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Prerit Karne ke Mission Par Agrasar pdf / प्रेरित करने के मिशन पर अग्रसर Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Prerit Karne ke Mission Par Agrasar pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Prerit Karne ke Mission Par Agrasar pdf कर सकते हैं और आप यहां से Billu Comics Pdf free download कर सकते हैं।

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Prerit Karne ke Mission Par Agrasar pdf Download

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अतः पग-पग पर मेरे लिए शुभ परिणाम का विस्तार होगा। शंभो! आप शुभ के आधार है। जिसकी आपमें सुदृढ़ भक्ति है उसी को हमेशा विजय प्राप्त होती है और उसी का दिनोदिन शुभ होता है। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! उसकी यह बात सुनकर सर्वमंगल के पति भगवान शिव बहुत संतुष्ट हुए और वीरभद्र! तुम्हारी जय हो ऐसा आशीर्वाद देकर वे फिर बोले।

 

 

 

मेरे पार्षदों में श्रेष्ठ वीरभद्र! ब्रह्मा जी का पुत्र बड़ा दुष्ट है। उस मुर्ख को बड़ा घमंड हो गया है। अतः इन दिनों वह विशेषरूप से मेरा विरोध करने लगा है। दक्ष इस समय एक यज्ञ करने के लिए उद्यत है। तुम याग परिवारसहित उस यज्ञ को भस्म करके फिर शीघ्र मेरे स्थान पर लौट आओ।

 

 

 

यदि देवता, गंधर्व, यक्ष अथवा अन्य कोई तुम्हारा सामना करने के लिए उद्यत हो तो उन्हें भी आज शीघ्र ही और सहसा भस्म कर डालना। दधीचि की दिलाई हुई मेरी शपथ का उल्लंघन करके जो देवता आदि वहां ठहरे हुए है उन्हें तुम निश्चय ही प्रयत्नपूर्वक जलाकर भस्म कर देना।

 

 

 

जो मेरी शपथ का उल्लंघन करके गर्वयुक्त हो वहां ठहरे हुए है वे सब के सब मेरे द्रोही है। अतः उन्हें अग्निमयी माया से जला डालो। दक्ष की यज्ञशाला में जो अपनी पत्नियों और सारभूत उपकरणों के साथ बैठे हो उन सबको जलाकर भस्म कर देने के पश्चात फिर शीघ्र लौट आना।

 

 

 

तुम्हारे वहां जाने पर विश्वेदेव आदि देवगण भी यदि सामने आ तुम्हारी सादर स्तुति करे तो भी तुम उन्हें शीघ्र ही आग की ज्वाला से जलाकर ही छोड़ना। वीर! वहां दक्ष आदि सब लोगो की पत्नी और बंधु बांधवो सहित जलाकर जल को लीला पूर्वक पी जाना।

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – नारद! जो वैदिक मर्यादा के पालक तथा सबके ईश्वर है वे भगवान रूद्र रोष से लाल आँखे किए महावीर वीरभद्र से ऐसा कहकर चुप हो गए। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! महेश्वर के इस वचन को सुनकर वीरभद्र बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने महेश्वर को प्रणाम किया।

 

 

 

तत्पश्चात उन देवाधिदेव की उपर्युक्त आज्ञा को शिरोधार्य करके वीरभद्र वहां से शीघ्र ही दक्ष के यज्ञ मंडप की ओर चले। भगवान शिव ने केवल शोभा के लिए उनके साथ करोडो महावीर गणो को भेज दिया जो प्रलयाग्नि के समान तेजस्वी थे। वे कौतूहलकारी प्रबल वीर प्रमथगण वीरभद्र के और आगे पीछे भी चल रहे थे।

 

 

 

 

काल के भी काल भगवान रूद्र के वीरभद्र सहित जो लाखो पार्षदगण थे उन सबका स्वरुप रूद्र के समान ही था। उन गणो के साथ महात्मा वीरभद्र भगवान शिव के समान ही वेश भूषा धारण के रथपर बैठकर यात्रा कर रहे थे। उनके एक सहस्र भुजाये थी। शरीर में नागराज लिपटे हुए थे।

 

 

 

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