Online Meaning in Hindi / ऑनलाइन को हिंदी में क्या कहते हैं ?

मित्रों इस पोस्ट में Online Meaning in Hindi दी गयी है।  आप इस पोस्ट को पढ़कर ऑनलाइन को हिंदी में क्या कहते हैं ? जान सकेंगे।

 

 

 

Online Ko Hindi Mein Kya Kahenge? ऑनलाइन को हिंदी में क्या कहेंगे ?

 

 

 

Online यह शब्द आज के समय में बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है। आपने अक्सर सुना होगा कि लोग कहते है, “Online आ जाओ” कभी आपने ध्यान दिया कि Online का मतलब क्या होता है ?

 

 

 

 

वैसे देखा जाए तो Online का मतलब लकीर पर हो सकता है या Line पर भी हो सकता है। Online होने का तात्पर्य यह है कि Internet के किसी प्लेटफार्म पर उपस्थित होना जैसे Fb Online आ जाओ, Whatsapp पर Online आ जाओ जैसे शब्द आपने सुने भी होंगे और बोले भी होंगे।

 

 

 

 

परन्तु Online का सही अर्थ यह होता है कि Internet से जुड़ा होना और यह Connection किसी भी तरह के माध्यम से हो सकता है, जैसे Facebook Online या Twitter Online या फिर वह एक Phone Line ही क्यों ना हो या फिर Wireless Connection . इस तरह से आम भाषा में Online का अर्थ नेट पर होना (Internet पर उपस्थित होना) ही होता है।

 

 

 

 

कुछ सवाल ऐसे होते है जिसे हम अपने रोजमर्रा की बातचीत में शामिल तो करते है लेकिन उसका मतलब नहीं जानते है या फिर यह भी कह सकते है कि उसके मतलब के आस-पास भी नहीं होते है और ऐसा ही एक प्रश्न है Online का क्या मतलब होता है ?

 

 

 

 

कही दूर-दूर तक दिमाग के किसी कोने में इसका मतलब समझ में आया ? नहीं न ? यह प्रश्न ही ऐसा है लेकिन हमारे रोजमर्रा की बातचीत में शामिल है।

 

 

 

 

Note – Online का अर्थ (Meaning के हिसाब से) लकीर पर होगा और Internet की दुनिया में उपस्थित होना (जैसे Online हूँ  या Online आ जाओ) होता है।

 

 

 

दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

महान आत्माओ का अनुसरण – श्री कृष्ण कह रहे है प्राचीन काल में समस्त मुक्तात्माओ ने मेरी दिव्य प्रकृति को जान करके ही कर्म किया, अतः तुम्हे चाहिए कि उनके पद चिन्हो का अनुसरण करते हुए अपने कर्तव्य का पालन करो।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्द का तात्पर्य – मनुष्य की दो श्रेणियाँ होती है। कुछ के मन में दूषित विचारो की लंबी श्रृंखला की भरमार रहती है और कुछ भौतिक दृष्टि से स्वतंत्र रहते है। कृष्ण भावनामृत इन दोनों श्रेणियों के मनुष्यो के लिए समना रूप से ही लाभदायक है। जिनके मन में दूषित विचार भरे हुए है। उन्हें चाहिए कि भक्ति के अनुष्ठानो का पालन करते हुए क्रमिक शुद्धिकरण के लिए कृष्ण भावनामृत को अवश्य ग्रहण करे।

 

 

 

 

मुर्ख व्यक्ति या कृष्ण भावनामृत में नवदीक्षित व्यक्ति प्रायः कृष्ण भावनामृत का पूरा ज्ञान प्राप्त किए बिना ही कार्य से विरत होना चाहते है और जिनके मन पहले ही ऐसी अशुद्धियों से स्वच्छ हो चुके है वे उसी कृष्ण भावनामृत के सागर में गोते लगाते हुए अग्रसर होते रहे, जिससे अन्य लोग भी उनके आदर्श कार्यो में निमग्न होने का अनुसरण करते हुए जीवन क्षेत्र में आध्यात्मिक लाभ उठा सके।

 

 

 

किन्तु भगवान ने युद्ध क्षेत्र के कार्य से विमुख होने की अर्जुन की इच्छा का तनिक भी समर्थन नहीं किया है। यहां आवश्यकता इस बात की है कि यह ज्ञात और ज्ञान होना आवश्यक है कि कैसे और किस तरह से कार्य किया जाना चाहिए।

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत के कार्य से विमुख होकर एकांत में बैठकर कृष्ण भावनामृत का प्रदर्शन करना, कृष्ण के लिए कार्यरत होने की अपेक्षा कम ही महत्वपूर्ण है। यहां पर अर्जुन को सलाह दी जा रही है कि वह भगवान के अन्य पूर्ण के शिष्यों यथा सूर्यदेव विवस्वान के पद चिन्हो का अनुसरण करते हुए कृष्ण भावनामृत में कार्य संपन्न करे।

 

 

 

 

अतः भगवान उसे सूर्यदेव के कार्यो को संपन्न करने के लिए आदेशित करते है जिसे सूर्यदेव ने उनसे लाखो वर्ष पूर्व सीखा था। यहां पर भगवान कृष्ण के ऐसे सारे शिष्यों का उल्लेख पूर्ववर्ती मुक्त पुरुषो के रूप में हुआ है, जो कृष्ण द्वारा नियत कर्मो की सम्पन्नता हेतु लगे हुए थे।

 

 

 

 

 

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