Prem Kya hai, Akelapan Kya Hai Pdf Download

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Prem Kya hai Akelapan Kya Hai Pdf देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से प्रेम क्या है, अकेलापन क्या है Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

 

Prem Kya hai, Akelapan Kya Hai Pdf / प्रेम क्या है अकेलापन क्या है Pdf 

 

 

 

Prem Kya hai, Akelapan Kya Hai Pdf Download

 

प्रेम क्या है?

 

 

 

 

 

 

Note- इस वेबसाइट https://pdfbookshindi.in/ पर दिए गए किसी पोस्ट, कंटेंट, पीडीएफ फ़ाइल का मालिकाना हक़ इस वेबसाइट के ऑनर के पास नहीं है।

 

 

 

यहां पर दी जाने वाली पीडीएफ फ़ाइल केवल पाठकों की सहूलियत और जानकारी के लिए दी जाती है, अतः अगर किसी को इस वेबसाइट के किसी कंटेंट या पीडीएफ फ़ाइल से कोई परेशानी हो तो वे तुरंत ही हमें [email protected] पर संपर्क करें।  तुरंत ही उस पोस्ट और पीडीएफ फ़ाइल को हटा देंगे।

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

शुद्ध भक्ति में तत्पर (भगवान की प्राप्ति) – भगवान कहते है – हे अर्जुन ! जो व्यक्ति सकाम कर्मो के कल्मष से मुक्त होकर मेरी शुद्ध भक्ति में तत्पर रहता है जो मेरे लिए ही कर्म करता है जो मुझे ही जीवन-लक्ष्य समझता है और जो प्रत्येक जीव से मैत्री भाव रखता है वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भक्तिरसामृत सिंधु में (2,55) कहा गया है – ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो कृष्ण से संबंधित न हो। यह कृष्ण कर्म कहलाता है।

 

 

 

कोई भले ही कितने ही कर्म करे उसे उनके फल के प्रति आसक्ति नहीं होनी चाहिए। यह फल तो कृष्ण को ही अर्पित किया जाना चाहिए।

 

 

 

उदाहरण के लिए कोई व्यापार में व्यस्त है तो उसे इस व्यापार को कृष्ण भावनामृत में परिणत करने के लिए कृष्ण को अर्पित करना होगा।

 

 

 

 

यदि कृष्ण व्यापार के स्वामी है तो इसका लाभ भी उन्हें ही मिलना चाहिए। यदि किसी व्यापारी के पास करोडो की संपत्ति है और यदि वह इसे कृष्ण को अर्पित करना चाहता है तो ऐसा कर सकता है।

 

 

 

 

यही कृष्ण कर्म है। अपनी इन्द्रिय तृप्ति के लिए विशाल भवन न बनवाकर वह कृष्ण के लिए सुंदर मंदिर बनवाकर उसमे कृष्ण का आर्चाविग्रह स्थापित कर सकता है और भक्ति के प्रामाणिक ग्रंथो में वर्णित आर्चाविग्रह की सेवा का प्रबंध करा सकता है। यह सब कृष्ण कर्म है।

 

 

 

 

संग वर्जित शब्द भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य को चाहिए कि ऐसे लोगो से संबंध तोड़ ले जो कृष्ण विरोधी है। न केवल नास्तिक लोग कृष्ण के विरुद्ध रहते है अपितु वह लोग भी है जो सकाम कर्मो तथा मनोधर्म के प्रति आसक्त रहते है।

 

 

 

 

अतः भक्तिरसामृत सिंधु में (1,1,11) शुद्ध भक्ति का वर्णन इस प्रकार हुआ है। श्रील रूप गोस्वामी स्पष्ट कहते है कि यदि कोई अनन्य भक्ति करना चाहता है तो उसे समस्त प्रकार के भौतिक कल्मष से मुक्त होना चाहिए।

 

 

 

उसे ऐसे व्यक्तियों से सदा ही दूर रहना चाहिए जो सकाम कर्म तथा मनोधर्म में आसक्त रहते हैं। ऐसी अवांछित संगति तथा भौतिक इच्छाओ के कल्मष से मुक्त होने पर ही वह कृष्ण ज्ञान का अनुशीलन कर सकता है जिसे शुद्ध भक्ति कहते है। मनुष्य को चाहिए कि अनुकूल भाव से  विषय में सोचे और उन्ही के लिए कर्म करे। प्रतिकूल भाव से नहीं।

 

 

 

 

जो कोई चिन्मय व्योम के कृष्ण लोक में परम पुरुष को प्राप्त करके भगवान कृष्ण से घनिष्ठ संबंध स्थापित करना चाहता है। उसे स्वयं भगवान द्वारा बताए गए इस मंत्र को ग्रहण करना होगा।

 

 

 

 

अतः यह श्लोक भगवद्गीता का सार तत्व माना जाता है। भगवद्गीता एक ऐसा ग्रंथ है जो उन बद्ध जीवो की ओर लक्षित है। जो इस भौतिक संसार में प्रकृति पर प्रभुत्व जताने में लगे हुए है और वास्तविक आध्यात्मिक जीवन के बारे में नहीं जानते है।

 

 

 

 

भगवद्गीता का उद्देश्य यह दिखाना है कि मनुष्य किस प्रकार अपने आध्यात्मिक अस्तित्व को तथा भगवान के साथ अपने संबंध को समझ सकता है तथा उसे यह शिक्षा देना है कि वह कैसे भगवद्धाम पहुँच सकता है।

 

 

 

 

यह श्लोक इस विधि को स्पष्ट रूप से बताता है। जिससे मनुष्य अपने आध्यात्मिक कार्य में अर्थात भक्ति में सफलता प्राप्त कर सकता है।

 

 

 

 

मनुष्य को अपने कर्म में लिप्त नहीं होना चाहिए, अपितु इसे कृष्ण को अर्पित करके बची हुई वस्तु को केवल प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए।

 

 

 

 

यदि कोई कृष्ण के लिए विशाल भवन बनवा देता है और उसमे कृष्ण का आर्चाविग्रह स्थापित कराता है तो उसे उसमे रहने की मनाही नहीं रहती है।

 

 

 

 

लेकिन कृष्ण को ही इस भवन का स्वामी मानना चाहिए। जिसके पास थोड़ी सी भूमि है – जैसा कि भारत के निर्धन से निर्धन व्यक्ति के पास होती है तो उसका उपयोग कृष्ण के लिए फूल उगाने में कर सकता है।

 

 

 

 

वह तुलसी के वृक्ष ऊगा सकता है। तुलसीदल अत्यंत महत्वपूर्ण है और वह भगवद्गीता में कृष्ण ने उनको महत्वपूर्ण बताया है। पत्रं, पुष्पं, फलम, तोयम।

 

 

 

 

कृष्ण कहते है कि लोग उन्हें पत्र, पुष्प, फल तथा थोड़ा सा जल भेट करे और इस प्रकार की भेट से वह प्रसन्न रहते है। इस तरह गरीब से गरीब व्यक्ति भी अपने को कृष्ण सेवा में लगा सकता है।

 

 

 

 

यह पत्र विशेष रूप से तुलसीदल ही है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह तुलसी का पौधा लगाकर उसे सींचे। यह कतिपय उदाहरण है किस तरह से कृष्ण कर्म में लगा जा सकता है

 

 

 

कंस कृष्ण का शत्रु था। वह कृष्ण के जन्म के समय से ही उन्हें मारने के लिए तरह-तरह की योजनाए बनाता रहा किन्तु असफल होने के कारण ही वह सदैव ही कृष्ण का चिंतन करता रहता था।

 

 

 

 

इस तरह सोते जागते काम करते वह सदैव ही कृष्ण भावनाभावित रहा किन्तु उसकी यह कृष्ण भावना अनुकूल न थी। अतः चौबीस घंटे कृष्ण का चिंतन करते रहने पर भी वह असुर ही माना जाता था और अंत में कृष्ण के हाथो से ही उसकी मृत्यु हुई।

 

 

 

 

कृष्ण के द्वारा वध किए जाने वाले को निःसंदेह मोक्ष प्राप्त हो जाता है। किन्तु शुद्ध भक्त का यह उद्देश्य कदापि नहीं होता है। शुद्ध भक्त को किसी प्रकार की कामना नहीं रहती है जैसे मोक्ष या फिर गोलोक वृन्दावन जाना उसे तो बस अपने प्रभु (कृष्ण) की सेवा से काम रहता है वह चाहे जहां भी रहे।

 

 

 

 

मत्परमः शब्द उस व्यक्ति के लिए आता है जो अपने जीवन का परम लक्ष्य भगवान कृष्ण के परम धाम में उनकी संगति करना चाहता है।

 

 

 

 

ऐसा व्यक्ति सूर्य, चंद्र या स्वर्ग जैसे उच्चतर लोको में अथवा इस ब्रह्माण्ड के उच्चतम लोक ब्रह्मलोक में भी जाने की कामना नहीं करता है।

 

 

 

 

उसकी इच्छा तो आध्यात्मिक आकाश में जाने की रहती है। वह तो ब्रह्म ज्योति में भी तादात्म्य स्थापित नहीं करना चाहता है। क्योंकि वह सर्वोच्च लोक में आध्यात्मिक स्थिति को प्राप्त करना चाहता है।

 

 

 

 

अतः वह किसी भी अन्य लोक में नहीं जाना चाहता है। उसे तो सर्वोच्च आध्यात्मिक लोक की इच्छा रहती है। जिसे गोलोक या वृन्दावन कहते है।

 

 

 

 

उसे तो उस लोक का पूर्ण ज्ञान रहता है। जैसा कि मद्भक्त शब्द से सूचित होता है वह भक्ति मे पूर्णरूप से रत रहता है। विशेष रूप से वह श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, पादसेवन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन भक्ति के इन नौ साधनो में लगा रहता है।

 

 

 

 

मनुष्य चाहे तो इन नौ साधनो में लगा रह सकता है अथवा आठ, सात या फिर किसी एक में लगा रह सकता है। तब वह निश्चित रूप से ही कृतार्थ हो जाएगा।

 

 

 

 

भगवत भक्तों का इतिहास साक्षी है कि कई बार ईश्वर चेतना का प्रचार करने में अपने जीवन को संकट ग्रस्त करना पड़ता है। यहां सबसे उपयुक्त उदाहरण जीसस क्राइस्ट का है।

 

 

 

 

उन्हें अभक्त लोगो ने सूली पर चढ़ा दिया था। किन्तु उन्होंने अपना जीवन कृष्ण भावनामृत के प्रचार में उत्सर्ग कर दिया था। निःसंदेह यह कहना कि वह मारे गए ठीक नहीं है।

 

 

 

 

ठीक इसी प्रकार भारत में भी अनेक उदाहरण है यथा प्रह्लाद महाराज, ठाकुर हरिदास ऐसा कष्ट उन्होंने क्यों उठाया क्योंकि वह कृष्ण भावनामृत का प्रसार करना चाहते थे और यह कठिन कार्य है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति जानता है मनुष्य कृष्ण के साथ अपने संबंध भूलने के कारण ही कष्ट उठा रहा है। अतः कृष्ण भावनामृत का प्रचार मानव की सबसे बड़ी सेवा होगी कि अपने आस-पड़ोस को समस्त प्रकार के भौतिक कष्ट से उबारा जाय।

 

 

 

 

कृष्ण भक्त प्रत्येक से मैत्री भाव रखता है। इसलिए उसे यहां निर्वरः कहा गया है अर्थात उसका कोई भी शत्रु नहीं रहता है लेकिन यह कैसे संभव है?

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत में स्थित भक्त यह जानता है कि कृष्ण की भक्ति ही मनुष्य को जीवन की समस्त समस्याओ से छुटकारा दिला सकती है।

 

 

 

 

उसे इसका व्यक्तिगत अनुभव रहता है। फलस्वरूप वह (भक्त) इस कृष्ण भावनामृत प्रणाली को मानव समाज में प्रचारित तथा प्रसारित करना चाहता है जिससे अन्य लोगो का जीवन भी सुखी हो सके।

 

 

 

 

इस प्रकार शुद्ध भक्त भगवान की सेवा में लगा रहता है। तभी हम समझ सकते है कि कृष्ण उन लोगो पर कितने कृपालु है। जो उनकी सेवा में लगे रहकर उनके लिए सभी प्रकार के कष्ट सहते है। अतः यह ध्रुव है कि ऐसे लोग इस नश्वर संसार को त्यागने के पश्चात परम धाम को प्राप्त होंगे।

 

 

 

 

मित्रों यह पोस्ट Prem Kya hai, Akelapan Kya Hai Pdf Download आपको कैसी लगी जरूर बताएं और इस तरह की पोस्ट के लिए इस ब्लॉग को सब्स्क्राइब जरूर करें और इसे शेयर भी करें।

 

 

 

इसे भी पढ़ें —-Dhyan Yog Pratham Aur Antim Mukti Pdf Download

 

 

 

 

 

Leave a Comment