Pinjar Novel in Hindi Pdf / पिंजर उपन्यास PDF Download

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Pinjar Novel in Hindi Pdf / पिंजर उपन्यास PDF Download

 

 

 

Pinjar Novel in Hindi Pdf Download

 

 

 

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को पुरुषोत्तम योग समझा रहे है। भगवान कह रहे है कि इस वृक्ष (अश्वत्थ) की शाखाये ऊपर तथा नीचे फैली हुई है और प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित है। इसकी टहनिया इन्द्रिय विषय है। इस वृक्ष की जड़े नीचे की ओर भी जाती है जो मानव समाज के सकाम कर्मो से बंधी हुई है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अश्वत्थ वृक्ष की यहां और भी अधिक व्याख्या की गई है। इसकी शाखाओ का प्रसार चतुर्दिक है। इस वृक्ष के ऊपरी भाग में जीवो की उच्च  है यथा – देव, गंधर्व इत्यादि बहुत सी उच्चतर  है।

 

 

 

 

जिस प्रकार से सामान्य वृक्ष का पोषण जल के द्वारा होता है उसी प्रकार यह वृक्ष प्रकृति के तीन गुणों द्वारा पोषित होता है। इस वृक्ष के निचले भाग में जीवो की विभिन्न योनिया रहती है यथा – मनुष्य, पशु, घोड़े, गाय, पक्षी, कुत्ते तथा बिल्लिया इत्यादि।

 

 

 

 

यह सब इस वृक्ष की शाखाओ के निचले भाग में स्थित है। वृक्ष की टहनिया इन्द्रिय विषय है। विभिन्न गुणों के विकास से हम विभिन्न प्रकार की इन्द्रियों का विकास करते है और इन इन्द्रियों के द्वारा हम विभिन्न इन्द्रिय विषयो का भोग करते है।

 

 

 

 

कभी-कभी हम देखते है कि जलाभाव के कारण कोई-कोई भूखंड एकदम वीरान हो जाता है तो कोई भूखंड लहलहाता रहता है। इसी प्रकार से जहां प्रकृति के गुणों का अनुपातिक रूप से अधिकता होती है वहां उसी के अनुरूप ही प्राकट्य होता है।

 

 

 

इस अश्वत्थ वृक्ष की शाखाओ के शिरे ही इंद्रियां है। यथा – कान, नाक, आंख आदि जो विभिन्न इन्द्रिय विषयो के भोग में आसक्त रहते है। टहनिया शब्द रूप स्पर्श आदि ही इन्द्रिय विषय है। राग-द्वेष इसकी सहायक जड़े है जो कि विभिन्न प्रकार के कष्ट तथा इन्द्रिय भोग के विभिन्न रूप है।

 

 

 

 

जब मनुष्य उच्च लोको में अपने पुण्य कर्मो के फल को भोग लेता है तब उसे इस धरा पर भेज दिया जाता है और वह इस धरा पर आकर उन्नति के लिए पुनः सकाम कर्मो का नवीनीकरण करता है।

 

 

 

 

यह मनुष्य लोक ही कर्म क्षेत्र माना जाता है। धर्म अधर्म की प्रवृत्तियां इस अश्वत्थ वृक्ष कि गौण जड़ो से उत्पन्न मानी जाती है जो चारो दिशाओ में फैली हुई है।

 

 

 

इस अश्वत्थ वृक्ष की वास्तविक जड़ तो ब्रह्म लोक में स्थित है किन्तु इसकी अन्य जड़े तो मर्त्य लोक में है। मनुष्य को इस वृक्ष की मूल (वास्तविक) जड़ को ही ढूंढने का प्रयास करना चाहिए।

 

 

 

 

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