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Mahalaxmi Vrat Katha Pdf / महालक्ष्मी व्रत कथा pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Mahalaxmi Vrat Katha Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Mahalaxmi Vrat Katha Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Daulat Ke Niyam book in Hindi Pdf कर सकते हैं।

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Mahalaxmi Vrat Katha Pdf

 

 

 

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महालक्ष्मी व्रत कथा Pdf Download

 

 

 

बहुत प्राचीन काल में श्रृंगार पुर में केशव नाम का ब्राह्मण अपने परिवार के साथ रहता था। केशव ब्राह्मण बहुत निर्धन वह किसी प्रकार से अपने परिवार का भरण पोषण करता था। निर्धन होने पर भी उसके पास भक्ति रूपी धन था वह भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था।

 

 

 

भगवान विष्णु जी अपने भक्त की सेवा से बहुत प्रसन्न थे। एक बार वह अपने भक्त केशव के समक्ष प्रकट हो गए तथा केशव से वरदान मांगने के लिए कहा। केशव बोला – प्रभु! आप तो सर्वज्ञ है हमे ऐसा वरदान दीजिए जिससे हमारी दरिद्रता समाप्त होकर सम्पन्नता बढ़ जाय।

 

 

 

भगवान नारायण ने ‘एवमस्तु’ कहकर बोले – भक्त केशव! तुम्हे एक कार्य करना पड़ेगा? केशव बोला – आप आज्ञा करे प्रभु। भगवान विष्णु ने कहा – इस मंदिर के सामने प्रतिदिन जो औरत उपला थापने आती है तुम उसे अपने घर आने के लिए आमंत्रित कर देना।

 

 

 

वह साधारण सी दिखने वाली औरत स्वयं महालक्ष्मी है। वह जब तुम्हारे घर आएंगी तब तुम्हारी सम्पन्नता बढ़ जाएगी और दरिद्रता समाप्त हो जाएगी। दूसरे दिन केशव नाम का वह ब्राह्मण एकदम सुबह ही मंदिर पर जाकर बैठ गया। उसके कुछ समय के उपरांत ही एक औरत मंदिर के सामने आकर उपला थापने लगी।

 

 

 

केशव वहां गया और बोला – मैं आपको अपने घर आने का निमंत्रण देता हु आप उसे स्वीकार करिये। ब्राह्मण केशव की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयी कि यह सब विष्णु जी के कहने से हुआ है। लक्ष्मी जी ने केशव नाम के ब्राह्मण से कहा – हे विप्र! तुम महालक्ष्मी का व्रत सोलह दिनों तक करो।

 

 

 

सोलहवे दिन रात्रि के समय चन्द्रमा को अर्घ्य देने से तुम्हारी मनोकामना की पूर्ति होगी। केशव ब्राह्मण ने लक्ष्मी जी के कहने के अनुसार व्रत और पूजन किया और उत्तर दिशा की तरफ मुख करके देवी लक्ष्मी को पुकारने लगा। महादेवी ने अपना वचन पूर्ण किया तथा ब्राह्मण के घर आकर विराजमान हो गयी।

 

 

 

ब्राह्मण की विपन्नता समाप्त होकर सम्पन्नता में बदल गयी। उसके बाद से ही महालक्ष्मी व्रत कथा का पूरी श्रद्धा के साथ आयोजन होने लगा।

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

योगी शुक्राचार्य ने आकर दधीचि के शरीर को जिसे क्षुव ने आघात पहुंचाया था तुरंत खत्म कर दिया। दधीचि के अंगो को पूर्ववत शिवभक्त शिरोमणि तथा मृत्युंजय विद्या के प्रवर्तक शुक्राचार्य ने उनसे कहा – तात दधीचि! मैं सर्वेश्वर भगवान शिव का पूजन करके तुम्हे श्रुति प्रतिपादित महामृत्युंजय नामक श्रेष्ठ मंत्र का उपदेश देता हूँ।

 

 

 

त्र्यंबकं यजामये हम भगवान त्रयंबक का यजन करते है। त्रयंबक का अर्थ है – तीनो लोको के पिता प्रभावशाली शिव। वे भगवान सूर्य, सोम और अग्नि तीनो मंडलो के पिता है। तम, रज और सत्व तीनो गुणों के महेश्वर है। आत्मतत्व, विद्यातत्व और शिवतत्व इन तीनो तत्वों के आहवनीय, गार्हषत्व और दक्षिणाग्नि इन तीनो अग्नियों के सर्वत्र उपलब्ध होने वाले पृथ्वी, जल एवं तेज इन तीन मूर्त भूतो के त्रिदिव के, त्रिभुज के, त्रिधाभूत सबके ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनो देवताओ के मोहन ईश्वर महादेव जी ही है।

 

 

 

मंत्र का द्वितीय चरण है सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम जैसे फूलो में उत्तम गंध होती है उसी प्रकार वे भगवान शिव सम्पूर्ण भूतो में, तीनो गुणों में, समस्त कृत्यों में, इन्द्रियों में, अन्यान्य देवो में और गणो में उनके प्रकाशक सारभूत आत्मा के रूप में व्याप्त है।

 

 

 

अतएव सुगंध युक्त एवं सम्पूर्ण देवताओ के ईश्वर है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले द्विजश्रेष्ठ! महामुने नारद! उन अन्तर्यामी पुरुष शिव से प्रकृति का पोषण होता है। महतत्व से लेकर विशेष पर्यन्त सम्पूर्ण विकल्प की पुष्टि होती है तथा मुझ ब्रह्मा का, विष्णु का, मुनियो का और इन्द्रियों सहित देवताओ का भी पोषण होता है। इसलिए वे ही पुष्टिवर्धन है।

 

 

 

उन दोनों चरणों का स्वरुप यों है उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात अर्थात  प्रभो! जैसे खरबूजा पक जाने पर लता बंधन से छूट जाता है उसी तरह मैं मृत्युरूप बंधन से मुक्त हो जाऊं अमृतपद से अलग न होऊं। वे रुद्रदेव अमृत स्वरूप है।

 

 

 

जो पुण्यकर्म से, तपस्या से, स्वाध्याय से, योग से उनकी आराधना करता है उसे नया जीवन प्राप्त होता है। इस सत्य के प्रभाव से भगवान शंकर स्वयं ही अपने भक्त को मृत्यु के सूक्ष्म बंधन से मुक्त कर देते है क्योंकि वे भगवान ही बंधन और मोक्ष देने वाले है।

 

 

 

ठीक उसी तरह जैसे उर्वारुक अर्थात ककड़ी का पौधा अपने फल को स्वयं ही लता के बंधन में बांधे रखता है और पक जाने पर स्वयं ही उसे बन्धन से मुक्त कर देता है। यह मृत संजीवनी मंत्र है जो मेरे मत से सर्वोत्तम है। तुम प्रेम पूर्वक नियम से भगवान  शिव का स्मरण करते हुए इस मंत्र का जप करो।

 

 

 

जप और हवन के पश्चात इसी से अभिमंत्रित किए हुए जल को दिन और रात में पीओ तथा शिव विग्रह के नजदीक बैठकर उन्ही का ध्यान करते रहो। इससे कही भी मृत्यु का भय नहीं रहता। न्यास आदि सब कार्य करके विधिवत भगवान भगवान शिव की पूजा करो।

 

 

 

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