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Best Meri Priya Kahaniyan Pdf / मेरी प्रिय कहानियाँ Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Meri Priya Kahaniyan Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Meri Priya Kahaniyan Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Meri Priya Kahaniyan Pdf / मेरी प्रिय कहानियाँ Pdf

 

 

 

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2- अपराधिनी उपन्यास डाउनलोड

 

3- मेरी प्रिय कहानियां उपन्यास डाउनलोड

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

जांबवंत और नील आदि सबको श्री रघुनाथ जी ने स्वयं वस्त्र भूषण पहनाये। वह सब अपने हृदय में श्री राम जी के रूप को धारण करके उनके चरणों में मस्तक नवाकर चले। तब अंगद उठकर सिर नवाकर नयन में जल भलकर और हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्र तथा प्रेम रस में डुबोवे हुए मधुर वचन बोले।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के सागर! हे दीन पर दया करने वाले! हे आरति बंधु! सुनिए। हे नाथ! मरते समय मेरा पिता बालि आपके ही गोद में डाल गया था।

 

 

अतः हे भक्तो के हितकारी! अपना अशरण-शरण विरद याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता सब कुछ आप ही है। आपके चरण कमल को छोड़कर मैं कहां जाऊं।

 

 

 

हे महाराज! आप ही विचारकर कहिए आपको छोड़कर घर में मेरा क्या काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक तथा सेवक को शरण में रखिए।

 

 

 

मैं घर की छोटी से छोटी सेवा भी करूँगा और आपके चरण कमल को देखकर भव सागर से तर जाऊंगा। ऐसा कहकर वह श्री राम जी के चरणों में गिर पड़े और बोले – हे प्रभो! मेरी रक्षा कीजिए। हे नाथ! अब यह न कहिए कि तू घर जा।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

 

अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा श्री रघुनाथ जी ने उनको उठाकर हृदय से लगा लिया प्रभु के कमल नयन में प्रेम का जल भर आया।

 

 

 

तब भगवान ने अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि, रत्नो के आभूषण बालि पुत्र अंगद को पहनाकर और बहुत प्रकार से समझाकर उनकी बिदाई किया।

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

भक्त की करनी याद करके भरत जी छोटे भाई शत्रुघ्न जी लक्ष्मण जी सहित उनको पहुंचाने चले। उनके हृदय में बहुत प्रेम है। वह फिरकर श्री राम जी की ओर देखते है और अब बार-बार दंडवत प्रणाम करते है। मन में ऐसा आता है कि मुझे रहने के लिए कह दे। श्री राम जी के देखने की, बोलने की, चलने की तथा हंसकर मिलने की रीति को याद करके दुखी होते है।

 

 

 

किन्तु प्रभु का रुख देखकर बहुत से विनय वचन कहकर तथा हृदय में चरण कमल को रखकर वह चले। अत्यंत आदर के साथ सब वानरों को पहुंचाकर भाइयो सहित भरत जी लौट आये।

 

 

 

तब हनुमान जी ने सुग्रीव के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती किया और कहा – हे देव! दस दिन श्री रघुनाथ जी की चरण सेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा।

 

 

 

सुग्रीव ने कहा – हे पवनकुमार! तुम पुण्य की राशि हो जाकर कृपाधाम श्री राम जी की सेवा करो। सब प्रकार ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। तब अंगद ने कहा – हे हनुमान! सुनो।

 

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ प्रभु से मेरी दंडवत कहना और श्री राम की को बार-बार मेरी याद कराते रहना। ऐसा कहकर बालि पुत्र अंगद चले, तब हनुमान आये और आकर प्रभु से उनका प्रेम वर्णन किया।

 

 

 

उसे सुनकर भगवान प्रेममग्न हो गए। काकभुशुण्डि जी कहते है – हे गरुण जी! श्री राम जी का चित्त अत्यंत कठोर है और फूल से भी अत्यंत कोमल है। तब कहिए वह किसकी समझ में आ सकता है?

 

 

 

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