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Kumar Pankaj Novels in Hindi Pdf / एल्गा – गोरस उपन्यास Pdf

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मित्रों इस पोस्ट में Kumar Pankaj Novels in Hindi Pdf दिया गया है। आप नीचे की लिंक से Kumar Pankaj Novels in Hindi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Shagun Sharma Novel in Hindi Pdf कर सकते हैं।

 

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Kumar Pankaj Novels in Hindi Pdf Download

 

 

 

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एल्गा गोरस हिंदी नॉवेल यहां से डाउनलोड करे।
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यहां से डाउनलोड करे।
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दिल्ली दरबार हिंदी उपन्यास यहां से डाउनलोड करे।
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अँधेरे का अपराध हिंदी नॉवेल यहां से डाउनलोड करे।
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

तुम मुझे पकड़ने में सफल नहीं हो सकते इतना कहते ही दोनों हाथ धीरे-धीरे पतले होने लगे। मिलन उन हाथो को पकड़ में रखने का बहुत प्रयास कर रहा था लेकिन वह दोनों हाथ धागे से भी पतले होकर मिलन की पकड़ से छूटकर मटके के अंदर चले गए। मिलन लाचार होकर देखता रह गया।

 

 

 

 

मटके से अदृश्य आवाज आयी – मिलन! तुम अपने पास हमारी उपस्थिति चाहते हो या फिर मुझे देखने की इच्छा करते हो। अगर तुम मुझे देखना चाहते हो तो मैं तुम्हारे सामने अवश्य ही आउंगी लेकिन उसके बाद तुम हमारी सहायता से वंचित हो सकते हो क्योंकि मैं तुम्हारे सामने प्रकट होने के बाद यहां नहीं रह सकती हूँ मुझे परीलोक वापस जाना होगा।

 

 

 

 

अगर मैं तुमसे अदृश्य रहूंगी तो हमेशा तुम्हारे आस-पास रहूंगी और तुम्हारी सहायता भी करती रहूंगी। तुम मुझे जल्द बताओ अपना निर्णय क्योंकि पिता जी राजा के पास जाने के लिए तैयार हो चुके है। एक पल की देर किए बिना ही मिलन बोला – मुझे अपने साथ सदैव तुम्हारी उपस्थिति ही चाहिए आज के बाद मैं तुम्हे देखने की जिद नहीं करूँगा।

 

 

 

 

अदृश्य परी सुमन बोली – तुमने हमारे लिए राहत प्रदान किया है नहीं तो तुम्हारे सामने आते ही यहां आज हमारा अंतिम दिन होता। परीलोक में जाने के बाद मुझे दंड भुगतना पड़ता। मिलन अपने कमरे से बाहर निकला तो देखा उसके पिता हरी राज दरबार में जाने के लिए रथ का इंतजार कर रहे थे।

 

 

 

 

उसी क्षण रथ आ गया जो आज बहुत ही सुसज्जित था। मिलन अपने पिता से बोला – पिता जी आज आप राजा जयंत को अपने यहां भोजन के लिए निमंत्रण कर देना और उन्हें कह देना कि अपने राज्य की सारी प्रजा को भी साथ लेते आएंगे।

 

 

 

 

ऐसा विचित्र निमत्रण की बात सुनकर हरी का दिमाग सुन्न हो गया लेकिन तब तक रथ राज दरबार के लिए चल पड़ा था। राज दरबार के सामने हरी प्रजापति का सुंदर सुहावना रथ रुक गया। राजा जयंत स्वयं ही हरी प्रजापति की अगवानी के लिए उपस्थित थे।

 

 

 

 

उनके साथ चाटुकार दीनू भी उपस्थित था जो आज अपनी योजना में हरी को फंसाने वाला था। उस विचारे को नहीं पता था कि जिसकी सहायता स्वयं ईश्वर करते है उसे कोई किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचा सकता। अलवत्ता थोड़ी परेशानी अवश्य ही उपस्थित हो जाती है।

 

 

 

 

राजा जयंत का दरबार सजा हुआ था। सभी सभासद और कर्मचारी अपनी जगह पर विराजमान थे। राजा जयंत से स्वयं हरी प्रजापति को अपने दाहिने आसन ग्रहण कराया सभी लोग हरी के स्वागत में खड़े हो गए थे। कई विद्वान उनकी प्रशंसा में स्वाति वाचन करने लगे।

 

 

 

 

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