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Othello By William Shakespeare in Hindi Pdf / ओथेलो बुक्स फ्री डाउनलोड

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मित्रों इस पोस्ट में Othello By William Shakespeare in Hindi Pdf दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Othello By William Shakespeare in Hindi Pdf फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Othello By William Shakespeare in Hindi Pdf

 

 

 

 

 

 

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Othello By William Shakespeare in Hindi Pdf
ओथेलो बुक्स फ्री डाउनलोड
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Othello Malayalam book PDF Download

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अनेक जन्मो के पश्चात् सिद्धि लाभ – श्री कृष्ण कहते है कि जब योगी समस्त कल्मष से शुद्ध होकर सच्ची निष्ठा से आगे प्रगति करने का प्रयास करता है तो अंततोगत्वा अनेकानेक जन्मो जन्मो के अभ्यास के पश्चात् सिद्धि लाभ करके वह परम गंतव्य को प्राप्त करता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सदाचारी, धनवान या पवित्रकुल में उत्पन्न पुरुष योगाभ्यास के अनुकूल पारिस्थिति से सचेष्ट हो जाता है अतः उसका दृढ संकल्प अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए होता है और इस प्रकार वह अपने को भौतिक कल्मष से शुद्ध कर लेता है।

 

 

 

कृष्ण भावनामृत ही समस्त कल्मष से मुक्त होने की पूर्ण अवस्था है। समस्त कल्मष से मुक्त होने पर उसे परम सिद्धि कृष्ण भावनामृत प्राप्त होती है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता में (7. 28) हुई है।

 

 

येषां तवंतगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम।

ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढ़व्रताः।।

 

“अनेक जन्मो तक पुण्य कर्म करने से जब कोई समस्त कल्मष तथा मोहमय द्वंदों से पूर्णतया मुक्त हो जाता है तभी वह भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग पाता है।”

 

 

 

46- तपस्वी, ज्ञानी, सकाम कर्मी से बड़ा (योगी) –  श्री कृष्ण कहते है – योगी पुरुष, तपस्वी, ज्ञान तथा सकाम कर्मी से बढ़कर होता है अतः हे अर्जुन ! तुम सभी प्रकार से योगी बनो।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का अर्थ – प्रायः जब हम योग का नाम लेते है तब हम अपनी चेतना को परम सत्य के साथ जोड़ने की बात करते है। जब यह योग पद्धति सकाम कर्मो से संबंधित होती है तो कर्मयोग कहलाती है।

 

 

 

विविध अभ्यास करने वाले इस पद्धति की ग्रहण की गई विशेष विधि के अनुसार विभिन्न नमो से पुकारते है। जब यह भगवान की भक्ति से संबंधित होती है तब उसे भक्ति योग कहा जाता है। भक्ति योग या कृष्ण भावनामृत समस्त योग की परम सिद्धि है। इस भक्तियोग को योगो का राजा कहा जाता है।

 

 

 

भक्तियोग पूर्ण ज्ञान है अतः इससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। आत्मज्ञान के बिना तपस्या अपूर्ण रहती है। परमेश्वर के प्रति समर्पित हुए बिना ज्ञान योग भी पूर्ण नहीं होता है।

 

 

 

भगवान ने यहां पर योग की श्रेष्ठता की पुष्टि की है। किन्तु उन्होंने इस बात का उल्लेख कही नहीं किया कि योग भक्ति से श्रेष्ठ है। सकाम कर्म भी बिना कृष्ण भावनामृत के समय का अपव्यय है। अतः यहां पर योग का सर्वाधिक प्रशंसित रुपभक्ति योग है और इसकी अधिक व्याख्या अग्रभाग में वर्णित की जाएगी।

 

 

 

Note- हम कॉपीराइट का पूरा सम्मान करते हैं। इस वेबसाइट Pdf Books Hindi द्वारा दी जा रही बुक्स, नोवेल्स इंटरनेट से ली गयी है। अतः आपसे निवेदन है कि अगर किसी भी बुक्स, नावेल के अधिकार क्षेत्र से या अन्य किसी भी प्रकार की दिक्कत है तो आप हमें [email protected] पर सूचित करें। हम निश्चित ही उस बुक को हटा लेंगे। 

 

 

 

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