RatRating Phaladeepika Pdf Hindi Free Download / फलदीपिका पीडीऍफ़ हिंदी फ्री

Phaladeepika Pdf Hindi Free Download / फलदीपिका पीडीऍफ़ हिंदी फ्री

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Phaladeepika Pdf Hindi Free फलदीपिका पीडीऍफ़ हिंदी फ्री 

 

 

 

 

 

 

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आपके मूल रूप में यह ग्रंथ, ग्रंथ नामक प्राचीन लिपि में ही उपस्थित था। इसमें 28 अध्याय और 865 श्लोक है। 1925 के आस-पास यह ग्रंथ नागरी लिपि में सर्वप्रथम कोलकाता से प्रकाशित हुआ। इसमें मानव जीवन के प्रत्येक पहलू के ज्योतिषीय पक्ष पर विचार किया गया है। इसका दक्षिण भारतीय भाषाओ में भी अनुवाद हुआ है।

 

 

 

जातक पारिजात नामक ग्रंथ के रचनाकार षडकटाद्रि के पुत्र श्री बैद्यनाथ है और उनका जीवन काल 14 शताब्दी में था। इस ग्रंथ के श्लोक बैद्यनाथ द्वारा रचित जातक पारिजात से यथावत रूप से उद्धृत किए गए है। इस ग्रंथ में जातक विषय पर अन्य ग्रंथो से भिन्न साक्षात्कार प्राप्त होता है। फल दीपिका मंत्रेश्वर की अद्भुत रचना है। यह भारतीय ज्योतिष का संस्कृत में एक प्रमुख ग्रंथ है।

 

 

 

Phaladeepika Pdf Hindi Free
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ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

मान-अपमान (समरूप) – श्री कृष्ण कहते है – जिसने भी अपने मन जीत लिया है। उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है क्योंकि उसने शांति प्राप्त कर ली है। ऐसे पुरुष के लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान एक से है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – वस्तुतः प्रत्येक जीव उस भगवान की आज्ञा का पालन करता है जो जन-जन के हृदय में परमात्मा रूप स्थित है। जब मन बहिरंगा माया द्वारा विपथ कर दिया जाता है तब मनुष्य भौतिक कार्य कलापो में उलझ जाता है। मन को किसी न किसी उच्च आदेश को मानकर उसका पालनकरना होता है। अतः ज्यों ही मन किसी योग पद्धति द्वारा वश में आ जाता है त्यों ही मनष्य को लक्ष्य पर पहुंचा हुआ मान लिया जाना चाहिए।

 

 

 

चूंकि कृष्ण भावना भावित होते ही यह दिव्य स्थिति प्राप्त हो जाती है। जब मनुष्य का मन परा-प्रकृति में स्थिर हो जाता है तो जीवात्मा के समक्ष भगवद आज्ञा का पालन करना चाहिए। मन को वश में करने से स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन हो जाता है। अतः भगवद्भक्त संसार के द्वंदो यथा सुख-दुख, सर्दी-गर्मी आदि से प्रभावित नहीं होता है, यह अवस्था व्यावहारिक समाधि या परमात्मा में तल्लीनता है।

 

 

 

 

 

8- जितेन्द्रिय मनुष्य – वह व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त तथा योगी कहलाता है। जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया संतुष्ट रहता है। ऐसा व्यक्ति अध्यात्म को प्राप्त तथा जितेन्द्रिय कहलाता है। उसे सभी वस्तुए समरूप (एक समान) ही प्रतीत होती है, अर्थात वह सभी वस्तु को एक समान देखता है यथा सोना या फिर कंकड़ पत्थर।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – परम सत्य की अनुभूति के बिना कोरा ज्ञान व्यर्थ है। भक्ति रसामृत सिंधु में (1. 2. 234) कहा गया है। “कोई भी व्यक्ति अपनी दूषित इन्द्रियों के द्वारा श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा उनकी लीलाओ की दिव्य प्रकृति को नहीं समझ सकता है।” यह भगवद्गीता, कृष्ण भावनामृत का विज्ञान है। मात्र सांसारिक विद्वता से कोई कृष्ण भावना भावित नहीं हो सकता है।

 

 

 

आध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य को अपने संकल्प में दृढ़ता प्रदान होती है। किन्तु मात्र शैक्षिक ज्ञान से वह बाहरी विरोधाभासो के द्वारा मोहित और भ्रमित होता है। उसे विशुद्ध चेतना वाले व्यक्ति का सानिध्य प्राप्त करना चाहिए और ऐसा सौभाग्य से होता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति को भगवद्कृपा से ही ज्ञान की अनुभूति होती है क्योंकि वह विशुद्ध भक्ति से तुष्ट रहता है।

 

 

 

केवल अनुभवी आत्मा ही आत्म संयमी होता है क्योंकि वह कृष्ण की शरण में जा चुका होता है। अनुभूत ज्ञान से वह पूर्ण रहता है। वह दिव्य होता है क्योंकि उसे सांसारिक विद्वता से कुछ लेना-देना नहीं रहता है। उसके लिए संसारी विद्वता तथा मनोधर्म जो अन्य के लिए स्वर्ण के समान उत्तम होता है कंकड़ों और पत्थरो के समान होते है।

 

 

 

 

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