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Markandeya Puran Gita Press Pdf Hindi / मार्कण्डेय पुराण गीता प्रेस Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Markandeya Puran Gita Press Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Markandeya Puran Gita Press Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  50 + धार्मिक पुस्तके Pdf पढ़ सकते हैं।

 

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Markandeya Puran Gita Press Pdf

 

 

 

 

 

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Markandeya Puran Gita Press Pdf Hindi
मार्कण्डेय पुराण गीता प्रेस Pdf Download
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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

 

1- अत्यंत व्याकुल, दुःख, प्रेम, विनय और नीति से पूर्ण भरत जी की उत्तम वाणी सुनते सब लोग शोक में मगन हो गए। सारी सभा में विषाद व्याप्त हो गया। मानो कमल वन पर तुषार (पाला) गिर गया हो।

 

 

 

 

2- तब ज्ञानी मुनि वशिष्ठ जी ने अनेक प्रकार की ऐतिहासिक कथाये कहकर भरत जी का समाधान किया। फिर सूर्यकुल रूपी कुमुद वन को प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा श्री रघुनंदन जी उचित वचन बोले।

 

 

 

 

3- हे तात! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को ईश्वर के अधीन जानो। मेरे मत से (भूत, भविष्य, वर्तमान) तीनो काल में और (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) तीनो लोक में सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे है।

 

 

 

 

4- हृदय में भी तुम पर कुटिलता का आरोप लगाने से यह लोक (यहां का यश, सुख आदि) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है। (मरने के बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती है) माता कैकेयी को तो वह व्यर्थ ही दोष लगाते है। जिन्होंने गुरु और साधुओ का संग साथ नहीं किया है।

 

 

 

263- दोहा का अर्थ-

 

 

 

हे भरत! तुम्हारा नाम करते ही सब पाप, प्रपंच, अज्ञान और अमंगल के समूह मिट जायेंगे तथा इस लोक में यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- हे भरत! मैं सत्य स्वभाव से कहता हूँ, शिव जी साक्षी है, यह पृथ्वी तुम्हारे धर्म के सहारे ही रुकी हुई है। तुम व्यर्थ ही कुतर्क न करो, बैर और प्रेम छिपाये नहीं छिपते है।

 

 

 

 

2- पक्षी और पशु मुनि के पास बेधड़क चले आते है। पर  वाले को देखकर ही जाते है। अपना मित्र और शत्रु तो पशु-पक्षी भी पहचानते है। फिर मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भंडार है।

 

 

 

 

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