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Natya Shastra Pdf Hindi Free / नाट्य शास्त्र पीडीएफ फ्री डाउनलोड

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मित्रों इस पोस्ट में Natya Shastra Pdf Hindi Free दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Natya Shastra Pdf Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

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Natya Shastra Pdf Hindi Free नाट्य शास्त्र पीडीएफ फ्री डाउनलोड 

 

 

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नाट्य शास्त्र की रचना भरत मुनि ने की है। इसमें कुल 36 अध्याय है। प्रथम अध्याय में नाट्य की उत्पत्ति द्वितीय में मंडप विधान अगले तृतीय अध्यायों में नाट्य के आरम्भ से पूर्व की प्रक्रिया का वर्णन है। छठे और सातवे अध्याय में रस और भावो के बारे में बताया गया है।

 

 

 

आठवे और नौवे अध्याय में उपांग और अंगो द्वारा अभिनय के बारे में बताया गया है। उसके बाद के अध्याय में गति, छंद, भेद, कलेवर आदि के बारे में बताया गया है।

 

 

 

 

इस ग्रंथ की मान्यता इतनी अधिक है कि इसे ‘भरत सूत्र’ या नाट्य संहिता भी कहा जाता है। इसमें 12000 पद्य और कुछ गद्य भी है। इसीलिए इसे द्वादश सहस्त्री संहिता भी कहा जाता है।

 

 

 

 

दिव्य ज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

कर्म फल का परित्याग – श्री कृष्ण कहते है, हे धनंजय ! जो व्यक्ति अपने कर्म फलो का परित्याग करते हुए भक्ति करता है और जिसके शंसय दिव्यज्ञान द्वारा विनष्ट हो चुके है वही वास्तव में आत्मपरायण है। वह कर्मो के बंधन से नहीं बंधता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो मनुष्य भगवद्गीता का उसी रूप में पालन करता है जिस रूप में भगवान श्री कृष्ण ने दी थी, तो वह दिव्यज्ञान की कृपा से समस्त शंसयो से मुक्त हो जाता है। पूर्णतः कृष्ण भावना भावित होने के कारण उसे श्री भगवान के अंश के रूप में अपने स्वरुप का ज्ञान पहले ही हो जाता है। अतएव निःसंदेह वह कर्म बंधन से मुक्त है।

 

 

 

 

42- सनातन योग – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – हे पार्थ – तुम्हारे हृदय में जो अज्ञान के कारण शंसय उठे है उन्हें ज्ञान रूपी शस्त्र से काट डालो। हे भारत तुम योग समन्वित होकर खड़े हो जाओ और युद्ध करो।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – इस अध्याय में जिस योग पद्धति का उपदेश हुआ है वह सनातन योग कहलाता है। इस योग में दो तरह के कर्म किए जाते है – एक द्रव्य यज्ञ और दूसरा आत्मज्ञान यज्ञ जो विशुद्ध आध्यात्मिक कर्म है। किन्तु जब कोई आध्यात्मिक उद्देश्य या भक्ति से ऐसा यज्ञ करता है तो वह पूर्ण यज्ञ होता है। यदि आत्म साक्षात्कार के लिए द्रव्ययज्ञ नहीं किया जाता है तो ऐसा यज्ञ भौतिक बन जाता है।

 

 

 

आध्यात्मिक क्रियाए भी दो प्रकार की होती है – आत्मबोध या अपने स्वरुप को समझना तथा श्री भगवान विषयक सत्य को समझना। जो व्यक्ति भगवद्गीता के मार्ग में चलता है वह इन ज्ञान की दोनो अवस्थाओ को समझने में सफल रहता है।

 

 

 

इस अध्याय के प्रारंभ में स्वयं भगवान ने अपने दिव्य कार्य कलापो का वर्णन किया है। जो व्यक्ति गीता के उपदेशो को समझने का प्रयास नहीं करता है वह मनुष्य श्रद्धा विहीन होता है और जो भगवान द्वारा उपदेश देने पर भी भगवान के सच्चिदानंद स्वरुप को नहीं समझ पाता है ऐसा समझना चाहिए कि वह व्यक्ति निपट मुर्ख है।

 

 

 

किन्तु इन सब कार्य कलापो के भीतर सबसे महत्वपूर्ण कारक आत्मसाक्षात्कार है जो उद्देश्य को खोजने में सफल रहता है वही भगवद्गीता का वास्तविक पाठक है। उसके लिए भगवान के अंश स्वरुप आत्मज्ञान को प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती है। ऐसा ज्ञान लाभप्रद है क्योंकि ऐसा व्यक्ति भगवान के दिव्य कार्य कलापो को समझ सकता है।

 

 

 

कृष्ण भावनामृत के सिद्धांतो को स्वीकार करके अज्ञान को क्रमशः दूर किया जा सकता है। यह कृष्ण भावनामृत विविध देवयज्ञ, ब्रह्मयज्ञ, इन्द्रिय संयम यज्ञ, गृहस्थ यज्ञ, ब्रह्मचर्य यज्ञ, योग साधना यज्ञ, तपस्या यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, द्रव्य यज्ञ तथा वर्णाश्रम धर्म में भाग लेकर कृष्ण भावनामृत को जागृत किया जा सकता है। यह सब यज्ञ कहलाते है और यह सब नियमित कर्म पर आधारित है।

 

 

 

किन्तु जो श्री कृष्ण को प्रमाण स्वरुप नहीं मानता वह नीचे गिर जाता है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह सेवा तथा समर्पण समेत किसी प्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवद्गीता या अन्य किसी शास्त्र का अध्ययन करे। अतः गीता में ही व्यक्त भगवद्गीता के पथ का अनुसरण करना चाहिए और उन ऐसे व्यक्तियों से सावधानी बरतनी चाहिए जो आत्म श्लाघा वश अन्य लोगो को वास्तविक पथ से विपथ करने का प्रयास करते है।

 

 

 

प्रामाणिक गुरु अनंत काल से चली आ रही गुरु परंपरा में होता है और वह परमेश्वर के उन उद्देश्यों से तनिक भी विपथ का अनुगमन नहीं करता है जिन्हे श्री भगवान ने (ज्ञान) उपदेश के द्वारा उन्होंने लाखो वर्ष पूर्व सूर्य देव को प्रदान किया था और जिनसे भगवद्गीता का उपदेश इस धरा-धाम पर आये।

 

 

 

भगवान निश्चित रूप से पूर्ण रूपेण परम पुरुष है और उनके कार्य कलाप दिव्य होते है। जो इस दिव्य भाव को समझता है वह भगवद्गीता का अध्ययन शुभारंभ करते ही मुक्त हो जाता है।

 

 

 

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