Maha Mrityunjaya Mantra Pdf / महा मृत्युंजय मंत्र Pdf

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Maha Mrityunjaya Mantra Pdf देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से Maha Mrityunjaya Mantra Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

Maha Mrityunjaya Mantra Pdf / महा मृत्युंजय मंत्र Pdf Download

 

 

महा मृत्युंजय मंत्र Pdf Download

 

 

 

 

 

 

Maha Mrityunjaya Mantra के बारे में 

 

 

 

महामृत्युंजय मंत्र का जाप विशिष्ट परिस्थियों में ही किया जाता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप सवा लाख बार करना चाहिये, वहीँ बाबा शंकर के लघु मृत्युंजय का जाप ११ लाख किया जाता है।

 

 

 

सावन माह में इस मंत्र का जाप अत्यंत ही कल्याणकारी माना जाता है। वैसे आप यदि अन्य माह में इस मंत्र का जाप करना चाहते हैं तो सोमवार ​के दिन से इसका प्रारंभ कराना चाहिए। इस मंत्र के जाप में रुद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। इस मंत्र के जाप के लिये जानकार ब्राह्मणों या विद्वानों से करवाना चाहिये।

 

 

 

Mahamrityunjay Mantra in Hindi Written

 

 

 

ॐ हौं जूं स: ॐ भूर्भुव: स्व: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॐ स्व: भुव: भू: ॐ स: जूं हौं ॐ !!

 

 

लघु मृत्युंजय मंत्र

 

 

ॐ जूं स माम् पालय पालय स: जूं ॐ।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

प्रामाणिक गुरु की खोज (ज्ञान का मूल्यांकन) –  भगवान अर्जुन से कह रहे है – विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रिय तृप्ति के विषयो का परित्याग, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोगो के दोषो की अनुभूति, वैराग्य, संतान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओ की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओ के प्रति समभाव, मेरे (भगवान) प्रति निरंतर अनन्य भक्ति, एकांत स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्मसाक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी हूँ वह सब अज्ञान है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – ज्ञान की प्रक्रिया के सम्पूर्ण वर्णन में से ग्यारहवे श्लोक की प्रथम पंक्ति सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। “ज्ञान की प्रक्रिया का अवसान भगवान की अनन्य भक्ति में होता है।” अतः कोई भगवान की दिव्य सेवा को नहीं प्राप्त कर पाता है या प्राप्त करने में असमर्थ है तो शेष उन्तीस बाते व्यर्थ है।

 

 

 

 

लेकिन यदि कोई पूर्ण कृष्ण भावना से भक्ति ग्रहण करता है तो वह उन्तीस बाते जिनका उल्लेख पहले हो चुका है। स्वमेव ही उसके (भक्त के) अंदर विकसित हो जाती है।

 

 

 

कभी-कभी अल्पज्ञ लोग ज्ञान की इस प्रक्रिया को कार्य क्षेत्र की अंतः क्रिया (विकार) के रूप में मानने की भूल करते है लेकिन वास्तव में यही ज्ञान की असली प्रक्रिया है।

 

 

 

यदि कोई इस प्रक्रिया को स्वीकार कर लेता है तो परम सत्य तक पहुँचने की संभावना हो जाती है। यह पूर्व में उल्लेख किए हुए चौबीस तत्वों का विकार नहीं है।

 

 

 

यह तो वास्तव में इन चौबीस तत्वों के पास से बाहर निकलने का साधन है। देहधारी आत्मा चौबीस तत्वों से बने आवरण रूप शरीर में बंद रहता है और यहां पर ज्ञान की जिस प्रक्रिया का वर्णन है वह इससे बाहर निकलने का साधन है।

 

 

 

 

जैसा कि श्रीमद्भागवत में कहा गया है – जिसने भक्ति अवस्था प्राप्त कर ली है उसमे ज्ञान के सारे गुण विकसित हो जाते है। जैसा कि आठवे श्लोक में उल्लेख हुआ है कि गुरु ग्रहण करने का सिद्धांत अनिवार्य है।

 

 

 

 

यहां तक कि जो भक्ति स्वीकार करते है उनके लिए भी यह आवश्यक है। जब प्रामाणिक गुरु को ग्रहण किया जाता है तभी आध्यात्मिक जीवन का शुभारंभ होता है।

 

 

 

यहां भगवान (कृष्ण) स्पष्ट कहते है कि ज्ञान की यह प्रक्रिया ही वास्तविक मार्ग है। इससे परे जो भी विचार किया जाता है वह सब व्यर्थ है।

 

 

 

 

 

यहां पर ज्ञान की जो रूप-रेखा प्रस्तुत की गई है उसका निम्नलिखित प्रकार से विश्लेषण किया जा सकता है – विनम्रता (अमानित्व) का अर्थ है कि मनुष्य को अन्य लोगो से सम्मान पाने का इच्छुक नहीं रहना चाहिए।

 

 

 

 

इस भौतिक छल के पीछे-पीछे दौड़ने का कोई लाभ नहीं है। मनुष्य अपनी देहात्म बुद्धि के कारण ही अन्य लोगो से सम्मान पाने का इच्छुक रहता है।

 

 

 

लेकिन जो व्यक्ति ज्ञान से पूर्ण युक्त होता है उसकी दृष्टि में जो यह जानता है कि वह शरीर नहीं है। इस शरीर से संबंधित सम्मान या अपमान सब व्यर्थ होता है। जहां तक आध्यात्मिक ज्ञान में वास्तविक प्रगति की बात है तो मनुष्य को अपनी परीक्षा करनी चाहिए कि वह कहा तक उन्नति कर पाया है।

 

 

 

 

लोग अपने धर्म में प्रसिद्ध होना चाहते है अतः यह देखा गया है कि कोई भी व्यक्ति धर्म के सिद्धांतो को जाने बिना ही ऐसे समुदाय में सम्मिलित हो जाता है जो वास्तव में धार्मिक सिद्धांतो का पालन नहीं करता है और इस तरह वह धार्मिक गुरु के रूप में अपना प्रचार करना चाहता है। इन सब बातो से मनुष्य अपनी परीक्षा कर सकता है।

 

 

 

 

 

आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने के लिए पवित्रता (शौचम) अनिवार्य होता है। पवित्रता की दो श्रेणियाँ है –

 

 

 

1- आतंरिक पवित्रता 2- बाह्य पवित्रता, बाह्य पवित्रता का अर्थ है स्नानादि कार्य करना तथा आंतरिक पवित्रता के लिए निरंतर ही कृष्ण का चिंतन तथा हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करना होता है। इस विधि से मन में पूर्व कर्मो की धूलि हट जाती है।

 

 

 

मिथ्या अहंकार – इसका अर्थ है इस शरीर को आत्मा मानना, जब कोई यह जान जाता है कि वह शरीर नहीं है अपितु आत्मा है तो वह वास्तविक रूप से अहंकार को प्राप्त होता है।

 

 

 

अहंकार तो रहता ही है यहां और मिथ्या अहंकार की भर्त्सना की जाती है न कि वास्तविक अहंकार की। जब इस आत्म भाव (स्वरुप) को वास्तविकता के लिए प्रयुक्त किया जाता है तो यह वास्तविक अहंकार होता है।

 

 

 

लेकिन जब ‘मैं हूँ’ भाव को मिथ्या शरीर के लिए प्रयुक्त किया जाता है तो वह मिथ्या अहंकार होता है। यह “मैं हूँ” का भाव ही अहंकार है। वैदिक साहित्य में (वृहदारण्य उपनिषद 4,1,10) कहा गया है – अहम ब्रह्मास्मि – मैं ब्रह्म हूँ, मैं आत्मा हूँ।

 

 

 

 

ऐसे कुछ दार्शनिक है जो यह कहते है कि हमे अपना अहंकार त्याग देना चाहिए। लेकिन हम अपने अहंकार को त्यागे कैसे? क्योंकि अहंकार का अर्थ है “स्वरुप” और कोई अपने स्वरुप (आत्मा) को कैसे त्याग सकता है।

 

 

 

 

लेकिन हमे मिथ्या अहंकार को अवश्य ही त्यागना होगा। “मैं हूँ” ही आत्म भाव है और यह आत्मसाक्षात्कार की मुक्त अवस्था में भी पाया जाता है।

 

 

 

 

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