Narayan Dutt Shrimali Books Hindi Pdf Free / नारायण दत्त श्रीमाली बुक्स

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Narayan Dutt Shrimali Books Hindi Pdf नारायण दत्त श्रीमाली बुक्स 

 

 

1- अप्सरा साधना Pdf Free

 

2- Tantrik Sadhnayen Evam Siddhiyan तांत्रिक सिद्धियां 

 

3- Vrihad Hastrekha Shastra Pdf

 

4- मंत्र रहस्य Pdf

 

5- Mantra Rahasya Pdf Free

 

6- हिमालय के योगियों की गुप्त सिद्धियां pdf

 

 

 

 

 

 

 

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Note- उपरोक्त दिए गए किताबों के मन्त्रों की साधना किसी विद्वान या गुरु के ही सानिध्य में करें। इनसे होने वाले शुभ या अशुभ परिणामों की जिम्मेदारी इस वेबसाइट की टीम या लेखक नहीं लेते हैं। 

 

 

 

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नारायण दत्त श्रीमाली के बारे में 

 

 

 

Narayan Dutt Shrimali Books Hindi
Narayan Dutt Shrimali Books Hindi

 

 

 

डा. नारायण दत्त श्रीमाली का सन्यासी नाम श्री स्वामी निखिलेश्वरानंद जी महाराज है। उनका जन्म खरंटिया राजस्थान में हुआ है। नारायण दत्त श्री के पिता का नाम मुल्तान चंद्र श्रीमाली है। इन्होने राजस्थान विश्वविद्यालय से M. A. और जोधपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में P. H. D. किया है।

 

 

 

 

इन्होने लगभग 200 से अधिक ग्रंथो की रचना की है जिसमे गोपनीय दुर्लभ मंत्रो के रहस्य, तंत्र साधनाए, वृहद हस्तरेखा शास्त्र, सम्मोहन विज्ञान आदि मुख्य है। इसके अतिरिक्त इनकी मुख्य कृतियां कुण्डलिनी नाद ब्रह्म, फिर दूर कही पायल खनकी, ध्यान, धरना और समाधि, क्रिया योग, हिमालय का सिद्ध योगी, सूर्य सिद्धांत, स्वर्ण तंत्र आदि है।

 

 

 

Tantra Mantra तंत्र मंत्र 

 

 

 

तंत्र-मंत्र दो अलग-अलग चीजे है। यहां पर तंत्र का अर्थ तांत्रिक क्रिया से है। मंत्र तांत्रिक और सात्विक दोनों क्रियाओ में रहता है। लेकिन तांत्रिक और सात्विक के मंत्रो और विद्वानों में बहुत अंतर होता है। तंत्र-मंत्र के माध्यम से हम चीजों को सरलता से पा सकते है लेकिन कर्म तो हमे करना ही होता है। ऐसी शक्तियां मार्ग में आने वाले अवरोधों को कम या फिर दूर करती है। ग्रहो को सही जगह करती है जिससे सफलता जल्द मिल जाती है।

 

 

 

कर्मयोग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

सांख्य और भक्ति योग – कृष्ण कहते है – जो यह जानता है कि विश्लेषणात्मक अध्ययन (सांख्य) द्वारा प्राप्त स्थान भक्ति द्वारा भी प्राप्त किया जा सकता है और इस तरह जो सांख्ययोग तथा भक्ति योग को एक समान देखता है वही वस्तुओ को यथा रूप में देखता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सांख्य दार्शनिक शोध के द्वारा इस निष्कर्ष पर पहुंचा जाता है कि जीव भौतिक जगत का नहीं, अपितु पूर्ण परमात्मा का अंश है। दार्शनिक शोध (सांख्य) का वास्तविक उद्देश्य जीवन के चरम लक्ष्य की खोज है। चूंकि जीवन का चरम लक्ष्य आत्म साक्षात्कार है अतः इन दोनों विधियों से प्राप्त होने वाले परिणामो में कोई अंतर नहीं है।

 

 

 

फलस्वरूप जीवात्मा का भौतिक जगत से कोई सरोकार नहीं होता, उसके सारे कार्य परमेश्वर से सम्बद्ध होने चाहिए। वस्तुतः दोनों ही विधिया एक है ऊपर से एक विधि में विरक्ति दिखती है और दूसरे में आसक्ति है। जब मनुष्य कृष्ण भावनामृत वश कार्य करता है तभी वह अपनी स्वाभाविक स्थित में होता है।

 

 

 

सांख्य विधि से मनुष्य को पदार्थ से विरक्त होना पड़ता है और भक्ति योग में उसे कृष्ण भावना भावित कर्म में आसक्त होना पड़ता है। जो पदार्थ से विरक्ति और कृष्ण में आसक्ति को एक ही तरह से देखता है, वही वस्तुओ को यथा रूप में देखता है।

 

 

 

 

6- सन्यासी के दो प्रकार (श्रेणी) – श्री कृष्ण कहते है – भक्ति में लगे बिना केवल समस्त कर्मो का परित्याग करने से कोई सुखी नहीं बन सकता। परन्तु भक्ति में लगा हुआ विचारवान व्यक्ति शीघ्र ही परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सन्यासी दो प्रकार के होते है। मायावादी सन्यासी सांख्य दर्शन के अध्ययन में लगे रहते है, तथा वैष्णव सन्यासी वेदांत सूत्रों के यथार्थ भाष्य भागवत दर्शन के अध्ययन में लगे रहते है। मायावादी सन्यासी भी वेदांत सूत्रों का अध्ययन करते है। किन्तु वह शंकराचार्य द्वारा प्रणीत शारीरिक भाष्य का उपयोग करते है। भागवत सम्प्रदाय के छात्र पांच रात्रि की विधि से भगवान की भक्ति करने में लगे रहते है।

 

 

 

किन्तु मायावादी सन्यासी जो सांख्य तथा वेदांत के अध्ययन तथा चिंतन में लगे रहते है, वह भगवान की दिव्य भक्ति का आनंद नहीं उठा पाते है। चूंकि उनका अध्ययन बहुत जटिल हो जाता है। अतः वह कभी-कभी ब्रह्म चिंतन से ऊबकर समुचित बोध के बिना ही भागवत की शरण ग्रहण करते है। फलस्वरूप श्रीमद्भागवत का भी अध्ययन उनके लिए कष्टकर होता है।

 

 

 

लेकिन वैष्णव सन्यासी को भगवान की दिव्य सेवा के लिए अनेक प्रकार के कार्य करने होते है। उन्हें भौतिक कार्यो से कोई सरोकार नहीं रहता है। किन्तु तो भी वह भगवान की भक्ति में नाना प्रकार के कार्य करते है। मायावादी सन्यासियों का शुष्क चिंतन तथा कृतिम साधनो से निर्विशेष विवेचना उनके लिए व्यर्थ होती है। भक्ति में लगे हुए वैष्णव सन्यासी अपने दिव्य कर्मो को करते हुए प्रसन्न रहते है और यह भी निश्चित रहता है कि वह भगवद्धाम को प्राप्त होंगे।

 

 

 

कृष्ण भावनामृत के कार्यो में लगे रहने वाले लोग ब्रह्म अब्रह्म विषयक साधारण चिंतन में लगे सन्यासियों से श्रेष्ठ है। यद्यपि वह भी अनेक जन्मो के बाद ही कृष्ण भावना भावित हो जाते है। मायावादी सन्यासी कभी-कभी आत्मसाक्षात्कार के पथ से नीचे गिर जाते है और फिर से समाज सेवा, परोपकार जैसे भौतिक कार्यो में प्रवृत्त होते है।

 

 

 

 

7- कृष्ण भावनामृत से (मुक्ति) – कृष्ण कहते है – जो भक्ति भाव से कर्म करता है। जो विशुद्ध आत्मा है और अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है। वह सबको प्रिय होता है और सब लोग उसे प्रिय होते है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नहीं बंधता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो कृष्ण भावनामृत के कारण मुक्ति के पथ पर है। वह प्रत्येक जीव को प्रिय होता है और प्रत्येक जीव उसे प्रिय लगते है। यह अवस्था कृष्ण भावनामृत के कारण होती है। ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को कृष्ण से पृथक नहीं सोच पाता है। जिस प्रकार वृक्ष की पत्तिया और टहनिया वृक्ष से भिन्न नहीं होती है।

 

 

 

ऐसा व्यक्ति जिसकी इन्द्रिया संयत्रित हो किसी के प्रति भी अपराध नहीं कर सकता इसपर कोई प्रश्न कर सकता है कि अर्जुन अन्यो के प्रति युद्ध में आक्रामक क्यों था ? क्या वह कृष्ण भावना भावित नहीं था ? वस्तुतः अर्जुन ऊपर से ही आक्रामक था क्योंकि जैसा द्वितीय अध्याय में बताया जा चुका है। आत्मा के अवध्य होने के कारण युद्ध भूमि में एकत्र हुए सारे व्यक्ति अपने-अपने स्वरुप में जीवित बने रहेंगे।

 

 

 

चूंकि कृष्ण भावनामृत में कार्य करने वाला सभी का दास होता है। अतः वह हर एक को प्रिय होता है। वह भली भांति जानता है कि वृक्ष की जड़ में डाला गया जल समस्त पत्तियों तथा टहनियों में फ़ैल जाता है। अथवा आमाशय को भोजन प्राप्त होने से शक्ति स्वतः पूरे शरीर में फ़ैल जाती है। चूंकि भक्त के कर्म से प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न रहता है। अतः उसकी चेतना शुद्ध रहती है। अतः उसका मन पूर्णतया नियंत्रण में रहता है। मन के नियंत्रण होने से इन्द्रिया संयमित रहती है। चूंकि उसका मन सदैव कृष्ण में स्थिर रहता है अतः उसके विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।

 

 

 

 

आध्यात्मिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में कोई मारा नहीं गया, यहां पर स्थित कृष्ण की आज्ञा से केवल उनके वस्त्र बदल दिए गए थे। अतः अर्जुन कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में युद्ध करता हुआ भी वस्तुतः युद्ध नहीं कर रहा था। वह तो पूर्ण रूप से कृष्ण भावनामृत में कृष्ण के आदेश का पालन मात्र कर रहा था। ऐसा व्यक्ति कभी कर्म बंधन में नहीं बंधता है।

 

 

 

भक्त को कृष्ण से सम्बद्ध कथाओ के अतिरिक्त अन्य कार्यो में अपनी इन्द्रियों को लगाने का अवसर ही नहीं प्राप्त होता है। वह कृष्ण कथा के अतिरिक्त और कुछ सुनना नहीं चाहता। वह कृष्ण को अर्पित किए हुए भोजन के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं खाना चाहता और न ऐसे किसी स्थान में जाने की इच्छा रखता है जहां कृष्ण से सम्बद्ध कार्य न होता हो।

 

 

 

 

8/9- दिव्य भावनामृत – कृष्ण कहते है – दिव्य भावना युक्त पुरुष देखते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते, खाते, चलते-फिरते, सोते तथा श्वास लेते हुए भी अपने अंतर में सदैव यही जानता रहता है कि वास्तव में वह कुछ भी नहीं करता है। बोलते त्यागते, ग्रहण करते या आंखे खोलत-बंद करते हुए भी वह जानता है कि भौतिक इन्द्रिया अपने-अपने विषयो में प्रवृत्त है और वह इन सबसे पृथक है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – चूंकि कृष्ण भावना भावित व्यक्ति का जीवन शुद्ध होता है। फलतः उसे निकट तथा दूरस्थ पांच कारणों –  कर्ता, कर्म, अधिष्ठान, प्रयास तथा भाग्य पर निर्भर किसी कार्य से कुछ लेना-देना नहीं रहता है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति सदा मुक्त रहता है। भले ही वह ऊपर से भौतिक कार्य में रत दिखाई देता हो।

 

 

 

इसका कारण यह है कि वह भगवान की दिव्य सेवा में रत होता है। यद्यपि ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपने शरीर तथा इन्द्रियों से कर्म में प्रवृत्त है। किन्तु वह अपनी वास्तविक स्थित के प्रति सचेत रहता है जो कि उसकी आध्यात्मिक व्यस्तता है। भौतिक चेतना में इन्द्रिया इन्द्रिय तृप्ति में लगी रहती है। किन्तु कृष्ण भावनामृत में वह कृष्ण की इन्द्रियों की तुष्टि में लगी रहती है।

 

 

 

देखने तथा सुनने के कार्य ज्ञानेन्द्रियो के कर्म है। जबकि चलना, बोलना, मल त्याग करना कर्मेन्द्रियों के कार्य है। कृष्ण भावना भावित व्यक्ति कभी भी इन्द्रियों के कार्य से प्रभावित नहीं होता है। वह भगवत्सेवा के अतिरिक्त कोई दूसरा कार्य नहीं कर सकता क्योंकि उसे भली प्रकार से ज्ञात है कि वह भगवान का शाश्वत दास है।

 

 

 

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