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Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf / करवा चौथ कथा हिंदी में Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से Alha-Udal Pdf Hindi Download कर सकते हैं।

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Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf
पुस्तक के लेखक 
पृष्ठ  40 
साइज  1.6 Mb 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  धार्मिक 

 

 

 

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Karwa Chauth Katha In Hindi Pdf
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Chandra Kavacham Pdf
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करवा चौथ व्रत कथा Pdf

 

 

 

एक बहुत प्राचीन समय की बात है। एक वणिक था और उसके साथ पुत्र और सात बहुए थी। वणिक के सात पुत्रो की एकलौती बहन थी उसका नाम करवा था। उसके सभी भाई उससे बहुत प्यार करते थे। करवा का ब्याह हो चुका था। एक बार वह अपने ससुराल से अपने पीहर आयी हुई थी।

 

 

 

संयोग से उसी दिन करवा चौथ का व्रत था। वणिक पुत्री करवा ने भी चौथ का व्रत रखा हुआ था। निर्जला व्रत रखने के कारण उसका भूख प्यास से व्याकुल होना स्वाभाविक था। वणिक के सभी लड़के रात्रि के समय अपना व्यसाय बंद करके घर आये और भोजन करने बैठे थे।

 

 

 

वह सभी अपनी बहन को भोजन कराने के उपरांत ही भोजन करते थे। सभी लोगो ने अपनी बहन करवा को भी अपने साथ भोजन करने के लिए आमंत्रित किया। वणिक पुत्री करवा ने अपने भाइयो को मना करते हुए कहा कि आज उसका करवा चौथ का व्रत है।

 

 

 

वह चंद्र दर्शन के पश्चात ही अन्न जल ग्रहण करेगी। करवा ने सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की व्याकुलता सहन नहीं हो सकी। उसने एक उपाय किया एक वृक्ष पर चढ़कर एक दीपक जलाकर चलनी के ओट से ढक दिया जो दूर से देखने पर उगे हुए चाँद के सदृश्य प्रतीत होता था।

 

 

 

सबसे छोटा वणिक पुत्र दौड़कर अपनी बहन करवा के पास आया और बोला – वह देखो चांद निकल आया है। करवा ने बिना असलियत समझे ही उस दीपक और चलनी के प्रतिबिंब को चांद समझने की भूल करते हुए उसकी पूजा किया फिर अर्घ्य देकर पूजा समापन के बाद अपने भाइयो के साथ भोजन करने के लिए बैठ गयी।

 

 

 

करवा ने जैसे ही भोजन का पहला निवाला उठाया तभी उसे छींक आ गयी। वह थोड़ा देर रुकने के बाद दूसरा निवाला उठाया तो उसमे बाल निकल आया। अतः थोड़ा विलंब करने के बाद करवा ने तीसरा निवाला मुंह में रखा ही था कि उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिल गया।

 

 

 

अब तो करवा बहुत परेशान हो गयी उसे कुछ नहीं सूझ रहा था। उसने अपने पति के निर्जीव शरीर के संरक्षण करने का निश्चय किया। वह भली प्रकार से अपने पति के निर्जीव शरीर की देख भाल करती रही और नष्ट होने से बचाने का प्रयास करती रही।

 

 

 

उसके पति के निर्जीव शरीर के ऊपर सुई नुमा कांटेदार घास उग आयी थी। उस सुईनुमा कटीली घास को निकाल-निकाल कर अपने पास रखती जाती थी। उसने अपने पति के जीवित होने के लिए प्रण कर रखा था। एक वर्ष बाद फिर ‘करवा चौथ’ का व्रत आया।

 

 

 

करवा की भाभी उसके पास आकर बोली – तुमने गलत ढंग से करवा व्रत किया था अतः वह खंडित हो गया और देवताओ के क्रोध के फलस्वरूप ही पति वियोग का दंड भुगतना पड़ रहा है।

 

 

 

करवा की सभी भाभी व्रत रखे हुए थी और अपने ननद के पास आशीर्वाद लेने के लिए आती तो करवा अपनी प्रत्येक भाभी से सुईनुमा घास देकर आग्रह करती थी कि ‘मुझे भी अपनी तरह सुहागिन बना दो’ यम की सुई ले लो और पिय की सुई दे दो।

 

 

 

लेकिन प्रत्येक भाभी उससे यही आग्रह दूसरी भाभी से करने के लिए कहती थी। इसी क्रम में छठवीं भाभी का नंबर आया। वह भी करवा के पास आशीर्वाद लेने के लिए गई तो करवा ने उससे भी कहा – ‘हमे अपनी तरह सुहागिन बना दो’ यम की सुई ले लो और पिय की सुई ले लो।

 

 

 

छठवीं भाभी बोली – यह कार्य सिर्फ तुम्हारी छोटी भाभी कर सकती है। उसके अलावा यह कार्य कोई भी नही कर सकता क्योंकि उसके दाहिने हाथ की कनिष्ठा अंगुली मे अमृत है वही तुम्हारे पति को जीवित कर सकती है। जब वह तुम्हारे पास आशीर्वाद लेने के लिए आये तो उसे कसकर पकड़ लेना और अपने पति को जीवित करने के लिए कहना।

 

 

 

उसे तब तक नहीं छोड़ना जब तक  वह तुम्हारे पति को जीवित न कर दे। इतना कहते हुए छठवीं भाभी चली गयी।  अब सातवीं भाभी का नंबर  था करवा से आशीर्वाद प्राप्त करने का। वह अपनी ननद करवा की पास आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आयी तब करवा ने उससे भी सुहागिन बनाने का आग्रह किया।

 

 

 

करवा को पहले ही उसकी छठवीं भाभी से ज्ञात हो चुका था कि छोटे भाई की वजह से ही उसका व्रत खंडित हुआ है अतः सातवीं और छोटी भाभी के पास ही उसके पति जीवन शक्ति प्रदान करने की क्षमता है। करवा की छोटी भाभी टाल मटोल करने लगी।

 

 

 

तब करवा ने उसे कसकर जकड़ लिया और बोली – जब तक आप हमारे सुहाग को जीवन दान नहीं देंगी रब तक मैं  आपको आजाद करके यहां से वापस नही जाने दूंगी। अब तो करवा की छोटी और सातवी भाभी के पास कोई मार्ग नहीं बचा था।

 

 

 

अतः उसने अपने दाहिंने हाथ की कनिष्ठा अंगुली से अमृत की बूंदे करवा के पति के मुंह मी डाल दिया। चमत्कारिक रूप से करवा का पति श्री गणेश, श्री गणेश कहते हुए उठकर बैठ गया। प्रभु की कृपा से करवा पुनः सुहागिन हो गयी। मान्यता के अनुसार उसी समय से करवा चौथ के व्रत का श्री गणेश हुआ तथा सभी सुहागिन स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए करवा चौथ का व्रत करती है।

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

जल की बूंदे, पृथ्वी के रज कण चाहे गिने जा सकते हो पर श्री रघुनाथ जी के चरित्र का वर्णन करने से नहीं चुकता है। यह पवित्र कथा भगवान के परम पद को देने वाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति की प्राप्ति होती है। हे उमा! मैं वह सब सुंदर कथा कही जो काकभुशुण्डि जी ने गरुड़ जी को सुनाई थी।

 

 

 

मैंने श्री राम जी के कुछ थोड़े से गुणों का बखान किया है। हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूं? श्री राम जी की मंगलमयी कथा सुनकर पार्वती जी हर्षित हुई और अत्यंत विनम्र और कोमल वाणी बोली। हे त्रिपुरारी! मैं धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्यु के भय को हरने वाले श्री राम जी के चरित्र को सुना।

 

 

 

हे कृपाधाम! अब आपकी कृपा से मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु! मैं सच्चिदानंद घन श्री राम जी के प्रताप को जान गयी। हे नाथ! आपका मुख रूपी चन्द्रमा श्री रघुवीर की कथा रूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर! मेरा मन कर्णपुटो से उसे पीकर तृप्त नहीं होता है।

 

 

 

श्री राम जी का चरित्र सुनते हुए जो तृप्त हो जाते है उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन मुक्त महामुनि है वह भी भगवान के गुण निरंतर सुनते रहते है। जो संसार सागर से पार होना चाहता है उसके लिए तो श्री राम जी कथा दृढ नौका के समान है। श्री हरि के गुण समूह तो विषयी लोगो के कानो को भी सुख प्रदान करने वाले और मन को आनंद देने वाले है।

 

 

 

जगत में ऐसा कौन श्रवन वाला है जिसे श्री रघुनाथ जी के चरित्र न सुहाते हो। जिन्हे श्री रघुनाथ जी की कथा नहीं सुहाती है वह मुर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करने वाले है हे नाथ आपने श्री राम चरित्र मानस का गान किया उसे सुनकर मैंने अपार सुख प्राप्त किया।आपने जो यह कहा कि यह सुंदर कथा काकभुशुण्डि जी गरुण जी से कही थी।

 

 

 

सौ कौए का शरीर प्राप्त करके भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ है उनका श्री राम जी के चरणों में अत्यंत प्रेम है और उन्हें श्री रघुनाथ जी की भक्ति प्राप्त है। इस बात का मुझे परम संदेह हो रहा है।

 

 

 

हे त्रिपुरारी! सुनिए, हजारो मनुष्यो में कोई एक धर्म के व्रत का धारण करने वाला होता है और कोटि धर्मात्माओं में कोई एक विषयो का त्यागी और वैराग्य परायण होता है। श्रुति कहती है कि कोटि विरक्त मनुष्यो में कोई एक ही सम्यक ‘यथार्थ’ ज्ञान को प्राप्त करता है और कोटि ज्ञानियों में कोई एक जीवन मुक्त होता है। जगत में कोई विरला ही जीवन मुक्त होगा।

 

 

 

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