उठते है।

 

 

 

 

अतः प्रत्येक दशा में अर्जुन इस वैदिक मान्यता को स्वीकार नहीं करता कि अणु-आत्मा का अस्तित्व है या कि वह आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं था। इस सिद्धांत के अनुसार कि पदार्थ से प्रत्येक क्षण अनेक जीव उत्पन्न होते है और नष्ट भी होते रहते है अतः ऐसी घटनाओ के लिए शोक करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

 

 

 

 

कुछ ऐसे दार्शनिको का मत है कि जीवन के लक्षण भौतिक संयोग की परिपक़्व अवस्था में ही घटित होते है। नृतृत्व विज्ञान इसी दर्शन पर आधारित है। सम्प्रति अनेक छद्म धर्म जिनका अमेरिका में प्रचार हो रहा है इसी दर्शन का पालन करते है और साथ ही शून्यवादी बौद्धों का अनुसरण करते है। यदि आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता तो अर्जुन को अपने पितामह तथा गुरु के वध करने के पाप कर्मो से डरने की कोई आवश्यकता नहीं थी। किन्तु साथ ही कृष्ण ने अर्जुन को व्यंग पूर्वक महावहु कहकर सम्बोधित किया क्योंकि उसे वैभाषिक सिद्धांत स्वीकार नहीं था जो वैदिक ज्ञान के प्रतिकूल होता है। क्षत्रिय होने के नाते अर्जुन का संबंध वैदिक संस्कृति से था और वैदिक सिद्धांतो का पालन करना ही या करते रहना ही उसके लिए शोभनीय था।

 

 

 

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