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Navnath Mantra Pdf / नवनाथ मंत्र Pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Navnath Mantra Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Navnath Mantra Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  शाबर मंत्र भाग 7 Pdf पढ़ सकते हैं।

 

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Navnath Mantra Pdf / नवनाथ मंत्र पीडीएफ

 

 

 

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शाबर मंत्र भाग 7 Pdf
यहां से शाबर मंत्र भाग 7 Pdf डाउनलोड करे।
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Navnath Mantra Pdf
यहां से नवनाथ शाबरी विद्या मंत्र pdf Download करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

 

1- इंद्र के वचन सुनकर बृहस्पति जी मुस्कराए। उन्होंने हजार नेत्र वाले इंद्र को ज्ञान रूपी नेत्र से रहित (मुर्ख) समझा और कहा – हे देवराज! माया के स्वामी श्री राम जी के सेवक के साथ यदि कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ऊपर ही आ जाती है।

 

 

 

 

2- उस समय पिछली बार श्री राम जी का रुख जानकर ही कुछ किया था, परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि होगी। हे देवराज! श्री राम जी का स्वभाव सुनो। वह अपने प्रति किए हुए अपराध से कभी भी रुष्ट नहीं होते है।

 

 

 

 

3- पर जो कोई उनके भक्त के साथ अपराध करता है, वह श्री राम जी की क्रोध से खत्म हो जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास (कथा) प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासा जी जानते है।

 

 

 

 

4- सारा जगत श्री राम जी को जपता है, लेकिन वह श्री राम जी जिनको जपते है। उन भरत जी के समान श्री राम जी को कौन प्रिय होगा।

 

 

 

 

218- दोहा का अर्थ-

 

 

 

हे देवराज! रघुकुल श्रेष्ठ श्री राम जी के भक्त की बात बिगाड़ने का विचार मन में भी न लाइए। ऐसा करने से लोक में अपयश और परलोक में दुःख होगा और शोक का सामान प्रतिदिन ही बढ़ता ही जायेगा।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- हे देवराज! हमारा उपदेश सुनो। श्री राम जी को अपना सेवक परम प्रिय है, वह अपने सेवक की सेवा करने से सुख मानते है और सेवक के साथ बैर करने से बहुत ही बैर मानते है।

 

 

 

 

2- यद्यपि यह सम है – उनमे रोग, द्वेष कुछ नहीं है और वह किसी के पाप-पुण्य, गुण-दोष कुछ भी ग्रहण नहीं करते है। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान बना रखा है जो जैसा कर्म करता है वह वैसा ही फल भोगता है।

 

 

 

 

3- यद्यपि उनका व्यवहार भक्त और अभक्त के अनुसार ही सम और विषम होता है। वह भक्त को प्रेम से गले लगा लेते है और अभक्त को खत्म करके (मोक्ष) देते है। गुण रहित, मान रहित, निर्लेप और सदा एक रस भगवान श्री राम भक्त के प्रेम के वश ही सगुण हुए है।

 

 

 

 

4- श्री राम जी सदा अपने सेवको (भक्तो) की रुचि का ध्यान रखते आये है। वेद, पुराण, संत और देवता इसके साक्षी है। ऐसा जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरत जी के चरणों में सुंदर प्रीति करो।

 

 

 

 

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