Top 15 + Pdf Books in Hindi Free Download / हिंदी बुक्स Pdf

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Pdf Books in Hindi Free हिंदी बुक्स Pdf 

 

 

1- अंडमान निकोबार की लोककथाए 

 

2- अंतिम अकांक्षा 

 

3- एक और सीता

 

4- अनकहे एहसास

 

5- अधूरा स्वर्ग

 

6- अलादीन का जादुई चिराग

 

7- मध्य प्रदेश का इतिहास 

 

8- अपने इसी शहर में 

 

9- अनदेखे पुल

 

10- अपने समय का आइना 

 

11- अद्भुत दुनिया पक्षियों की 

 

12- अप्सरा का श्राप 

 

13- आदिवासी लोक कथाए

 

14- आधुनिक यमलोक

 

15- आजाद हिन्द फ़ौज

 

 

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पश्चाताप Hindi Pdf Books

 

 

 

Pdf Books in Hindi Free

 

 

 

 

नेहा और गीता दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थी। नेहा के पिता एक मध्यम वर्गीय मनुष्य थे जबकि गीता के पिता एक फैक्ट्री के मालिक थे।

 

 

 

 

गीता की मां एक बैंक में कैशियर थी। गीता धनाढ्य परिवार की लड़की थी। घर के माहौल के हिसाब से ही बच्चो का भी व्यवहार वैसा ही हो जाता है।

 

 

 

 

गीता के पिता को अपने बिजनेस पर बहुत घमंड था। वह अपने सामने अन्य लोगो को तुच्छ समझता था। जबकि गीता की मां बैंक में कैशियर थी इसलिए उसका व्यवहार अपने पति से भिन्न था।

 

 

 

 

लेकिन गीता का स्वभाव बिलकुल अपने पिता के ऊपर ही गया था। वह अपने स्कूल के सभी छात्र-छात्राओ को अपने से निम्न स्तर का समझती थी।

 

 

 

 

गीता की मां उसे हरदम समझाती थी कि कभी किसी को नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। लेकिन गीता पर इसका जरा भी प्रभाव नहीं पड़ता था।

 

 

 

 

वह एकदम चिकने घड़े के जैसी ही थी। जबकि नेहा सदैव ही सबको अपने बराबर ही सम्मान देती थी। एक दिन गीता अपने पिता के साथ कार से घूमने जा रही थी तो सामने से ही नेहा आती हुई दिखी उसके हाथ में सब्जी का थैला था।

 

 

 

 

गीता ने अपने पिता से कहकर कार रुकवा दिया और उतरकर नेहा से कहने लगी, “क्या तुम खुद सब्जी लेने बाजार जाती हो ?”

 

 

 

 

नेहा ने कहा, “हां, मैं तो खुद ही सब्जी लेने बाजार जाती हूँ।”

 

 

 

 

“तुम्हारे पास नौकर नहीं है। तुम लोग छोटे आदमी हो नौकर नहीं रख सकते हो।” इतना कहते हुए गीता अपनी कार से अपने पिता के साथ चली गई।

 

 

 

 

 

एक दिन गीता की नौकरानी गीता के लिए खाना बना रही थी। उसके कपड़े मैले थे। तब गीता ने अपनी नौकरानी से कहा, “आंटी आपके कपड़े मैले है आप दूसरे कपड़े क्यों नहीं ले लेती ?”

 

 

 

 

 

गीता को क्या पता था कि एक नौकरी करने वाले के लिए तो घर चलाना ही मुश्किल होता है। वह कपड़े कहाँ से ले पाएगी। गीता ने अपने पिता की तरह ठसक दिखाते हुए कहा, “तुम लोग छोटे आदमी हो, तुम लोगो को ढंग से रहना भी नहीं आता है।”

 

 

 

 

गीता बात-बात में नेहा को नीचा दिखाने का प्रयास करती थी। एक दिन नेहा की मां ने खीर बनाई थी। जब नेहा खाने के लिए बैठी तो उसकी मां ने कहा, “तुम्हारी सहेली को तो खीर बहुत पसंद है मैं अभी उसे देकर आती हूँ।”

 

 

 

 

 

नेहा ने अपनी मां को मना किया कि वे बड़े लोग है। वहां खीर लेकर मत जाओ लेकिन उसकी मां ने गीता के लिए खीर निकाला और लेकर उसके घर पहुंच गई।

 

 

 

 

गीता घर में अकेली थी। नेहा की मां ने उसे खीर देना चाहा तो गीता ने मना कर दिया। गीता बोली, “सॉरी आंटी हमारी मम्मी अभी बाहर से खाना मँगवाएगी। हम लोग दूसरे के घर का खाना नहीं खाते।”

 

 

 

 

नेहा की मां अपने घर लौट आई। एक दिन गीता नेहा के घर आई तो नेहा वहां बर्तन धो रही थी। गीता बोली, “नेहा तुम खुद ही बर्तन धो रही हो क्या तुम्हारे पास कोई नौकर नहीं है और तुम्हारा घर भी बहुत छोटा है ?”

 

 

 

 

 

कुछ देर के बाद गीता वहां से चली गई। लेकिन समय का चक्र घूमता रहता है। जिस बड़े घर पर गीता और उसके पिता को इतना गर्व था वह घर अब नीलाम होने वाला था।

 

 

 

 

कारण कि गीता के पिता की फैक्ट्री दिवालिया हो गई थी। उसके ऊपर बहुत सारा कर्ज था। यह बात नेहा को एक अख़बार के माध्यम से पता लग गई थी।

 

 

 

 

नेहा ने अपने पिता से इस विषय में सहायता करने के लिए कहा था। नेहा के पिता एक कर्तव्य निष्ठ आदमी थे। उन्होंने अपने कंपनी के मालिक से कहकर गीता के पिता की फैक्ट्री को दिवालिया होने से बचा लिया।

 

 

 

 

गीता का घर नीलाम होने से बच गया। यह बात गीता के पिता को मालूम हुई तो उसे बहुत ही ग्लानि हुई क्योंकि वह जिसे तुच्छ समझता था वही उसके काम आया था।

 

 

 

 

 

उसी के वजह से उसका घर नीलाम होने से बच गया था। गीता अपने माता और पिता से कह रही थी। अगर हमारा घर नीलाम हो जाता ……… यह सोचकर ही मैं सिहर उठती हूँ। मैंने अपनी जिस सहेली का अपमान किया था। आज उसके ही प्रयास से हम बेघर होने से बच गए।

 

 

 

 

 

गीता की मां ने कहा, “तुम्हे अपनी उस सहेली से माफ़ी मांगनी चाहिए।”

 

 

 

 

गीता बोली, “मैं उन सभी से माफ़ी मांग लूँगी जिन्हे हमारे व्यवहार से कष्ट हुआ है।”

 

 

 

 

गीता का अपने स्कूल में सभी साथियो के मध्य व्यवहार बदल गया था। वह अपने दिखावेपन से कोसो दूर हो गई थी। अब गीता सदैव सबकी मदद किया करती थी।

 

 

 

 

गीता के पिता को जब यह पता चला कि यह सहायता नेहा के पिता द्वारा करवाई गई है तो वह नेहा के पिता से गले मिले और कुछ दिन के पश्चात् अपना पूरा कर्ज चुकाने के बाद नेहा के पिता को अपनी फैक्ट्री में हिस्सेदार बना लिया था।

 

 

 

 

 

अब गीता के पिता को मालूम हो गया था कि सबके सामने झूठी शान दिखाने का प्रयास न करके समान व्यवहार करना चाहिए।

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन से कृष्ण ने कहा – संजय ने कहा – करुणा से व्याप्त, शोकयुक्त अश्रुपूरित नेत्रों वाले अर्जुन को देखकर मधुसूदन कृष्ण ने यह शब्द कहा।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भौतिक पदार्थो के प्रति करुणा, शोक तथा अश्रु यह सब असली आत्मा को न जानने के लक्षण है। शाश्वत आत्मा के प्रति करुणा ही आत्म साक्षात्कार है। यह कोई नहीं जानता कि करुणा का प्रयोग कहा होना चाहिए। डूबते हुए व्यक्ति के वस्त्रो के लिए करुणा मूर्खता होगी। यहां मधुसूदन शब्द महत्वपूर्ण है। कृष्ण ने मधु नामक असुर का वध किया था और अब अर्जुन चाह रहा है कि कृष्ण उस अज्ञान रूपी असुर का वध करे जिसने उसे कर्तव्य पथ से विमुख कर रखा है।

 

 

 

किन्तु भगवान कृष्ण अज्ञानी पुरुष के शोक को विनष्ट कर सकते है और इसी उद्देश्य से उन्होंने भगवद्गीता का उपदेश दिया। अज्ञान सागर में गिरे हुए व्यक्ति को केवल उसके बाहरी पहनावे अर्थात उसके स्थूल शरीर की रक्षा करके नहीं बचाया जा सकता है। जो इसे नहीं जानता है और बाहरी पहनावे के लिए शोक करता है वह शुद्र कहलाता है अर्थात वह वृथा ही शोक करता है। अर्जुन क्षत्रिय था अतः उससे ऐसे आचरण की आशा कदापि नहीं थी।

 

 

 

 

यह अध्याय हमे भौतिक शरीर तथा आत्मा के वैश्लेशिक अध्ययन द्वारा आत्म साक्षात्कार का उपदेश प्रदान करता है। जिसकी व्याख्या परम अधिकारी भगवान कृष्ण द्वारा की गई है। यह साक्षात्कार तभी संभव है जब मनुष्य निष्काम भाव से कर्म करे और आत्म बोध को प्राप्त हो।

 

 

 

 

 

2- अर्जुन के मन में कल्मष – भगवान ने कहा – हे अर्जुन ! तुम्हारे मन में यह कल्मष आया कैसे ? यह उस मनुष्य के लिए तनिक भी अनुकूल नहीं है जो जीवन के मूल्य को जानता हो। इससे उच्च लोक की नहीं अपितु अपयश की प्राप्ति होती है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – श्री कृष्ण तथा भगवान अभिन्न है। इसलिए श्री कृष्ण को सम्पूर्ण गीता में भगवान ही कहा गया है। भगवान परम सत्य की पराकाष्ठा है। परम सत्य का बोध ज्ञान की तीन अवस्थाओं में होता है। इन तीन दिव्य पक्षों को सूर्य के दृष्टान्त द्वारा समझाया जा सकता है क्योंकि उसके भी तीन भिन्न-भिन्न पक्ष होते है। यथा – धूप (प्रकाश) सूर्य की सतह तथा सूर्यलोक स्वयं। इसी तरह से परम सत्य को तीन अवस्थाओं में समझा जा सकता है। ब्रह्म या निर्विशेष सर्वव्यापी चेतना, परमात्मा या भगवान का अन्तर्यामी रूप जो समस्त जीवो के हृदय में रहता है तथा भगवान या श्री कृष्ण। श्रीमद्भागवत में (1. 2. 11) परम सत्य की यह धारणा इस प्रकार से बताई गई है।

 

 

 

“परम सत्य का ज्ञाता परम सत्य का अनुभव ज्ञान की तीन अवस्थाओं में करता है और यह सब अवस्थाए एक रूप है। यह ब्रह्म परमात्मा तथा भगवान के रूप में व्यक्त की जाती है।”

 

 

 

इस तरह सूर्य की भी तीन अवस्था होती है। धूप (प्रकाश) सूर्य की सतह तथा सूर्यलोक। जो सूर्य की सतह समझता है वह कुछ आगे बढ़ा हुआ होता है। जो नौसिखिया है वह सूर्य प्रकाश उसकी विश्व व्याप्ति तथा उसके निर्विशेष प्रकृति के अखंड तेज के ज्ञान से ही तुष्ट हो जाता है और जो सूर्यलोक में प्रवेश कर सकता है वह उच्चतम ज्ञानी होता है। नौसिखिया व्यक्ति उसके समान होता है जो परम सत्य के ब्रह्म रूप को ही समझ सकता है। जो व्यक्ति कुछ अधिक जानता है उसे सूर्य के गोले के विषय में ज्ञान रहता है। जिसकी तुलना परम सत्य के परमात्मा स्वरुप से की जाती है। जो व्यक्ति सूर्यलोक के अंतर में प्रवेश कर सकता है उसकी तुलना उस व्यक्ति से की जाती है जो परम सत्य के साक्षात् रूप की अनुभूति प्राप्त करता है।

 

 

 

 

संस्कृत शब्द भगवान की व्याख्या व्यासदेव के पिता पराशर मुनि ने इस प्रकार किया है – समस्त धन, शक्ति, यश, सौंदर्य, ज्ञान तथा त्याग से युक्त परम पुरुष ही भगवान कहलाता है। अतः जिन भक्तो ने परम सत्य के भगवान स्वरुप का साक्षात्कार किया है वह व्यक्ति सर्वोच्च अध्यात्मवादी होता है। यद्यपि परम सत्य के अध्ययन में रत सारे विद्यार्थी एक विषय का अध्ययन कर रहे है। सूर्य तो एक ही है लेकिन उसके द्वारा प्रवाहित श्रेणियाँ भिन्न है। यथा सूर्य प्रकाश, सूर्य का गोला तथा सूर्य लोक की भीतरी बातें यह तीनो स्थिति एक दूसरे से कदापि विलग नहीं हो सकती अथवा इनको एक दूसरे से भिन्न नहीं किया जा सकता है। फिर भी तीनो अवस्थाओं का अध्ययन करने वाला एक ही श्रेणी का होना संभव नहीं है।

 

 

 

 

 

जो व्यक्ति अत्यंत धनवान होता है अत्यंत शक्तिवान अत्यंत सुंदर है और अत्यंत विद्वान विख्यात तथा अत्यंत विरक्ति भी है किन्तु वह दृढ निश्चय के साथ कहने में समर्थ नहीं हो सकता कि उसके पास सारा धन, शक्ति, विद्वता आदि है। ब्रह्मा शिव तथा नारायण कोई भी जीव के समान पूर्ण ऐश्वर्यवान नहीं है। एक मात्र कृष्ण ही ऐसा दावा कर सकते है क्योंकि वह भगवान है। अतः ब्रह्म संहिता में स्वयं ब्रह्मा जी का निर्णय है कि श्री कृष्ण स्वयं भगवान है। न तो कोई उनके तुल्य है न ही उनसे बढ़कर है। वह आदि स्वामी या भगवान है गोविन्द रूप में जाने जाते है और समस्त कारणों के परम कारण है।

 

 

 

 

भागवत में भी भगवान के नाना प्रकार के अवतारों की सूचि प्राप्त होती है किन्तु कृष्ण को आदि भगवान बताया गया है। जिनसे उनको ईश्वर तथा अवतार विस्तार प्राप्त करते है।

 

 

 

 

“ऐसे अनेक पुरुष है जो भगवान के गुणों से युक्त होते है किन्तु कृष्ण तो परम है क्योंकि उनसे बढ़कर कोई भी नहीं है। वह परम पुरुष है और उनका शरीर सच्चिदानंदमय है। वह आदि भगवान गोविन्द है और समस्त कारणों के कारण है।” (ब्रह्म संहिता 5. 1) “यहां पर वर्णित सारे अवतारों की सुचिया या तो भगवान की अंश कलाओ या फिर पूर्ण कलाओ की है। किन्तु कृष्ण तो स्वयं भगवान है।” (भागवत 1. 3. 28) अतः कृष्ण आदि भगवान, परम सत्य, परमात्मा तथा निर्विशेष ब्रह्म दोनों के ही उद्गम स्वरुप है।

 

 

 

 

देहात्म बुद्धि से प्रेरित मनुष्यो को यह ज्ञान नहीं रहता है कि जीवन का उद्देश्य परम सत्य, विष्णु या भगवान का साक्षात्कार है। वह तो भौतिक जगत के वाह्य स्वरुप से मोहित हो जाते है। अतः उन्हें कदापि समझ में नहीं आता है कि मुक्ति किसे कहते है अथवा मुक्ति क्या है। भगवान की उपस्थिति में अर्जुन के द्वारा स्वजनों के लिए शोक करना सर्वथा अशोभनीय कार्य है। अतः कृष्ण ने कुतः शब्द से आश्चर्य व्यक्त किया है। जिनकी सभ्यता आत्मसाक्षात्कार पर निर्भर करती है। आर्य जैसी सभ्य जाति के किसी व्यक्ति से ऐसी मलिनता की उम्मीद नहीं की जाती। आर्य शब्द उन व्यक्तियों पर लागू होता है जो जीवन के मूल्य को जानते है।

 

 

 

 

जिन पुरुषो को भौतिक बंधन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए कोई ज्ञान नहीं होता है वह अनार्य कहलाते है। अर्जुन की युद्ध से विमुख होने की कायरता अनार्यो के लिए ही शोभा देने वाली हो सकती है। यद्यपि अर्जुन क्षत्रिय था किन्तु युद्ध से विचलित होकर वह अपने कर्तव्य पालन से विमुख हो रहा था। कर्तव्य पथ से इस प्रकार न तो आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने में सहायक नहीं होता है और न ही इस प्रकार से ख्याति ही अर्जित की जा सकती है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन द्वारा अपने स्वजनों पर इस प्रकार की करुणा अनुमोदन नहीं किया है।

 

 

 

 

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