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Mudrarakshasa Pdf Hindi Free / मुद्राराक्षस हिंदी Pdf Free

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मित्रों इस पोस्ट में Mudrarakshasa Pdf Hindi Free दिया गया है। आप नीचे की लिंक से मुद्राराक्षस हिंदी Pdf Free Download कर सकते हैं।

 

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Mudrarakshasa Pdf Hindi Free 

 

 

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Mudrarakshasa Pdf Hindi Free
मुद्राराक्षस हिंदी Pdf Free Download
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Mudrarakshasa Pdf Hindi Free
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6- एक खाली जगह Pdf

 

7- यह सच है Pdf

 

 

 

 

 

मुद्राराक्षस हिंदी Pdf Free Download

 

 

Mudrarakshasa Pdf Hindi Free
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मुद्राराक्षस के बारे में 

 

 

 

विशाख दत्त ने ऐतिहासिक रचना ‘मुद्राराक्षस’ को मूर्त रूप दिया था जो संस्कृत में वर्णित है। इसमें नंद वंश के विनाश, चन्द्रगुप्त काराज्यारूढ़ होना, राक्षस का विरोध, चाणक्य राजनीति के विषय में सजगता का वर्णन है। इसकी रचना चौथी शताब्दी में हुई थी। इसमें चाणक्य और चन्द्रगुप्त मौर्य संबंधित कई बातों का उल्लेख मिलता है।

 

 

 

विशाख दत्त के द्वारा लिखा हुआ नाटक मुद्राराक्षस और देवी चंद्रगुप्तम बहुत लोकप्रिय हुए थे। उनके पिता और दादा के चरित्रों को महाराजा भास्कर दत्त और महाराजा वटेश्वर दत्त के रूप में वर्णन प्राप्त है। इस पुस्तक की रचना संस्कृत भाषा में होने के कारण ही वर्तमान में भी उस पुस्तक को सम्मान प्राप्त है।

 

 

 

विशाख दत्त का जन्म राजकुल में हुआ था। मुद्राराक्षस की कुछ लिखी हुई प्रतियो के अनुसार उन्हें महाराज भास्कर दत्त का पुत्र माना जाता है। कही-कही तो उनका उल्लेख सामंत वटेश्वर दत्त के पौत्र और महाराज के पुत्र के रूप में उल्लेख मिलता है।

 

 

 

विशाख दत्त गुप्तकाल की अमूल्य निधि थे और उनकी रचना का मूल श्रोत ‘मुद्राराक्षस’ है। लेकिन उन्होंने दो और रचनाओं को मूर्त रूप संस्कृत में दिया था जो देवी चंद्रगुप्तम और राघवानंद नाटकम के नाम से प्रसिद्ध थी।

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

दूसरे दिन कार्तिक नीली कोठी से थोड़ा दूर हटकर अपनी मोटरसाइकिल के साथ खड़ा था। 8 बजककर 30 मिनट पर वही लड़की नीली कोठी से निकली उसकी सूरत एकदम भिखारन लड़की से मिलती थी उसके हाथ में एक बड़ा सा कॉलेज बैग था।

 

 

 

कार्तिक दौड़ते हुए उसके सामने आ गया और पूछ बैठा आप कल शेखर की दुकान पर गयी थी। इतना सुनते ही उस लड़की के चेहरे का रंग उतर गया। उसे लगा कि आज शायद उसका भेद खुल जायेगा लेकिन दूसरे ही क्षण वह बोली आप कौन हो और यहां क्यों आये हो?

 

 

 

कार्तिक बोला – मेरा नाम कार्तिक है मैंने पहले आपको सिग्नल के पास देखा फिर शेखर के दुकान पर और आज यहां क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप खुद को इतना रहस्यमय क्यों बनाये हुए है? तभी वह लड़की बोली – हमारे पास आपके बातो का जवाब देने के लिए समय नहीं है और आप हमारा और अपना समय बेकार ही नष्ट कर रहे है।

 

 

 

इतना कहते हुए उसने एक कार्ड निकालकर कार्तिक को दिखाया उसपर लिखा था रचनदास एस. बी. आई. मैनेजर चितपुर ब्रांच। शायद लड़की अपनी गलती का अंदाजा लगा चुकी थी। उसने तुरंत ही अपना कार्ड रख लिया और वहां से चली गयी।

 

 

 

कार्तिक सिर्फ इतना ही पढ़ सका था एस. बी. आई. मैनेजर चितपर ब्रांच। कार्तिक खुद से बोला हमे दूसरे की परेशानी में दखल देने का क्या हक है? हमारे पास अपनी दुकाने और कम्पनी है मैं क्यों दूसरे की समस्या में पडूँ और वह अपनी मोटरसायकल लेकर कम्पनी में पहुँच गया।

 

 

 

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