Laxmi Chalisa PDF Free Download / लक्ष्मी चालीसा पाठ Pdf

Laxmi Chalisa PDF Free मित्रों इस पोस्ट में लक्ष्मी चालीसा के लाभ के बारे में बताया गया है।  आप यहां से लक्ष्मी चालीसा फ्री डाउनलोड ( Lakshmi Chalisa in Hindi PDF Free Download ) कर सकते हैं।

 

 

 

 

Laxmi Chalisa PDF Free / लक्ष्मी चालीसा पाठ Pdf Download

 

 

 

 

 

 

किसी भी व्यक्ति के शुभ कार्यों से खुश होकर माता लक्ष्मी उस व्यक्ति के घर तो जाती है लेकिन हमेशा ही उस व्यक्ति के घर में स्थिर निवास करें यह संभव नहीं हो सकता, क्योंकि उनका एक नाम चंचला होने के कारण ही वह हमेशा चलायमान “चंचल” रहती है। हमारे बड़े-बड़े ऋषियों के कथनानुसार धन और लक्ष्मी में अंतर है। लक्ष्मी शक्ति स्वरूपा है और धन ऊर्जा का स्वरूप है।

 

 

 

Lakshmi Chalisa Benefits in Hindi 

 

 

 

Laxmi Chalisa PDF Free
Laxmi Chalisa PDF Free

 

 

 

शक्ति के पास अपनी समझ और ज्ञान होता है, जबकि ऊर्जा के पास कोई ज्ञान विचार नहीं होता वह शक्ति के द्वारा ही चलित होता है। ऊर्जा का प्रयोग एक अनाड़ी भी कर सकता है, लेकिन शक्ति का प्रयोग केवल शक्तिशाली ही कर सकता है।

 

 

 

 

 

माता लक्ष्मी का निवास वहीं होता है, जिस घर में सभी प्राणी आपस में प्रेम के साथ रहते हो। सदाचार और धर्म परायण हो, द्विज जनों की सेवा की जाती हो, वृद्ध सेवा सुश्रुषा का ध्यान रखा जाता हो और स्वच्छता पूर्ण माहौल बनाये रखने की व्यवस्था हो वहां लक्ष्मी अवश्य ही आगमन और निवास करती है।

 

 

 

 

 

 

कलह पूर्ण माहौल चोरी बेईमानी और मक्कारी वाले गृह में लक्ष्मी का निवास असंभव होता है। जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में त्रिदेव का अग्रणी स्थान है, वैसे ही तीन शक्तियां भी त्रिदेवों की है।

 

 

 

 

इन त्रिदेव की एक भी शक्ति को मानव अपने आचरण और विचार व्यवहार प्रसन्न कर ले तो वह इन शक्तियों की कृपा से अनेको बैभव का स्वामी बन सकता है। जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता है। माँ लक्ष्मी जो शक्ति का अनंत भंडार है, उन्ही की शक्ति का एक छोटा सा कण यह रुपया पैसा इत्यादि है।

 

 

 

 

माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए व्यक्ति को स्वच्छ्ता रखते हुए लक्ष्मी चालीसा का पाठ बिना त्रुटि किए हुए नौ बार प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। इस युक्ति से माता की कृपा व्यक्ति पर बनी रहती है। कोई भी पूजा पाठ का कार्य हो उसमे त्रुटि की संभावना अवश्य ही रहती है, इसलिए क्षमा याचना करना आवश्यक है।

 

 

 

Laxmi Chalisa in Hindi Lyrics 

 

 

हम आपको लक्ष्मी चालीसा इन हिंदी देने जा रहे हैं। आप यहां से Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi पढ़ सकते हैं।

 

 

 

दोहा

मातु लक्ष्मी करि कृपा करो हृदय में वास।
मनोकामना सिद्ध कर पुरवहु मेरी आस॥
सिंधु सुता विष्णुप्रिये नत शिर बारंबार।
ऋद्धि सिद्धि मंगलप्रदे नत शिर बारंबार॥ टेक॥

 

 

सोरठा

 

यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं।
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥

 

 

॥ चौपाई ॥

 

सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोहि॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरबहु आस हमारी॥

 

जै जै जगत जननि जगदम्बा। सबके तुमही हो स्वलम्बा॥
तुम ही हो घट घट के वासी। विनती यही हमारी खासी॥

 

जग जननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी।

 

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
कृपा दृष्टि चितवो मम ओरी। जगत जननि विनती सुन मोरी॥

 

ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
क्षीर सिंधु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिंधु में पायो॥

 

चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभुहिं बनि दासी॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥

 

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
तब तुम प्रकट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥

 

अपनायो तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
तुम सब प्रबल शक्ति नहिं आनी। कहं तक महिमा कहौं बखानी॥

 

मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन- इच्छित वांछित फल पाई॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥

 

और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करे मन लाई॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित फल पावै फल सोई॥

 

त्राहि- त्राहि जय दुःख निवारिणी। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणि॥
जो यह चालीसा पढ़े और पढ़ावे। इसे ध्यान लगाकर सुने सुनावै॥

 

ताको कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै।
पुत्र हीन और सम्पत्ति हीना। अन्धा बधिर कोढ़ी अति दीना॥

 

विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥

 

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥

 

प्रतिदिन पाठ करै मन माहीं। उन सम कोई जग में नाहिं॥
बहु विधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥

 

करि विश्वास करैं व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जय जय जय लक्ष्मी महारानी। सब में व्यापित जो गुण खानी॥

 

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयाल कहूं नाहीं॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजे॥

 

भूल चूक करी क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
बिन दरशन व्याकुल अधिकारी। तुमहिं अक्षत दुःख सहते भारी॥

 

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥

 

कहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहिं नहिं अधिकाई॥
रामदास अब कहाई पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥

 

 

दोहा

 

त्राहि त्राहि दुःख हारिणी हरो बेगि सब त्रास।
जयति जयति जय लक्ष्मी करो शत्रुन का नाश॥
रामदास धरि ध्यान नित विनय करत कर जोर।
मातु लक्ष्मी दास पर करहु दया की कोर॥

।। इति लक्ष्मी चालीसा संपूर्णम।।

 

 

 

Lakshmi Chalisa Pdf in Hindi लक्ष्मी चालीसा Pdf in Hindi

 

 

आपने ऊपर लक्ष्मी चालीसा पढ़ लिया होगा। अब आप नीचे की लिंक से लक्ष्मी चालीसा फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

लक्ष्मी चालीसा Pdf Free Download

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

श्री कृष्ण कहते है – जब तुम्हारा मन वेदो की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाय तब तुम्हे दिव्य चेतना प्राप्त हो जाएगी।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावना भावित व्यक्ति या भगवान के एकनिष्ठ भक्त को न तो वेदो की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए न ही स्वर्ग जाने के उद्देश्य से सकाम कर्मो में प्रवृत्त होना चाहिए। कृष्ण भावनामृत में मनुष्य सदा ही कृष्ण के सान्निध्य में रहता है और कृष्ण से प्राप्त सारे आदेश उस दिव्य अवस्था में समझे जा सकते है। ऐसे कार्यो के परिणाम स्वरुप निश्चयात्मक ज्ञान की प्राप्ति निश्चित है उसे कृष्ण या उनके प्रतिनिधि गुरु की आज्ञाओ का पालन मात्र करना होगा।

 

 

 

‘कोई समाधि में है’ इस कथन का अर्थ यह होता है कि वह पूर्णतया कृष्ण भावना भावित है। अर्थात उसने पूर्ण समाधि में ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान को प्राप्त कर लिया है।

 

 

 

 

आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि यह जान लेना है कि मनुष्य कृष्ण का शाश्वत दास है और इसका एकमात्र कर्तव्य कृष्ण भावनामृत में अपने सारे कर्म करना है। यही समाधि की पूर्ण स्थिति होती है।

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

आदित्य, ज्योति, मरुत तथा नक्षत्रो में प्रधान – (कृष्ण) भगवान कहते है कि मैं ही आदित्यो में विष्णु, ज्योतियो में तेजस्वी सूर्य, मरुतो में मरिचि तथा नक्षत्रो में चन्द्रमा हूँ।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – नक्षत्रो में रात्रि के समय चन्द्रमा सर्वप्रमुख नक्षत्र है, अतः वह कृष्ण का ही प्रतिनिधि है। यहां इस श्लोक से प्रतीत होता है कि चन्द्रमा एक नक्षत्र है।

 

 

 

 

अतः आकाश में टिमटिमाने वाले तारे भी सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करते है। आदित्य बारह है जिनमे से कृष्ण प्रधान है। आकाश में टिमटिमाते ज्योति पुंजों में सूर्य ही मुख्य है और ब्रह्म संहिता में सूर्य को भगवान का तेजस्वी नेत्र कहा गया है।

 

 

 

 

वैदिक वाड्मय में ब्रह्माण्ड के अंतर्गत अनेक सूर्यो के सिद्धांत को स्वीकृत प्राप्त नहीं है। अंतरिक्ष में पचास प्रकार के वायु प्रवाहमान है जिनमे से वायु अधिष्ठाता मरीचि कृष्ण का ही प्रतिनधि है।

 

 

 

 

सूर्य एक है और सूर्य के प्रकाश से ही चन्द्रमा प्रकाशित है तथा अन्य नक्षत्र भी सूर्य से ही प्रकाशित होते है। चूँकि भगवद्गीता से सूचित होता है कि चन्द्रमा एक नक्षत्र है अतः टिमटिमाते तारे सूर्य न होकर चन्द्रमा के सदृश्य ही है।

 

 

 

 

22- वेदो में, इन्द्रियों में, देवो में तथा समस्त जीवो में मुख्य (कृष्ण) – भगवान कहते है – मैं वेदो में सामवेद हूँ, इन्द्रियों में मन, देवो में स्वर्ग का राजा इंद्र हूँ तथा समस्त जीवो की जीवन शक्ति (चेतना) भी मैं हूँ।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – पदार्थो के संयोग से कभी चेतना उत्पन्न नहीं की जा सकती है। पदार्थ तथा जीव में यही अंतर है। अतः यह चेतना परम तथा शाश्वत है। पदार्थ में जीवो के समान चेतना नही होती है।

 

 

 

23- रुद्रो, यक्षों, वसुओं तथा समस्त पर्वतो में प्रधान स्वरुप (कृष्ण) – भगवान कहते है कि मैं समस्त रुद्रो में शिव हूँ, यक्षों तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता (कुबेर) भी मैं हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतो में मेरु पर्वत मैं हूँ।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – ग्यारह रुद्रो में शंकर या शिव प्रमुख है। वह भगवान के अवतार है, शिव पर ही सारे ब्रह्माण्ड के तमोगुण का भार है।

 

 

 

 

मेरु पर्वत अपनी समृद्धि सम्पदा के लिए विख्यात है। यक्षों तथा राक्षसों के नायक कुबेर है जो देवताओ के कोषाध्यक्ष तथा भगवान के प्रतिनिधि है।

 

 

 

 

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