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कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा Pdf / Kartik Purnima Katha Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Kartik Purnima Katha Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Kartik Purnima Katha Pdf Download कर सकते हैं और यहां से Patanjali Products list Pdf Hindi कर सकते हैं।

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Kartik Purnima Katha Pdf

 

 

पुस्तक का नाम  Kartik Purnima Katha Pdf
साइज  0.63 Mb 
फॉर्मेट  Pdf 
पृष्ठ 
भाषा  हिंदी 
श्रेणी  भक्ति 

 

 

 

कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा Pdf Download

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये

 

 

तत्पश्चात देवेश्वर शिव को आमंत्रित करके हिमाचल अपने घर को गए और नाना प्रकार के विधान से भोजनोत्सव की तैयारी करने लगे। उन्होंने प्रसन्नता और उत्कंठा के साथ भोजन के लिए परिवार सहित भगवान शिव को यथोचित रीति से अपने घर बुलवाया।

 

 

 

शंभु के, विष्णु के, मेरे, अन्य सब देवताओ के, मुनियो के तथा वहां आये हुए अन्य सब लोगो के भी चरणों को बड़े आदर के साथ धोकर उन सबको गिरिराज ने मंडप के अंदर सुंदर आसनो पर बिठाया। फिर अपने भाई बंधुओ को साथ लेकर उनके सहयोग से उन सब अतिथियों को नाना प्रकार के सरस पदार्थो द्वारा पूर्णतया तृप्त किया।

 

 

 

मेरे, विष्णु के तथा शंभु के साथ सब लोगो ने अच्छी तरह भोजन किया। नारद! विधिवत भोजन और आचमन करके तृप्त और प्रसन्न हुए सब लोग हिमालय से आज्ञा ले अपने-अपने डेरे पर गए। मुने! इसी प्रकार तीसरे दिन भी गिरिराज ने विधिवत दान, मान और आदर आदि के द्वारा उन सबका सत्कार किया।

 

 

 

चौथा दिन आने पर शुद्धतापूर्वक सविधि चतुर्थी कर्म हुआ जिसके बिना विवाह यज्ञ अधूरा ही रह जाता है। उस समय नाना प्रकार का उत्सव हुआ। साधुवाद और जय-जयकार की ध्वनि हुई। बहुत से सुंदर-सुंदर दान दिए गए। भांति-भांति के सुंदर गान और नृत्य हुए।

 

 

 

पांचवे दिन सब देवताओ ने बड़े हर्ष और अत्यंत प्रेम के साथ शैलराज को सूचित किया कि अब हम लोग यहां से जाना चाहते है। आप आज्ञा प्रदान करे। उनकी यह बात सुन गिरिराज हिमवान हाथ जोड़कर बोले – देवगण! आप लोग कुछ दिन और रुके तथा मुझपर कृपा करे।

 

 

 

यों कहकर उन्होंने स्नेह के साथ उन देवताओ को, भगवान शिव को, विष्णु को, मुझको तथा अन्य लोगो को बहुत दिनों तक ठहराया और हर रोज विशेष आदर सत्कार किया। इस प्रकार देवताओ को वहां रहते हुए बहुत दिन बीत गए। तब उन सबने गिरिराज के पास सप्तर्षियों को भेजा।

 

 

 

सप्तर्षियों ने हिमवान और मेना से समयोचित बात कहकर उन्हें समझाया परम शिवतत्व का वर्णन किया तथा प्रसन्नता पूर्वक उनके सौभाग्य की सराहना की। मुने! उनके समझाने से गिरिराज ने बारात को विदा करना स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात भगवान शंभु यात्रा के लिए उद्यत हो देवता आदि के साथ शैलराज के पास आये।

 

 

 

देवेश्वर शिव देवताओ सहित कैलास की यात्रा के लिए जब उद्यत हुए उस समय मेना उच्च स्वर से रोने लगी और उन कृपानिधान से बोली – कृपानिधे! कृपा करके मेरी शिवा का भली भांति लालन-पालन कीजियेगा। आप आशुतोष है। पार्वती के सहस्रो अपराधों को भी क्षमा कीजियेगा।

 

 

 

मेरी बच्ची जन्म-जन्म में आपके चरणारबिंदो की भक्त रही है और रहेगी। उसे सोते और जागते समय भी अपने स्वामी महादेव के अलावा दूसरे किसी वस्तु की सुध नहीं रहती। मृत्युंजय! आपके प्रति भक्ति भाव की बाते सुनते ही यह हर्ष के आंसू बहाती हुई पुलकित हो उठती है और आपकी निंदा सुनकर ऐसा मौन साध लेती है मानो उसको मूर्छा आ गयी हो।

 

 

 

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