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Lalitha Sahasranamam Pdf in Hindi / ललिता सहस्रनाम Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Lalitha Sahasranamam Pdf in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Lalitha Sahasranamam in Hindi Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Lalitha Sahasranamam Pdf / ललिता सहस्रनाम पीडीएफ 

 

 

 

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Lalitha Sahasranamam Pdf
ललिता सहस्रनाम पीडीएफ डाउनलोड
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Lalitha Sahasranamam Pdf in Hindi
दुर्गा सहस्त्रनाम Pdf in Hindi
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श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्र लिरिक्स संस्कृत 

 

 

 

॥ न्यासः ॥

अस्य श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रमाला मन्त्रस्य ।

वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः ।

अनुष्टुप् छन्दः ।

श्रीललितापरमेश्वरी देवता ।

श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् ।

मध्यकूटेति शक्तिः ।

शक्तिकूटेति कीलकम् ।

श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी-प्रसादसिद्धिद्वारा

चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।

 

॥ ध्यानम् ॥

सिन्दूरारुण विग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलि स्फुरत्

तारा नायक शेखरां स्मितमुखी मापीन वक्षोरुहाम् ।

पाणिभ्यामलिपूर्ण रत्न चषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं

सौम्यां रत्न घटस्थ रक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥

 

अरुणां करुणा तरङ्गिताक्षीं

धृत पाशाङ्कुश पुष्प बाणचापाम् ।

अणिमादिभि रावृतां मयूखै-

रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥

ध्यायेत् पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं

हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।

सर्वालङ्कार युक्तां सतत मभयदां भक्तनम्रां भवानीं

श्रीविद्यां शान्त मूर्तिं सकल सुरनुतां सर्व सम्पत्प्रदात्रीम् ॥

 

सकुङ्कुम विलेपनामलिकचुम्बि कस्तूरिकां

समन्द हसितेक्षणां सशर चाप पाशाङ्कुशाम् ।

अशेषजन मोहिनीं अरुण माल्य भूषाम्बरां

जपाकुसुम भासुरां जपविधौ स्मरे दम्बिकाम् ॥

॥ अथ श्रीललितासहस्रनामस्तोत्रम् ॥

ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ॥ १॥

उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता ।
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥ २॥

मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका ।
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥ ३॥

चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिक-लसत्कचा ।
कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ॥ ४॥

अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता ।
मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ॥ ५॥

वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ॥ ६॥

नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता ।
ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ॥ ७॥

कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा ।
ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ॥ ८॥

पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः ।
नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ॥ ९॥ or दशनच्छदा

शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला ।
कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा ॥ १०॥

निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी । or निज-संलाप
मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ॥ ११॥

अनाकलित-सादृश्य-चिबुकश्री-विराजिता । or चुबुकश्री
कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ॥ १२॥

कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता ।
रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ॥ १३॥

कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी ।
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ॥ १४॥

लक्ष्यरोम-लताधारता-समुन्नेय-मध्यमा ।
स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ॥ १५॥

अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी ।
रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ॥ १६॥

कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता ।
माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ॥ १७॥

इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका ।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ॥ १८॥

नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा ।
पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ॥ १९॥

सिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा । or शिञ्जान
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥ २०॥

सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता ।
शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ॥ २१॥

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

शरीर त्याग का समय समझाना – श्री कृष्ण कहते है – हे भरत श्रेष्ठ ! अब मैं तुम्हे उन विभिन्न कालो को बताऊंगा जिनमे इस संसार से प्रयाण करने बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि योगी सिद्ध होता है तो वह इस जगत से शरीर छोड़ने का समय तथा स्थान खुद ही चुन लेता है, यदि वह इतना पटु नहीं होता है तो उसकी सफलता उसके अचानक शरीर त्याग के संयोग पर निर्भर करती है।

 

 

 

 

परमेश्वर के अनन्य, पूर्ण शरणागत भक्तो को इसकी चिंता कदापि नहीं रहती है कि वह कब और किस तरह शरीर को त्यागेंगे। वह सब कुछ कृष्ण पर छोड़ देते है और इस तरह सरलता पूर्वक, प्रसन्नता सहित भगवद्धाम को जाते है।

 

 

 

 

भगवान ने अगले श्लोक में ऐसे उचित अवसरों का वर्णन किया है कि कब मरने से कोई वापस नहीं आता। आचार्य बलदेव विद्याभूषण के अनुसार यहां पर संस्कृत के काल शब्द का प्रयोग काल के अधिष्ठाता देव के लिए हुआ है, किन्तु जो भगवान के अनन्य भक्त नहीं है और कर्मयोग, ज्ञानयोग, हठयोग जैसी आत्म-साक्षात्कार की विधियों पर आश्रित रहते है। उन्हें उपयुक्त समय में शरीर त्यागना होता है, जिससे वह आश्वस्त हो सके कि इस जन्म-मृत्यु वाले संसार में उनको लौटना होगा या नहीं।

 

 

 

 

24- परम ब्रह्म की प्राप्ति – भगवान कहते है – जो परम ब्रह्म के ज्ञाता है, वह अग्निदेव के प्रभाव में, प्रकाश में, दिन के शुभ लक्षण में, शुक्ल पक्ष में या जब सूर्य उत्तरायण में रहता है। उन छह मासो में इस संसार से शरीर त्याग करने पर उस परम ब्रह्म को प्राप्त करते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जब अग्नि, प्रकाश, दिन तथा पक्ष का उल्लेख रहता है तो यह समझना चाहिए कि इस सबो के अधिष्ठाता देव होते है, जो आत्मा की यात्रा की व्यवस्था करते है। योग में सिद्ध योगी अपने शरीर को त्यागने के समय और स्थान की व्यवस्था कर सकते है। अन्यो का इस पर वश नहीं होता।

 

 

 

 

मृत्यु के समय मन मनुष्य को नवीन जीवन मार्ग पर ले जाता है। यदि कोई अकस्मात या फिर योजनापूर्वक उपर्युक्त समय पर शरीर त्याग करता है तो उसके लिए निर्विशेष ब्रह्म ज्योति प्राप्त कर पाना संभव होता है।

 

 

 

 

यदि संयोग वश वह शुभ मुहूर्त में शरीर त्यागते है तब तो उनको जन्म-मृत्यु के चक्र में लौटना नहीं पड़ता, अन्यथा उनके पुनरावर्तन की संभावना बनी रहती है।

 

 

 

 

किन्तु कृष्ण भावनामृत में शुद्ध भक्त के लिए इस भौतिक संसार में लौटने का कोई भय नहीं रहता है। चाहे वह शुभ मुहूर्त में शरीर त्याग करे या अशुभ क्षण में, चाहे अकस्मात शरीर त्याग करे या स्वेच्छा पूर्वक।

 

 

 

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