Positive Thinking Hindi Pdf Free / पॉजिटिव थिंकिंग हिंदी पीडीएफ फ्री

मित्रों इस पोस्ट में Positive Thinking Hindi Pdf दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से Positive Thinking Hindi Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

 

 

Positive Thinking Hindi Pdf Free पॉजिटिव थिंकिंग हिंदी Pdf

 

 

 

 

आप यहां से Positive Thinking Hindi Pdf Free डाउनलोड कर सकते हैं। 

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Positive Thinking Hindi Pdf Free

 

 

 

आत्मतत्व में स्थिर – श्री कृष्ण कहते है – जिस प्रकार वायु रहित स्थान में दीपक हिलता-डुलता नहीं उसी तरह जिसयोगी का मन वश में होता है। वह आत्मतत्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति अपने आराध्य के ध्यान के चिंतन में निमग्न रहता है। जिस तरह एक दीपक वायु रहित स्थान में स्थिर रहता है।

 

 

 

सिद्धि की विशेषता – श्री कृष्ण कहते है – सिद्धि की अवस्था में, जिसे समाधि कहते है। मनुष्य का मन योगाभ्यास के द्वारा भौतिक मानसिक क्रियाओ से पूर्णतया संयमित हो जाता है। इस सिद्धि की विशेषता यह है कि मनुष्य शुद्ध मन से अपने को देख सकता है और अपने आप में आनंद उठा सकता है।

 

 

 

उस आनंदमयी स्थिति में दिव्य इन्द्रियों द्वारा असीम दिव्य सुख में स्थित रहता है। इस प्रकार स्थापित मनुष्य कभी सत्य के विपथ नहीं हो सकता है और इस सुख की प्राप्ति होने पर वह इससे बड़ा कोई दूसरा लाभ नहीं मानता है। ऐसी स्थिति होने पर मनुष्य बड़ी से बड़ी कठिनाइयों में भी विचलित नहीं होता है। यह निःसंदेह ही भौतिक संसर्ग से उत्पन्न समस्त दुखो से वास्तविक मुक्ति होती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यह चिति शक्ति या अंतरंगा शक्ति दिव्य है। पुरुषार्थ का तात्पर्य धर्म, अर्थ, काम तथा अंत में परब्रह्म से तादात्म या कि मोक्ष प्राप्त करना है। अद्वैतवादी परब्रह्म से इस तादात्म को कैवल्यम कहते है। किन्तु पतंजलि के अनुसार कैवल्यम वह अंतरंगा या दिव्य शक्ति है जिससे जीवात्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति से अवगत होता है। भगवान चैतन्य के शब्दों में यह अवस्था चेतो दर्पण मार्जनम अर्थात मन रूपी मलिन दर्पण का मार्जन (शुद्धि) है। यह मार्जन वास्तव में मुक्ति या भवमहादावाग्नि निर्वापणम है, प्ररंभिम निर्वाण सिद्धांत भी इस नियम के समान है। भागवत में (2. 10. 6) इसे स्वरूपेण व्यवस्थितिः कहा गया है। भगवद्गीता के श्लोक में भी इसकी पुष्टि हुई है।

 

 

 

 

योगाभ्यास से मनुष्य भौतिक धारणाओं से क्रमशः विरक्ति को प्राप्त हो जाता है यह योग का परम लक्ष्य है। इसके बाद वह समाधि में स्थित हो जाता है जिसका अर्थ यह होता है कि दिव्य मन तथा बुद्धि के द्वारा योगी अपने आप को परमात्मा समझने का भ्रम न करके परमात्मा की अनुभूति प्राप्त करता है।

 

 

 

पतंजलि पद्धति में दिव्य आनंद को स्वीकार किया गया है। किन्तु अद्वैतवादी इसे ही मुक्ति मानते है। किन्तु वह पतंजलि की वास्तविक प्रयोजन को नहीं जानते है। योगाभ्यास बहुत कुछ पतंजलि की पद्धति पर आधारित है। कुछ अप्रमाणिक भाष्यकर जीवात्मा तथा परमात्मा में अभेद स्थापित करने का प्रयास करते है क्योंकि उन्हें भ्रम है कि इससे कही उनके अद्वैतवाद में बाधा न उपस्थित हो जाए।

 

 

 

योग सूत्र में (3. 34) महर्षि कहते है – पुरुषार्थ शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरुप प्रतिष्ठा वा चिति शक्तिरीति।  अद्वैतवादी ज्ञान तथा ज्ञाता के द्वैत को स्वीकार नहीं करते है। किन्तु इस श्लोक में दिव्य इन्द्रियों द्वारा अनुभूत दिव्य आनंद को स्वीकार किया गया है। इसकी पुष्टि योग पद्धति के विख्यात व्याख्याता पतंजलि मुनि ने भी किया है।

 

 

 

निर्वाण के बाद आध्यात्मिक कार्य कलापो को या भगवद्भक्ति की अभिव्यक्ति होती है। जिसे कृष्ण भावनामृत कहते है। भागवत के शब्दों के अनुसार – स्वरूपेण व्यवस्थितिः – जीवात्मा का वास्तविक जीवन यही है। पतंजलि भी इसकी पुष्टि इन शब्दों में करते है – कैवल्यं स्वरुप प्रतिष्ठा वा चिति शक्तिरीति – यह चिति शक्ति या दिव्य आनंद ही वास्तविक जीवन है। इसका अनुमोदन वेदांत सूत्र में (1. 1. 12) इस प्रकार हुआ है। – आनंदमयो अभ्यासात। यह चिति शक्ति ही योग का परम लक्ष्य है और भक्ति योग द्वारा इसे सरलता से प्राप्त किया जाता है। भक्ति योग का विस्तृत विवरण सातवे अध्याय में वर्णित है।

 

 

 

 

भौतिक दूषण से आध्यात्मिक जीवन के कल्मष युक्त होने की स्थिति माया है। इस भौतिक दूषण से मुक्ति का अभिप्राय जीवात्मा की मूल दिव्य स्थिति का विनाश नहीं विनास नहीं है। इस अध्याय में वर्णित योग पद्धति के अनुसार समाधिया दो प्रकार की होती है।

 

 

 

सम्प्रत ज्ञात तथा असम्प्रत ज्ञात समाधियां। जब मनुष्य विभिन्न दार्शनिक शोध के द्वारा दिव्य स्थिति को प्राप्त होता है तो यह कहा जाता है कि उसे सम्प्रत ज्ञात समाधि प्राप्त है। असम्प्रति ज्ञात समाधि में संसारी आनंद से कोई संबंध नहीं रहता है क्योंकि मनुष्य इसमें इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सभी सुखो से परे रहता है। एक बार इस दिव्य स्थिति को प्राप्त कर लेने के बाद योगी कभी उससे डिगता नहीं है।

 

 

 

यदि योगी जन योग की आनुषंगिक वस्तुओ के प्रति आकृष्ट है तो उन्हें सिद्ध अवस्था को प्राप्त हुआ नहीं माना जा सकता है। जब तक योगी दिव्य अवस्था को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक वह असफल रहता है। आजकल के तथा कथित योगाभ्यास में विभिन्न इन्द्रिय सुख सम्मिलित रहता है। जो योग के सर्वथा विपरीत है योगी होकर भी यदि कोई मादक द्रव्य या मैथुन के प्रति आसक्त होता है तो यह उपहास जनक है।

 

 

 

जैसा कि कहा गया है जो व्यक्ति योगी होकर आसनो के प्रदर्शन या फिर सिद्धियों के चक्कर में रहते है उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार से योग का मुख्य उद्देश्य समाप्त हो जाता है। इस युग में योग की सर्वोत्तम पद्धति कृष्ण भावनामृत है जो निराशा उत्पन्न करने वाली नहीं है। इस योग पद्धति से तो निराश व्यक्ति में आशा का संचार हो जाता है। एक कृष्ण भावना भावित व्यक्ति अपने धर्म में इतना सुखी रहता है कि उसे किसी अन्य सुख की कामना ही नहीं रह जाती है।

 

 

 

जब तक यह शरीर रहता है तब तक शरीर की आवश्यकता – आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन को पूरा करना होता है किन्तु जो व्यक्ति शुद्ध भक्ति योग में अथवा कृष्ण भावना भावित होकर कृष्ण भावनामृत में स्थित रहता है। वह शरीर की आवश्यकता की पूर्ति के समय इन्द्रियो को उत्तेजित नहीं करता है। इस दम्भ प्रधान युग में हठयोग, ध्यानयोग तथा ज्ञानयोग का अभ्यास करते हुए अनेको अवरोध उपस्थित हो सकते है। किन्तु कर्म योग या भक्तियोग के पालन में ऐसी समस्याओ का सामना नहीं करना पड़ता है क्योंकि कर्मयोग या भक्तियोग बहुत शक्तिशाली होते है।

 

 

 

कृष्ण भावनामृत में स्थित व्यक्ति प्रत्युत व घाटे का सौदा स्वीकार कर उसका सर्वोत्तम उपयोग करके जीवन की न्यूनतम आवश्यकताओ को स्वीकार करता है और कृष्ण भावनामृत में सर्वोत्तम दिव्य सुख भोगता है। वह दुर्घटनाओं, रोगो, अभावो यहां तक कि अपने प्रिय जनो की मृत्यु जैसी आपातकालीन घटनाओ के प्रति भी निरपेक्ष भाव रखता है किन्तु कृष्ण भावनामृत या भक्ति योग संबंधी अपने कर्मो को पूरा करने में वह सचेष्ट रहता है

 

 

 

जैसा कि भगवद्गीता में (2. 14) कहा गया है – आगमा पायिनो अनित्यात्सां स्तिति क्षस्व भारत ! वह इन प्रासंगिक घटनाओ को सहता है। दुर्घटनाए उसे कर्तव्य पथ से विचलित नहीं कर पाती है क्योंकि वह भलीभांति जानता है। यह घटनाए ऐसे ही (हवा की झोके की तरह) आती-जाती रहती है और इससे उसके कर्तव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है ऐसा व्यक्ति योगाभ्यास में परम सिद्धि प्राप्त करता है।

 

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

 

मित्रों यह पोस्ट Positive Thinking Hindi Pdf आपको कैसी लगी जरूर बताएं और इस तरह की दूसरी पोस्ट के लिए इस ब्लॉग को सब्स्क्राइब जरूर करें और इसे शेयर भी करें और फेसबुक पेज को लाइक भी करें, वहाँ आपको नयी बुक्स, नावेल, कॉमिक्स की जानकारी मिलती रहेगी।

 

 

 

इसे भी पढ़ें —->रामकृष्ण परमहंस फ्री बुक्स Pdf

 

इसे भी पढ़ें —->आनंदमठ पीडीएफ हिंदी फ्री डाउनलोड

 

 

 

Leave a Comment