7 + Rabindranath Tagore Books Pdf Hindi / रबिन्द्र नाथ टैगोर बुक्स इन हिंदी

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Rabindranath Tagore Books Pdf Hindi  गीतांजलि Book Pdf Free

 

 

 

 

 

 

1- परी रबीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी

 

2- काबुलीवाला तथा अन्य कहानियां 

 

3- नटी की पूजा 

 

4- चार अध्याय 

 

5- आँख की किरकिरी 

 

6- गीतांजलि Book Pdf Free

 

7- राज सन्यासी 

 

 

 

रबिन्द्र नाथ टैगोर के बारे में 

 

 

Rabindranath Tagore Books Pdf Hindi
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रविंद्रनाथ टैगोर ठाकुर के विषय में जितना शब्द सुमन अर्पित किया जाय उनके सामने बौना ही प्रतीत होता है। जिस प्रकार सूर्य को दीपक ज्योति प्रभावित नहीं कर सकती उसी तरह इस भारत के अमर सपूत को शब्द सुमन और पुरस्कारों से तुलन नहीं की जा सकती है। पुरस्कार और शब्द सुमन खुद मां भारती के अमर सपूत के द्वारा प्रशंसित होने का प्रयास करती है।

 

 

 

 

रविंद्रनाथ ठाकुर का जन्म ‘पश्चिम बंगाल’ में ‘जोर सांकी’ भवन के देवेंद्र नाथ ठाकुर के सबसे छोटे पुत्र के रूप में हुआ था। रावेंद्र नाथ टैगोर को प्रकृति से अगाध प्रेम था। रविंद्र नाथ बचपन से कहानीकार, नाटककार, कवि, चित्रकार और कविता लिखने के शौकीन थे।

 

 

 

रवीन्द्रनाथ अपने वाल्यकाल से ही प्रकृति प्रेमी थे। उन्होंने अपने वाल्य अवस्था से ही अपनी कविता और कहानीयो को मूर्त रूप देना शुरू कर दिया था। जिसका परिणाम भारत के राष्ट्रगान के रूप में अमर कृति है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने भारतीय संस्कृत को पाश्चात्य देशो से परिचय और पाश्चात्य देशो की संस्कृत को भारत से परिचय कराने का श्रेय जाता है।

 

 

 

 

निबंधकार, संगीतकार, चित्रकार होना उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाता है। रवीन्द्रनाथ को दुनिया गुरुदेव उपनाम से जानती है। उनकी अमर रचना ‘गीतांजलि’ है जिसे 1913 में नॉवेल पुरस्कार विजेता घोषित किया गया है।

 

 

 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर भारत ही नहीं दुनिया के एक मात्र ऐसे कवि है। जिनकी दो रचनाए दो देशो का प्रतिनिधित्व ‘जन-गण मन भारत का’ और दूसरा ‘आमार सोनार बांग्ला देश’ बांग्लादेश का करती है। इनकी गीतांजलि नामक कृति का विश्व की अनेक भाषाओ में अनुवाद हो चुका है।

 

 

 

 

 

दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

कर्म की बारीकियों को समझाना (कृष्ण द्वारा) – कृष्ण कह रहे है – हे अर्जुन, मनुष्य के लिए कर्म की बारीकियों को समझना बहुत ही गूढ़ है। मनुष्य समझ ही नहीं पाता कि कर्म, अकर्म, विकर्म क्या है उसे कर्म अकर्म तथा विकर्म को भली भांति समझने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए जिससे उसके भवबंधन की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जिसने यह भली प्रकार से समझ लिया है कि जीवात्मा, श्री भगवान का नित्यदास है। फलस्वरूप उसे कृष्ण भावनामृत में ही कार्य करना श्रेयस्कर है। सम्पूर्ण भगवद्गीता का यही परम् लक्ष्य है।

 

 

 

दूसरे शब्दों में, यदि कोई मनुष्य सत्य ही भवबंधन से अपनी मुक्ति चाहता है तो उसे कर्म, अकर्म और विकर्म के भेद को भली भांति ही समझना होगा। कर्म अकर्म तथा विकर्म के विश्लेषण की आवश्यकता है क्योंकि यह अत्यंत ही गहन विषय है। यहां कृष्ण भावनामृत को तथा गुणों के अनुसार कर्म को समझने के लिए परमेश्वर के साथ अपने संबंधो को जानना ही होगा, अन्यथा कर्म अकर्म तथा विकर्म को समझना असंभव ही होगा।

 

 

 

 

इस कृष्ण भावनामृत के विरुद्ध सारे निष्कर्ष एवं परिणाम विकर्म तथा निष्क्रिय कर्म की श्रेणी में आते है या फिर निसिद्ध कर्म कह सकते है। इसे समझने के लिए मनुष्य को कृष्ण भावनामृत के अधिकारियो की संगति अनिवार्य रूप से करनी होती है और उनसे ही इस गूढ़ रहस्य को समझने का अनवरत प्रयास करना चाहिए। इस समझने की प्रक्रिया को साक्षात् भगवान से समझने के समान ही है, अन्यथा बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी मोहग्रस्त हो जाता है।

 

 

 

 

 

18- कर्म अकर्म को समझना – यहां पर कृष्ण कह रहे है, हे कुंती पुत्र अर्जुन ! जो मनुष्य कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म को दृष्टिगत करता है वह सभी मनुष्यो में बुद्धिमान है और सब प्रकार के कर्मो में प्रवृत्त रहकर भी दिव्य स्थित में स्थित रहता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अकर्म का अर्थ है – कर्म के फल के बिना। निर्विशेष वादी इस भय से अपने सारे कर्म करना बंद कर देता है कि कर्म फल उसके आत्मसाक्षात्कार में बाधक न हो, किन्तु सगुण वादी की स्थित इससे अलग रहती है। उसे भली प्रकार ज्ञात रहता है कि वह भगवान का नित्य दास है, अतः वह अपने आप को कृष्ण भावनामृत के कार्यो में हमेशा ही तत्पर रखता है।

 

 

 

कृष्ण भावनामृत में कार्यरत प्राणी (व्यक्ति) स्वभावतः कर्म बंधन से सदैव ही मुक्त अवस्था में रहता है क्योंकि वह अपने सारे कर्म कृष्ण को अर्पित कर चुका होता है, अतः कर्म के फल से उसे कोई लाभ या हानि नहीं होती। फलस्वरूप वह मानव समाज में बुद्धिमान होता है। दृष्टिगत रूप से वह यद्यपि कृष्ण के लिए सभी तरह के कर्मो में प्रयुक्त रहता है।

 

 

 

चूंकि सारे कर्म कृष्ण के लिए किए जाते है अतः इस सेवा के करने में उसे दिव्य सुख की अनुभूति होती है। जो इस विधि में लगे रहते है वे व्यक्तिगत इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा से रहित होते है। कृष्ण के प्रति उनका यही नित्य दास्य भाव ही उसे सब प्रकार के कर्म फल से मुक्त रखता है।

 

 

 

 

 

19- कामना से रहित पुरुष के लक्षण – कृष्ण यहां कहते है , हे धनंजय, जो व्यक्ति अपने कर्म के फल से रहित होकर कर्म करता है उसके कर्म अन्य की अपेक्षा अलग ही दिखते है। उसे केवल ज्ञान से युक्त पुरुष ही समझ सकते है। जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रिय तृप्ति की कामना से रहित होता है उसे पूर्ण ज्ञानी समझा जाता है। उसे साधु पुरुष ऐसा कर्ता कहते है। जिसने पूर्ण ज्ञान की अग्नि से कर्म फलो को भस्मसात कर दिया है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्द का तात्पर्य – केवल पूर्ण ज्ञान से युक्त पुरुष ही कृष्ण भावनामृत या कृष्ण भावना भावित व्यक्ति के कार्य कलापो को समझा सकता है। जिसने ऐसा पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह सचमुच ही विद्वान है। ऐसे व्यक्ति में इन्द्रिय तृप्ति की प्रवृत्ति का अभाव रहता है। भगवान के नित्यदासता के इस ज्ञान के विकास की तुलना अग्नि से की गई है। इससे यह समझा जाता है कि भगवान के नित्य दास के रूप में उसे अपने स्वाभाविक स्वरुप का पूर्णतया ज्ञान है। जिसके द्वारा उसने अपने कर्म फलो को भस्म कर दिया है। ऐसी अग्नि एक बार प्रज्वलित हो जाने पर सारे कर्म फलो को भस्म कर सकती है।

 

 

 

 

20- कर्मो के बंधन से मुक्ति – यहां कृष्ण द्वारा अर्जुन को कर्म बंधन से मुक्ति का मार्ग कृष्ण द्वारा बताया जा रहा है। कृष्ण अर्जुन से कहते है , अपने कर्म फलो की सारी आसक्ति को त्यागकर सदैव संतुष्ट तथा स्वतंत्र रहकर वह सभी प्रकार के कार्यो में व्यस्त रहकर भी कोई सकाम कर्म नहीं करता।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो अपने शरीर के निर्वाह के प्रतिभी को आकर्षण नहीं रखता,  वह सदैव ही पूर्ण रूप से कृष्ण पर आश्रित रहता है। .वह व्यक्ति कृष्ण के शरणागत रहने से सदा ही मुक्त रहता है। कर्मो के बंधन से इस प्रकार की मुक्ति तभी संभव है जब मनुष्य कृष्ण भावना भावित होकर अपना हर कार्य कृष्ण के लिए करे। वह व्यक्ति न तो कोई वस्तु प्राप्त करना चाहता है और न ही अपनी किसी वस्तु की रक्षा करना चाहता है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति भगवान के शुद्ध प्रेम वश ही कर्म करता है। फलस्वरूप उसे कर्म फलो के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहता है। वह अपनी पूर्ण सामर्थ्य से अपना कर्तव्य करता है और अपने सारे कार्य कलाप कृष्ण के ऊपर ही छोड़ देता है। ऐसा अनासक्त व्यक्ति शुभ अशुभ कर्म फलो से मुक्त रहता है। मानो वह कुछ भी नहीं कर रहा हो।

 

 

 

यह अकर्म अर्थात निष्काम कर्म का लक्षण है। अतः कृष्ण भावनामृत से रहित कोई भी कार्य-कर्ता पर बंधन स्वरुप होता है और विकर्म का यही असली स्वरुप है। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है है। अतः मनुष्य को अपनी मुक्ति के लिए अपना हर कार्य कृष्ण को समर्पित करके करना चाहिए।

 

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

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