Osho Books Pdf Hindi Free Download / श्री ओशो बुक्स पीडीएफ फ्री

मित्रों इस पोस्ट में Osho Books Pdf दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से ओशो बुक्स पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं और ओशो के विचारों को समझ सकते हैं।

 

 

 

Osho Books Pdf Hindi Free ओशो बुक्स पीडीएफ फ्री डाउनलोड 

 

 

 

1- अलौकिक जीवन की कला 

 

2- न जन्म न मृत्यु 

 

3- प्रेम है द्वार प्रभु का 

 

4- मैं कौन हूँ ?

 

5- मैं कहता आंखन देखी 

 

 

 

ओशो के बारे में Osho Hindi Pdf

 

 

 

ओशो महान व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति थे। उनके तर्को के समक्ष बड़ो-बड़ो को दिन में तारे नजर आने लगते थे। आम आदमी तो अपने देश में जमीन ख़रीदे वह भी बहुत बड़ी बात है और उधर मध्य प्रदेश (mp) के कुचवाड़ा में जन्मे रजनीश (ओशो) ने अमेरिका में 64 हजार एकड़ में “रजनीश पुरम” बसा दिया। ओशो की पुण्यतिथि 19 जनवरी को आती है।

 

 

 

ओशो ने दुनिया भर के ज्ञानियों को समझने के लिए डेढ़ लाख किताबे पढ़ी। जो उन्हें सही लगा उसे अपनाया और जो खराब लगा उसे भुला दिया। ओशो की एक लाइब्रेरी है और उसका नाम “लाआत्सु पुस्तकालय” है।

 

 

 

ओशो ने अपनी मृत्यु से पुर्व यह कहा था “पुस्तकालय आम लोगों के लिए बंद कर दी जाए। इसे सिर्फ उन्हें ही दिया जाय जो शोधि हो अर्थात शोध कर रहे हो और उन्हें भी एक बार में ज्यादा से ज्यादा 3 किताबे दी जाय।”

 

 

 

ओशो की प्रिय किताबे मिखाइल नाइमे की “द बुक ऑफ़ मिरदाद” जिद्दू कृष्ण मूर्ति की “द फर्स्ट एन्ड लास्ट फ्रीडम” उमर खय्याम की “रुबाइयत” आदि है। इसके अतिरिक्त ओशो ने अरस्तू, नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर सुकरात, फ्रेडरिक, दोस्तों वस्की आदि सभी को पढ़ा है।

 

 

 

ओशो की एक बेहद खास बात है कि उन्होंने तमाम किताबे पढ़ी जरूर लेकिन उन्होंने एक भी किताब नहीं लिखी बल्कि उन्होंने सारा ज्ञान रिकार्ड करवाया। उनकी सभी किताबे रिकॉर्डेट आडियो के आधार पर लिखी हुई है।

 

 

 

ओशो ने डेढ़ लाख किताबो में हिंदी की एक मात्र किताब पढ़ी और वह थी “नंदी के द्वीप”। इसे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने लिखा है। भले ही ओशो ने मात्र एक हिंदी की किताब पढ़ी परन्तु उन्होंने इस किताब के तारीफों का पुल बांध दिया। उन्हें यह किताब इतनी अच्छी लगी कि इसे टालस्टाय और चेखब के उपन्यासों से भी बेहतर बता दिया।

 

 

 

Vigyan Bhairav Tantra Hindi Pdf विज्ञानं भैरव तंत्र Pdf

 

 

 

भगवान शिव ने उमा को विज्ञान भैरव तंत्र के विषय में बताया था।

 

1- हे शक्ति – सर्वशक्तिमान सत्ता में सब कुछ विलीन हो रहा है। प्रत्येक आभास सीमित है।

2- जानने के प्रारंभ में ही अपनी सम्पूर्ण चेतना से कामना के बारे में जानो।

3- जब तक संपूर्ण अस्तित्व आत्मा में परिपूर्ण न हो जाय तब तक अपने भीतर बाहर एक साथ आत्मा की कल्पना करो।

4- जो हर जगह व्याप्त है उस सर्वज्ञ को ही सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी जानो।

5- सर्वव्यापी आत्मा और तुम्हारा रूप दोनों इस चेतना से निर्मित है। सत्य और रूप अविभक्त है।

6- आत्म चिंता का त्याग करो और हर मनुष्य की चेतना को अपनी ही चेतना समझो।

7- चेतना से ही स्वरुप प्राप्त होता है। चेतना के सिवा जगत में कुछ भी नहीं है। चेतना नहीं रहने पर सिर्फ जड़ता रह जाती है। चेतना का श्रोत चैतन्य को ढूंढो ?

8- प्रत्येक की मार्ग दर्शक सिर्फ चेतना ही है। अन्य कुछ भी नहीं।

9- चेतना नहीं रहने पर कोई भी रूप रिक्त दीवार के अलावा कुछ भी नहीं है। चेतना से ही रिक्त स्थान भरा हुआ है।

10- इस रिक्त ब्रह्माण्ड में तुम्हारा मन आदि अनंत रूप से कौतुक करता है अतः हे लीलामयी आप स्वतः ही लीला करो।

11- सब कुछ त्यागकर सिर्फ ‘तुम’ बन जाओ, जहां हे प्रिये – अस्तित्व और अज्ञान, ज्ञान और अस्तित्व के लिए कोई स्थान ही न रहे।

 

 

 

ध्यान योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

Osho Books Pdf Hindi Free
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आकांक्षा संग्रह भाव से मुक्त – श्री कृष्ण कहते है – योगी जन को चाहिए कि वह सदैव अपने शरीर, मन तथा आत्मा को परमेश्वर में लगाए, एकांत स्थान में रहे और बड़ी ही सावधानी के साथ अपने मन को वश में करे, उसे समस्त आकांक्षाओं तथा संग्रह भाव की इच्छाओ से मुक्त होना चाहिए।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण अनुभूति ब्रह्म, परमात्मा तथा श्री भगवान के विभिन्न रूपों में होती है। संक्षेप में कृष्ण भावनामृत का अर्थ है – भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में अनवरत प्रवृत्त रहना। उसका परम सत्ता विषयक पूर्ण होता है जबकि निर्विशेषवादी तथा ध्यान योगी अपूर्ण रूप में कृष्ण भावना भावित होते है।

 

 

 

 

किन्तु जो लोग निराकार ब्रह्म अथवा अंतर्यामी परमात्मा के प्रति आसक्त होते है वह भी आंशिक रूप से कृष्ण भावना भावित होते है क्योंकि निराकार ब्रह्म कृष्ण की आध्यात्मिक किरण है और परमात्मा कृष्ण का सर्वव्यापी आशिक विस्तार होता है। इस निर्विशेष वादी तथा ध्यान योगी भी अपरोक्ष रूप से कृष्ण भावना भावित होते है।

 

 

 

 

इतने पर भी सभी को अपने-अपने कार्यो में निरंतर लगे रहने का आदेश दिया जाता है। जिससे वह सभी देर सबेर सिद्धि प्राप्त कर सके। प्रत्यक्ष कृष्ण भावना भावित व्यक्ति सर्वोच्च योगी होता है क्योंकि ऐसा भक्त जानता है कि ब्रह्म और परमात्मा क्या है। योगी का पहला कर्तव्य है कि वह कृष्ण पर अपना ध्यान सदैव एकाग्र रखे। उसे कृष्ण का ही चिंतन करना चाहिए और कृष्ण को एक क्षण के लिए भी नहीं भूलना चाहिए।

 

 

 

 

योगी को चाहिए कि वह अनुकूल परिस्थितियों को ग्रहण करे और प्रतिकूल परिस्थिति का अवश्य त्याग करे, जिससे उसकी अनुभूति पर कोई प्रभाव न पड़े। पूर्ण संकल्प करने के पश्चात उसे व्यर्थ की वस्तुओ के पीछे भागने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिए जो उसे परिग्रह भाव में फंसाने की कोशिश करे। मन को एकाग्र करने के लिए एकांत वास करना चाहिए और बाहरी उपद्रव से बचाना चाहिए। परमेश्वर में मन की एकाग्रता ही समाधि कहलाती है।

 

 

 

 

यह सारी सिद्धिया तथा सावधानिया तभी पूर्ण रूपेण कार्यान्वित हो सकती है जब मनुष्य प्रत्यक्षतः कृष्ण भावना भावित हो क्योंकि साक्षात् कृष्ण भावनामृत का अर्थ है – आत्मोसर्ग जिसमे परिग्रह भाव के लिए के लिए अंश मात्र भी स्थान नहीं होता। श्रील रूप गोस्वामी कृष्ण भावनामृत का लक्षण इस प्रकार देते है – “जब मनुष्य किसी वस्तु के प्रति आसक्त न रहते हुए कृष्ण से संबंधित हर वस्तु को स्वीकार कर लेता है। तभी वह परिग्रहत्व से ऊपर उठ जाता है। दूसरी ओर जो व्यक्ति कृष्ण से संबंधित प्रत्येक वस्तु को बिना जाने त्याग देता है उसका वैराग्य पूर्ण नहीं होता है।” (भक्ति रसामृत सिंधु 2. 255-256)

 

 

 

 

इस प्रकार वह अपने लिए किसी वस्तु की लालसा नहीं करता है। वह सदैव भौतिक वस्तुओ से दूर रहता है और कृष्ण भावनामृत से रहित व्यक्तियों से किसी प्रकार का सरोकार नहीं रखने के कारण सदा अकेला रहता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति भली भांति जानता है कि प्रत्येक वस्तु श्री कृष्ण की है। फलस्वरूप वह सभी प्रकार के परिग्रह भाव से सदा ही मुक्त रहता है। वह जानता है कि किस प्रकार से कृष्ण भावनामृत के अनुरूप वस्तुओ को स्वीकार किया जाता है और कृष्ण भावनामृत के प्रतिकूल वस्तुओ का परित्याग कर दिया जाता है अतः कृष्ण भावनामृत में रहने वाला व्यक्ति पूर्ण रूप से योगी होता है।

 

 

 

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