Karma Kand / Mudrarakshas Pdf Free

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Karma Kand / Mudrarakshas Pdf Free देने जा रहे हैं। आप नीचे की लिंक से इसे फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

Karma Kand / Mudrarakshas Pdf Free

 

 

 

आप यहां से Karm kand Book In Hindi Free डाउनलोड कर सकते है। 

 

 

मुद्राराक्षस हिंदी Pdf Free Download

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

ज्ञान में स्थिर होकर दिव्य प्रकृति (स्वभाव) को प्राप्त – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – सुनो ! इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी प्रकृति (स्वभाव) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थिर हो जाने पर वह न तो शृष्टि के समय उत्पन्न होता है न प्रलय के समय विचलित होता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सामान्यतया हम इस संसार में जो भी ज्ञान प्राप्त करते है वह प्रकृति के तीन गुणों द्वारा दूषित रहता है। जो ज्ञान इन गुणों से दूषित नहीं होता है वही दिव्य ज्ञान कहलाता है।

 

 

 

 

पूर्ण दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद मनुष्य भगवान से गुणात्मक समता प्राप्त कर लेता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है लेकिन जीवात्मा के रूप में उसका यह स्वरुप समाप्त नहीं होता है।

 

 

 

 

वैदिक ग्रंथो से ज्ञात होता है कि जो मुक्त आत्माए बैकुंठ जगत में पहुँच चुकी है। वह निरंतर परमेश्वर के चरण कमलो के दर्शन करती हुई उनकी दिव्य प्रेमा भक्ति में लगी रहती है। अतः मुक्ति के बाद भी भक्तो का अपना निजी स्वभाव समाप्त नहीं होता है।

 

 

 

 

जिन लोगो को चिन्मय आकाश का ज्ञान नहीं है। वह मानते है कि भौतिक स्वरुप के कार्य कलापो से मुक्त होने के बाद भी वह आध्यात्मिक पहचान बिना किसी विविधता के निराकार हो जाती है।

 

 

 

 

लेकिन वास्तव में होता यह है कि आध्यात्मिक जगत (चिन्मय आकाश) में मनुष्य को आध्यात्मिक रूप प्राप्त हो जाता है। वहां के सारे कार्य-कलाप आध्यात्मिक होते है और यह आध्यात्मिक स्थिति भक्तिमय जीवन कहलाती है।

 

 

 

 

लेकिन जिस तरह इस संसार में विविधता है उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत में भी है। लेकिन जो लोग इससे परिचित नहीं है वह सोचते है कि आध्यात्मिक जगत इस भौतिक जगत की विविधता से विलग है।

 

 

 

 

यह वातावरण अदूषित होता है और यहां पर व्यक्ति गुणों की दृष्टि से परमेश्वर के समकक्ष होता है। ऐसा ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनुष्य को समस्त आध्यात्मिक गुण उत्पन्न होते है और जो व्यक्ति इस प्रकार से आध्यात्मिक गुण उत्पन्न कर लेता है वह इस भौतिक जगत के शृजन या विनाश से प्रभावित नहीं होता है।

 

 

 

 

 

 

 

Leave a Comment