Advertisements

Osho Books / Lal Kitab Pdf Hindi / Gayatri Chalisa PDF / Bhagwat Geeta PDF

Advertisements

मित्रों इस पोस्ट में Osho Books दिया जा रहा है। आप Osho Books डाउनलोड कर सकते है।

 

Advertisements

 

 

Osho Books पीडीऍफ़ 

 

 

Advertisements
Osho Books
यहां से लौकिक जीवन की कला डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

Osho Books
न जन्म न मृत्यु यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

प्रेम है द्वार प्रभु का 
प्रेम है द्वार प्रभु का यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

मैं कौन हूँ ?
यहां से मैं कौन हूँ? डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

मैं कहता आंखन देखी 
मैं कहता आंखन देखी यहां से डाउनलोड करे।
Advertisements

 

 

 

 

 

 

 

Gayatri Chalisa PDF Free

 

 

गायत्री चालीसा यहां से फ्री डाउनलोड करें। 

 

 

Bhagwat Geeta In Hindi PDF

 

 

भागवत गीता हिंदी Pdf Free Download

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

दृढ़ता से स्थिर होना (चेतना में) – श्री कृष्ण कहते है जिस प्रकार कछुआ अपने अंगो को संकुचित करके खोल के भीतर कर लेता है। उसी तरह जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों को इन्द्रिय विषयो से खींच लेता है। वह पूर्ण चेतना में दृढ़ता पूर्वक स्थिर होता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – शास्त्रों में अनेक आदेश है उनमे से कुछ “करो” तथा कुछ “न करो” से संबंधित है। जब तक कोई इन ‘करो या न करो’ का पालन नहीं कर पाता और इन्द्रिय भोग पर संयम नहीं बरतता है तब तक उसका कृष्ण भावनामृत में स्थिर हो पाना असंभव है। किसी योगी भक्त या आत्म सिद्ध व्यक्ति की कसौटी यह है कि वह  अपनी योजना के अनुसार इन्द्रियों को वस में कर सके किन्तु अधिकांश व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के दास बने रहते है और इन्द्रियों के कहने पर ही चलते है। यह इस प्रश्न का उत्तर है कि योगी किस प्रकार से स्थित होता है।

 

 

 

 

यहां पर सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कछुए का है – जो किसी भी समय अपने अंगो को समेट सकता है और विशिष्ठ उद्देश्य के लिए उन्हें प्रकट कर सकता है। इसी प्रकार कृष्ण भावनाभावित व्यक्तियों की इन्द्रिया भी केवल भगवान की विशिष्ठ सेवा के लिए काम आती है। अन्यथा उनका संकोच कर लिया जाता है।

 

 

 

 

यहां इन्द्रियों की तुलना विषैले सर्पो से की गई है। वह अत्यंत स्वतंत्रता पूर्वक तथा बिना किसी नियंत्रण के कर्म में प्रवित्त होना चाहती है। योगी या भक्त को इन इन्द्रिय विषय रूपी सर्पो को वश में करने के लिए एक सपेरे के भांति अत्यंत प्रबल होना चाहिए। वह उन्हें कभी भी कार्य करने की छूट नहीं देता है। अर्जुन को उपदेश दिया जा रहा है वह अपनी इन्द्रियों को आत्मसंतुष्टि में न करके भगवान की सेवा में लगाए। अपने इन्द्रियों को सदैव ही भगवान की सेवा में लगाए रखना कूर्म द्वारा प्रस्तुत दृष्टान्त के अनुरूप ही है। जो स्वयं अपनी इन्द्रियों को समेटे रखता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Leave a Comment

error: Content is protected !!