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पृथ्वीराज की आंखे एकांकी / Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से शरद पूर्णिमा व्रत कथा Pdf कर सकते हैं।

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Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf

 

 

पुस्तक का नाम  Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf
पुस्तक के लेखक  राजकुमार वर्मा 
फॉर्मेट  Pdf 
साइज  4 Mb 
पृष्ठ  116 
भाषः   हिंदी 
श्रेणी  साहित्य 

 

 

पृथ्वीराज की आंखे एकांकी Pdf Download

 

 

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Prithviraj ki aankhen ekanki Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये

 

 

सफल राजनीतिज्ञ और प्रतिभा संपन्न साहित्यकार देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म 1884 ई० में बिहार राज्य के छपरा जिले के जीरादेई नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम महादेव सहाय था। इनका परिवार गांव के संपन्न और प्रतिष्ठित कृषक परिवारों में से था। ये अत्यंत मेधावी छात्र थे।

 

 

 

इन्होंने कोलकाता विश्वविद्यालय से एम. ए. और कानून की डिग्री एल.एल.बी. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सदैव प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले राजेंद्र प्रसाद ने मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में अध्यापन कार्य किया। इन्होंने सन् 1911 मैं वकालत शुरू की और सन् 1920 तक कोलकाता और पटना में वकालत का कार्य किया।

 

 

 

उसके पश्चात वकालत छोड़ कर देश सेवा में लग गए। इनका झुकाव प्रारंभ से ही राष्ट्र सेवा की ओर था। सन 1917 में गांधीजी के आदर्शों और सिद्धांतों से प्रभावित होकर इन्होंने चंपारण के आंदोलन में सक्रिय भाग लिया और वकालत छोड़ कर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। अनेक बार जेल की यातनाएं भी भोगीं।

 

 

 

इन्होंने विदेश जाकर भारत के पक्ष को विश्व के सम्मुख रखा। डॉ राजेंद्र प्रसाद तीन बार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभापति और सन् 1962 तक भारत के राष्ट्रपति रहे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ इनके जीवन का मूल मंत्र था। सन् 1962 में इन्हें ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया गया।

 

 

 

जीवन पर्यंत हिंदी और हिंदुस्तान की सेवा करने वाले डॉ राजेंद्र प्रसाद जी का देहावसान 28 फरवरी, 1963 में हो गया। बिहार में अंग्रेज सरकार के नील के खेत थे, सरकार अपने मजदूर को उचित वेतन नहीं देती थी। 1917 में गांधी जी ने बिहार आकर इस समस्या को दूर करने की पहल की।

 

 

 

उसी दौरान डॉ प्रसाद गांधी जी से मिले, उनकी विचारधारा से वे बहुत प्रभावित हुए, 1919 में पूरे भारत में सविनय आंदोलन की लहर थी। गांधी जी ने सभी स्कूल, सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार करने की अपील की। जिसके बाद डॉक्टर प्रसाद ने अपनी नौकरी छोड़ दी।

 

 

 

चंपारण आंदोलन के दौरान राजेंद्र प्रसाद गांधीजी के वफादार साथी बन गए थे। गांधीजी के प्रभाव में आने के बाद उन्होंने अपने पुराने और रूढ़िवादी विचारधारा का त्याग कर दिया और एक नई ऊर्जा के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। 1931 में कांग्रेस ने आंदोलन छेड़ दिया था।

 

 

 

उस दौरान डॉ प्रसाद को कई बार जेल जाना पड़ा। 1934 में उनको मुंबई कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया था। वह एक से अधिक बार अध्यक्ष बनाए गए। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में इन्होंने भाग लिया, जिस दौरान वे गिरफ्तार हुए और नजरबंद रखा गया।

 

 

 

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