Lal Kitab 1939 in Hindi Pdf Free Download

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Lal Kitab 1939 in Hindi Pdf Free Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अर्जुन कहता है कि – हे कृष्ण ! आपने मुझसे जो कहा है। उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ। हे प्रभु ! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरुप को समझ सकते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जैसा कि भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय में कहा गया है। भगवद्गीता के समझने की गुरु परंपरा विलुप्त हो गई थी।

 

 

 

अतः कृष्ण ने अर्जुन को गीता ज्ञान देकर उसकी पुनः स्थापना की, क्योंकि वह अर्जुन को वह (कृष्ण) अपना परम प्रिय सखा तथा भक्त समझते थे।

 

 

 

 

यह पर अर्जुन इसकी पुष्टि करता है कि श्रद्धा विहीन तथा आसुरी प्रवृत्ति वाले लोग कृष्ण को नहीं समझ सकते है। जब देवतागण कृष्ण को नहीं समझ सकते तो आधुनिक जगत के तथाकथित विद्वानों का कहना ही क्या है? भगवद्कृपा से ही अर्जुन समझ गया कि परम सत्य कृष्ण है और वह सम्पूर्ण है।

 

 

 

 

अतः हमे अर्जुन के पथ का ही अनुसरण करना चाहिए। उसे भगवद्गीता का प्रमाण प्राप्त था। अतः जैसा कि गीतोपनिषद की भूमिका में हमने कहा है कि भगवद्गीता का ज्ञान परंपरा विधि से ही प्राप्त करना उत्तम रहता है।

 

 

 

 

परंपरा विधि के लुप्त होने पर उसके सूत्रपात के लिए ही अर्जुन को चुना गया। हमे चाहिए कि अर्जुन का हम अनुसरण करे जिसने कृष्ण की सारी बातें जान ली। तभी हम भगवद्गीता के सार को समझ सकेंगे और तभी हम कृष्ण को भगवान के रूप में जान सकेंगे।

 

 

 

 

15- भगवान (कृष्ण) को जानना (भक्ति के माध्यम से) – अर्जुन ने कहा – हे पुरुषोत्तम सबके उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवो के देव हे ब्रह्माण्ड के प्रभु ! निःसंदेह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अंतरंगा शक्ति से जानने वाले है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – परम सत्य का अनुभव तीन प्रकार से किया जाता है 1- निराकार ब्रह्म 2- अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान के रूप में, अतः परम सत्य के ज्ञान की अंतिम अवस्था भगवान है।

 

 

 

 

हो सकता है कि सामान्य व्यक्ति अथवा ऐसा मुक्त पुरुष भी जिसने निराकार ब्रह्म अथवा अन्तर्यामी परमात्मा का साक्षात्कार किया है।

 

 

 

 

वह भी भगवान को न समझ पाए अतः ऐसे व्यक्तियों के लिए भगवद्गीता के माध्यम से भगवान को समझने का प्रयास अवश्य ही करना चाहिए जिसे स्वयं कृष्ण ने श्लोको के माध्यम से कहा है।

 

 

 

परमेश्वर कृष्ण को वही जान सकता है जो अर्जुन तथा उसके अनुयायियों की भांति भक्ति करने के माध्यम से भगवान के सम्पर्क में रहते है।

 

 

 

 

आसुरी या नास्तिक प्रकृति के लोग कृष्ण को नहीं जान सकते है या कि ऐसे लोगो के लिए कृष्ण जानना संभव नहीं है क्योंकि उनकी बुद्धि कृष्ण की परा शक्ति (माया) से ढकी हुई रहती है। जो कृष्ण नहीं जानता है उसे भगवद्गीता की टीका करने का तो कत्तई प्रयास नहीं करना चाहिए और भगवान से दूर ले जाने वाला मनोधर्म तो परम घातक होता है।

 

 

 

 

भगवद्गीता कृष्ण की वाणी है और चूँकि यह कृष्ण का तत्व विज्ञान है अतः इसे कृष्ण से ही समझना चाहिए। जैसा कि अर्जुन ने किया इसे नास्तिको से ग्रहण नहीं करना चाहिए। श्रीमद्भागवत में (1,2,11) कहा गया है कि –

वदन्ति तत्त्वविदस्तत्वं यज्ज्ञान मद्वयम। 

ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानीति शब्द्यते।।  

 

 

 

यदि कोई (कृष्ण) को भूतेश रूप में समझ लेता है तो भी उन्हें परम नियंता के रूप में नहीं जान पाता है। इसलिए उन्हें यहां पर भूतेश या परम नियंता कहा गया है।

 

 

 

 

यदि कोई भूतेश रूप में उन्हें (कृष्ण) को समझ लेता है तो भी उन्हें समस्त देवताओ के उद्गम के रूप में नहीं समझ पाता है। इसलिए उन्हें देव-देव, सभी देवताओ का पुज्यनीय देव कहा गया है।

 

 

 

 

कभी-कभी निर्विशेषवादी कृष्ण को भगवान के रूप में या उनकी प्रामाणिकता को स्वीकार करते है। किन्तु अनेक मुक्त पुरुष कृष्ण को पुरुषोत्तम रूप में नहीं समझ पाते इसलिए अर्जुन ने उन्हें पुरुषोत्तम कहकर सम्बोधित किया है।

 

 

 

 

इतने पर भी कुछ लोग नहीं समझ पाते कि कृष्ण ही समस्त जीवो के जनक है। इसलिए अर्जुन उन्हें भूत भावन कहकर सम्बोधित करता है।

 

 

 

 

यदि कृष्ण को देव-देव के रूप में समझ लिया जाय तो वह (कृष्ण) प्रत्येक वस्तु के स्वामी के रूप में समझ नहीं आते। इसलिए अर्जुन उन्हें यहां पर जगत्पति कहता है।

 

 

 

 

इसलिए अर्जुन की अनुभूति के आधार पर कृष्ण विषयक सत्य की स्थापना इस श्लोक में हुई है। हमे चाहिए कि कृष्ण को यथा रूप में समझने के लिए हम अर्जुन के पद चिन्हो का अनुसरण करे।

 

 

 

 

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