Osho Dhyan Vigyan Pdf Free Download

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Osho meditation book pdf in Hindi / Dhyan ka Vigyan Osho pdf

 

 

 

Osho Dhyan Vigyan Pdf Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

अर्जुन कह रहा है –  जिस प्रकार से नदियों की अनेक तरंगे समुद्र में प्रवेश करती है। उसी प्रकार यह समस्त महान योद्धा भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान के प्रज्वलित मुख में सबको प्रवेश करते हुए देखकर उसकी तुलना नदियों की तरंगो से करता है जो अपनी अनेक तरंगो के साथ ही समुद्र में प्रवेश करती है।

 

 

 

 

29- पतिगो का प्रज्वलित अग्नि में कूदना (अपने विनाश के लिए) – अर्जुन कह रहा है – मैं आपके मुख में उसी प्रकार से प्रविष्ट होते हुए देख रहा हूँ जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में कूद पड़ते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कुरुक्षेत्र के युद्ध में सभी का विनाश होना तय है, इसका आभास अर्जुन को पहले ही भगवान द्वारा कराया गया है। अब अर्जुन सभी को भगवान के प्रज्वलित मुख में प्रविष्ट होते हुए देख रहा है जिस तरह से पतिंगा प्रज्वलित अग्नि में कूद पड़ते है।

 

 

 

 

30- भगवान के तेज से सारे ब्रह्माण्ड का आपूरित होना – अर्जुन कह रहा है – हे विष्णु ! मैं देखता हूँ कि आप अपने प्रज्वलित मुखो से सभी दिशाओ के लोगो को निगलते जा रहे है। आप सारे ब्रह्माण्ड को अपने तेज से आपूरित करके अपनी विकराल झुलसाती किरणों सहित प्रकट हो रहे है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान (कृष्ण) का तेज इतना प्रचंड था कि उससे सारा ब्रह्माण्ड आपूरित हो रहा था और भगवान अपनी तीव्र किरणों के साथ जो समस्त ब्रह्मांडो को झुलसाने की क्षमता रखती थी, जिनसे सारा ब्रह्माण्ड झुलस रहा था, उन्ही के साथ ही भगवान प्रकट हो रहे है। अर्जुन कह रहा है – हे विष्णु ! मैं देखता हूँ कि आप अपने प्रज्वलित मुखो से सभी दिशाओ के लोगो को निगलते जा रहे है।

 

 

 

 

इतने उग्र रूप में आप कौन है? (अर्जुन द्वारा भगवान से पूछना?) – अर्जुन कह रहा है – हे देवेश ! मुझे कृपा करके बताइये कि इतने उग्र रूप में आप कौन है।

 

 

 

कृपा करके मुझपर प्रसन्न हो। आप आदि भगवान है। मैं आपको जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि आपका प्रयोजन क्या है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान के इतने उग्र रूप को देखकर अर्जुन नहीं जान पा रहा है कि वह कौन है। वह पूछता है – आप आदि भगवान है, मैं आपको जानना चाहता हूँ मैं यह नहीं जान पा रहा हूँ कि आपका प्रयोजन क्या है।

 

 

 

 

32- समस्त जगत को विनष्ट करने वाला काल (भगवान) – भगवान कह रहे है कि – मैं सभी जगत को विनष्ट करने वाला काल हूँ और मैं यहां समस्त लोगो को विनाश करने के लिए ही आया हूँ। यहां तुम्हारे (पांडवो) के सिवा दोनों पक्षों के सारे लोग (योद्धा) मारे जाएंगे।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अनंत सारे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा अन्य सभी परमेश्वर द्वारा काल कवलित होते है। ईश्वर का यह रूप सबका भक्षण करने वाला है और यहां पर कृष्ण अपने को सर्वभक्षी के रूप में प्रस्तुत करते है।

 

 

 

केवल कुछ पांडवो के अतिरिक्त युद्ध भूमि में आए सभी लोग उनके द्वारा भक्षित होंगे। यद्यपि अर्जुन जानता था कि कृष्ण उसके मित्र तथा भगवान है। तो भी वह कृष्ण के विविध रूपों को देखकर चकित था।

 

 

 

इसलिए ही उसने इस विनाशकारी शक्ति के उद्देश्य के बारे में पूछ-ताछ की वेदो में लिखा है कि परम सत्य हर वस्तु को यहां तक कि ब्राह्मणो को भी नष्ट कर देते है।

 

 

 

 

यहां अर्जुन लड़ने के पक्ष में न था यद्यपि वह युद्ध न करना ही श्रेयस्कर समझता था क्योंकि तब किसी प्रकार की निराशा नहीं होती।

 

 

 

किन्तु भगवान का उत्तर है कि यदि वह नहीं लड़ता है तो भी सारे लोग उनके ग्रास बनते या काल से कदापि नहीं बचते? क्योंकि यही उनकी इच्छा है।

 

 

 

यदि अर्जुन नहीं लड़ता तो वह सारे लोग अन्य विधि से मरते। मृत्यु रोकी नहीं जा सकती है। चाहे वह (अर्जुन) लड़े या नहीं। वस्तुतः वह सारे लोग पहले से ही मृत है। काल विनाश है और परमेश्वर की इच्छानुसार सारे संसार को विनष्ट होना है। यही प्रकृति का नियम है।

 

 

 

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