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Mukhakrit Vigyan Pdf Hindi / मुखाकृत विज्ञान Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Mukhakrit Vigyan Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Mukhakrit Vigyan Pdf Hindi Download कर सकते हैं।

 

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Mukhakrit Vigyan Pdf / मुखाकृत विज्ञान पीडीऍफ़ 

 

 

 

मुखाकृत विज्ञान पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

 

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Mukhakrit Vigyan Pdf Hindi
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

 

विश्वामित्र को बहुत प्रकार से मनोरथ करते हुए जाने में देर नहीं लगी। सरयू जी के जल में स्नान करके वह राजा के दरबार में गए।

 

 

 

 

42- विश्वामित्र का राजा दशरथ से राम लक्ष्मण को मांगना

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- राजा ने जब सुना कि विश्वामित्र मुनि आये है तो ब्राह्मणो का समाज साथ लेकर मिलने गए और दंडवत करके मुनि का सम्मान करते हुए उन्हें लाकर अपने आसन पर बैठाया।

 

 

 

2- चरणों को धोकर बहुत पूजा की और कहा – मेरे समान धन्य आज दूसरा कोई नहीं है फिर अनेक प्रकार के भोजन करवाए, जिससे श्रेष्ठ मुनि ने अपने हृदय में बहुत ही हर्ष प्राप्त किया।

 

 

 

 

3- फिर राजा ने अपने चारो पुत्रो को मुनि के चरणों पर डाल दिया और प्रणाम कराया। श्री राम जी को देखकर मुनि अपने देह की सुधि भूल गए। वह श्री राम जी के मुख की शोभा देखकर ऐसे मग्न हो गए मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमा को देखकर लुभा गया हो।

 

 

 

 

4- तब राजा ने मन में हर्षित होकर यह वचन कहे – हे मुनि! इस प्रकार तो कृपा आपने कभी नहीं की। आज किस कारण से आपका शुभागमन हुआ? कहिए, मैं उसे पूरा करने में देर नहीं लगाऊंगा।

 

 

 

 

5- मुनि ने कहा – हे राजन! राक्षसों के समूह मुझे बहुत सताते है, इसलिए मैं तुमसे कुछ मांगने के लिए आया हूँ। छोटे भाई के सहित श्री राम जी को मुझे दे दो। राक्षसों के मारे जाने पर मैं सुरक्षित हो जाऊंगा।

 

 

 

 

207- दोहा का अर्थ-

 

 

 

हे राजन! प्रसन्न मन से इनको मुझे दे दो और मोह अज्ञान को त्याग दो। हे स्वामी! इसमें तुमको धर्म और सुयश की प्राप्ति होगी और इनका भी परम कल्याण होगा।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- इस अत्यंत अप्रिय वाणी को सुनकर राजा का हृदय कांप उठा और उनके मुख की कांति फीकी पड़ गई। उन्होंने कहा – हे ब्राह्मण! मैं चौथेपन चार पुत्र पाए है, आपने विचारकर बात नहीं कही।

 

 

 

 

2- हे मुनि आप पृथ्वी, गौ, धन और खजाना मांग लीजिए मैं आज बड़े हर्ष के साथ अपना सर्वस्व दे दूंगा। देह और प्राण से प्यारा कुछ भी नहीं होता है। मैं उसे भी एकपल में दे दूंगा।

 

 

 

 

3- सभी पुत्र मुझे प्राणो के समन प्यारे है, उनमे भी हे प्रभो! राम को तो किसी भी प्रकार से देते नहीं बनता है। कहां अत्यंत डरावने क्रूर राक्षस और कहां परम किशोर अवस्था के बिल्कुल ही सुकुमार मेरे सुंदर पुत्र।

 

 

 

 

4- प्रेमरस में सनी हुई राजा की वाणी सुनकर विश्वामित्र जी ने हृदय में बड़ा हर्ष माना। तब वशिष्ठ जी ने राजा को बहुत प्रकार समझाया जिससे राजा का संदेह नाश को प्राप्त हुआ।

 

 

 

 

5- राजा ने बड़े आदर के साथ अपने दोनों पुत्रो (राम-लक्ष्मण) को बुलाया और हृदय से लगाकर उन्हें बहुत प्रकार से शिक्षा दी। फिर राजा ने मुनि से कहा – हे नाथ! यह दोनों मेरे प्राण है। हे मुनि! अब आप ही इनके पिता है दूसरा कोई नहीं।

 

 

 

 

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