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Maheshwari Tantra Pdf in Hindi / माहेश्वरी तंत्र पीडीएफ

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Maheshwari Tantra Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Maheshwari Tantra Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से गुप्त साधना तंत्र Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

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Maheshwari Tantra Pdf / माहेश्वरी तंत्र Pdf

 

 

 

 

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Maheshwari Tantra Pdf in Hindi
माहेश्वरी तंत्र Pdf Download
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

फिर देकर जनक जी ने समाज सहित दशरथ जी का पूजन किया। सब राजाओ के सिरमौर चक्रवर्ती दशरथ जी जनवासे चले।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- जनकपुर में नित्य ही नए-नए मंगल हो रहे है। दिन और रात एक पल के समान ही बीत जाते है। बड़े सबेरे ही राजाओ के मुकुटमणि दशरथ जी जाग गए। याचकगण उनके गुण समूह का गान करने लगे।

 

 

 

2- चारो कुमारो को बंधुओ सहित देखकर दशरथ जी के मन में जितना हर्ष है उसे किस प्रकार से कहा जा सकता है? वह प्रातः क्रिया करके गुरु वशिष्ठ जी के पास गए। उनका हृदय महान आनंद से परिपूर्ण हो गया।

 

 

 

 

3- राजा दशरथ प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृत डूबी हुई वाणी बोले। हे मुनिराज! सुनिए, आपकी कृपा से मैं आज पूर्णकाम हो गया हूँ।

 

 

 

4- हे स्वामिन! अब आप सब ब्राह्मणो को बुलाकर उनको सब तरह गहनों, कपड़ो से सजी हुई गौवे दे दीजिए। यह सुनकर गुरु जी ने राजा की बड़ाई करते हुए सब मुनिगणों को बुला लिया।

 

 

 

330- दोहा का अर्थ-

 

 

 

तब वामदेव, देवर्षि नारद, वाल्मीकि, जावालि और विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियो के समूह आये।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

1- राजा ने सबको दंडवत प्रणाम किया और प्रेम सहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन प्रदान किया। चार लाख उत्तम गौएं मंगवाई गई। जिनका स्वभाव कामधेनु के समान ही सुहावना था।

 

 

 

2- उन सबको सब प्रकार से गहनों और कपड़ो से सजाकर राजा ने प्रसन्न मन से भूदेव ब्राह्मणो को समर्पित कर दिया। राजा बहुत प्रकार से विनती कर रहे है कि मेरा जन्म सफल हो गया और मैंने आज ही जीने का लाभ पाया है।

 

 

 

3- ब्राह्मणो से आशीर्वाद मिलने पर राजा आनंदित हुए, फिर याचको के समूह को बुलाकर और सबको उनकी रुचि के अनुसार ही पूछ-पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ जिसने जो चाहा सो उसे सूर्यकुल को आनंदित करने वाले दशरथ जी ने उन सबको दिए।

 

 

 

 

4- वह सब उनके गुणों को गाते हुए और उनकी गाथा का वर्णन करते हुए और “सूर्यकुल के स्वामी की जय हो, जय हो, जय हो” कहते हुए चले गए।

 

 

 

इस प्रकार से श्री राम जी के विवाह का उत्सव सुख पूर्वक से संपन्न हुआ। जिन्हे सहस्र मुख है, वह शेष जी भी उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हो सकते है।

 

 

 

 

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