Law Books in Hindi Pdf / लॉ बुक्स इन हिंदी Pdf

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Law Books in Hindi Pdf / लॉ बुक्स इन हिंदी Pdf

 

 

 

लॉ बुक्स इन हिंदी Pdf Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान कहते है – हे पार्थ ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते है, वह भले ही निम्न जन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शूद्र (श्रमिक) क्यों न हो, वह परम धाम को प्राप्त करते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर भगवान ने स्पष्ट कहा है कि भक्ति में उच्च तथा निम्न जाती के लोगो का भेद नहीं होता है। भौतिक जीवन में ऐसा विभाजन होता है लेकिन भगवान की दिव्य भक्ति में लगे हुए व्यक्ति पर यह लागू नहीं होता है।

 

 

 

अतः भक्ति तथा शुद्ध भक्त द्वारा पथ प्रदर्शन इतने प्रबल है कि यहां उंच नीच का भेद भाव नहीं रह जाता है और कोई भी इसे ग्रहण कर सकता है शुद्ध भक्त की शरण ग्रहण करके सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी शुद्ध हो सकता है।

 

 

 

 

किन्तु भक्ति योग इतना प्रबल होता है कि भगवद्भक्त समस्त निम्न कुल वाले व्यक्तियों को जीवन की परम सिद्धि प्राप्त करा सकते है। यह तभी संभव है जब कोई कृष्ण की शरण में जाए।

 

 

 

 

जैसा कि व्यपाश्रित शब्द से सूचित है। मनुष्य को पूर्णतया कृष्ण की शरण ग्रहण करनी चाहिए। तब वह बड़े से बड़े योगी तथा ज्ञानी से भी महान बन सकता है

 

 

 

भगवान कहते है – जो कोई भी मुझे प्रेम तथा भक्ति के साथ पत्र, पुष्प, फल तथा जल प्रदान करता है तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – नित्य सुख के लिए स्थायी, आनन्दमय धाम प्राप्त करने हेतु ही बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कृष्ण भावनाभावित होकर भगवान की दिव्य प्रेमा-भक्ति में तत्पर रहे।

 

 

 

 

ऐसा आश्चर्यमय फल प्राप्त करने की विधि इतनी सरल है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति को योग्यता का विचार किए बिना ही इसे पाने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए।

 

 

 

 

इसके लिए एकमात्र योग्यता इतनी ही है कि वह व्यक्ति भगवान का शुद्ध भक्त होना चाहिए। इससे कोई अंतर नहीं पड़ता है कि कोई क्या है और कहाँ स्थित है।

 

 

 

 

कृष्ण भावनामृत विकसित करना जीवन का चरम लक्ष्य है। इस श्लोक में भक्ति शब्द का उल्लेख दो बार यह घोषित करने के लिए हुआ है कि भक्ति ही कृष्ण के पास पहुँचने का एकमात्र साधन है।

 

 

 

 

भक्ति ही मूल सिद्धांत है जिसके बिना वह किसी से कुछ भी लेने के लिए कदापि प्रेरित नहीं किए जा सकते है। भक्ति कभी हैतुकी नहीं होती है। यह शाश्वत विधि है। यह परम ब्रह्म ब्रह्म की सेवा में प्रत्यक्ष कर्म है।

 

 

 

किसी को भी कृष्ण भावनामृत से रोका नहीं जा सकता है क्योंकि यह सरलता के साथ ही बहुत व्यापक है। यह विधि इतनी सरल है है कि यदि प्रेम पूर्वक एक पत्ती, थोड़ा सा जल या फल ही भगवान को अर्पित किया जाता है तो भगवान उसे सहर्ष स्वीकार करते है।

 

 

 

 

ऐसा कौन मुर्ख होगा जो इतनी सरल विधि से कृष्ण भावनाभावित नहीं होना चाहेगा और सच्चिदानंदमय जीवन की परम सिद्धि नहीं चाहेगा? कृष्ण को केवल प्रेमाभक्ति चाहिए और कुछ भी नहीं, कृष्ण तो अपने शुद्ध भक्त से एक छोटा सा फूल भी ग्रहण करते है किन्तु अभक्त से कोई भेंट उन्हें स्वीकार नहीं होती है।

 

 

 

 

उन्हें किसी से कुछ भी नहीं चाहिए क्योंकि वह आत्म संतुष्ट रहते है तो भी वह अपने भक्त की भेंट प्रेम तथा स्नेह के विनिमय में स्वीकार करते है।

 

 

 

 

वह मायावादी चिंतक भगवद्गीता के श्लोक का अर्थ कदापि ही नहीं समझ सकते है। जो मानकर चलते है कि परम ब्रह्म इन्द्रियों से रहित है। उनके लिए यह या तो रूपक है या फिर भगवद्गीता के उद्घोषक कृष्ण के मानवीय चरित्र का प्रमाण है।

 

 

 

 

किन्तु वास्तविकता तो यह है कि भगवान कृष्ण इन्द्रियों से युक्त है और यह कहा गया है कि उनकी इंद्रियां परस्पर परिवर्तनशील है। इन्द्रिय रहित होने पर उन्हें समस्त ऐश्वर्या से युक्त नहीं माना जा सकता है।

 

 

 

 

कृष्ण को परम ब्रह्म कहने का आशय यही है। सातवे अध्याय में कृष्ण ने बताया है कि वह प्रकृति के गर्भ में जीवो को स्थापित करते है। इसे वह प्रकृति पर दृष्टिपात करके करते है।

 

 

 

 

यहां पर इस बात पर इसलिए बल देना होगा क्योंकि अपनी सर्वोच्च स्थिति के कारण ही उनका सुनना उनके भोजन करने तथा स्वाद ग्रहण करने के ही समरूप है। केवल शुद्ध भक्त ही बिना तर्क के समझ सकता है कि परम ब्रह्म भोजन कर सकता है और भोजन का स्वाद ग्रहण कर सकता है।

 

 

 

 

तृतीय अध्याय के तेरहवे श्लोक में श्री कृष्ण बताते है कि यज्ञ का उच्छिष्ट सबसे शुद्ध होता है। अतः जो लोग जीवन के प्रगति करने तथा भवबंधन से मुक्त होने के इच्छुक है।

 

 

 

 

उन्हें इन्हे (उच्छिष्ट) को ही खाना चाहिए, इसी श्लोक में यह भी कहते है कि जो लोग अपने भोजन को अर्पित नहीं करते है वह पाप भक्षण करते है। (भोजन को पहले भगवान को अर्पित करना चाहिए) भोजन बनाने तथा सेवा करने में जो सबसे मुख्य बात रहती है।

 

 

 

 

वह है कृष्ण के प्रेम वश कर्म करना। अच्छा सरल शाकाहारी भोजन बनाकर उसे कृष्ण के चित्र या आर्चा विग्रह के समक्ष अर्पित करके तथा नतमस्तक होकर इस तुच्छ भेट को स्वीकार करने की प्रार्थना से मनुष्य अपने जीवन में निरंतर प्रगति करता है।

 

 

 

 

उसका शरीर शुद्ध होता है और मष्तिष्क के श्रेष्ठ तंतु उत्पन्न होते है जिससे शुद्ध रूप से चिंतन हो पाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि यह समर्पण प्रेम पूर्वक करना चाहिए।

 

 

 

 

कृष्ण को किसी तरह के भोजन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि उनके पास सब कुछ है किन्तु यदि कोई इन्हे इस प्रकार प्रसन्न करना चाहता है तो भेट को स्वीकार करते है। कृष्ण को अर्पित किए बिना भोजन का प्रत्येक कौर इस संसार की जटिलताओं से मनुष्य को बांधने वाला होता है।

 

 

 

 

इतना बतलाते हुए कि वह (कृष्ण) ही एकमात्र परम भोक्ता है, आदि स्वामी और समस्त यज्ञ भेटो के वास्तविक लक्ष्य है। अब भगवान कृष्ण यह बताते है कि उन्हें किस प्रकार की भेट पसंद है।

 

 

 

 

यदि कोई शुद्ध होने तथा जीवन के लक्ष्य तक पहुँचने के उद्देश्य से भगवद्भक्ति करना चाहता है तो उसे चाहिए कि वह पता करे कि भगवान उससे क्या चाहते है। कृष्ण से प्रेम करने वाला उन्हें उनकी इच्छित वस्तु ही देगा और कोई ऐसी वस्तु भेट नहीं करेगा जिसकी उन्हें इच्छा न हो या उन्होंने न मांगी हो।

 

 

 

 

शाक अन्न, फल दूध तथा जल – ये ही मनुष्यो के लिए उचित भोजन है और कृष्ण भगवान ने भी इन्ही का आदेश दिया है। इसके अतिरिक्त हम जो भी खाते हो वह उन्हें कदापि अर्पित नहीं किया जा सकता है क्योंकि वह उन्हें ग्रहण नहीं करेंगे।

 

 

 

 

यदि हम ऐसा भोजन उन्हें अर्पित करेंगे तो हम प्रेमाभक्ति नहीं कर सकेंगे। इस प्रकार कृष्ण को मांस, मछली तथा अंडे भेट नहीं किए जाने चाहिए।

 

 

 

 

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