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Karm Kand Book In Hindi Free / कर्मकांड बुक इन हिंदी फ्री Pdf

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मित्रों इस पोस्ट में Karm kand Book In Hindi Free दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से Karm kand Book In Hindi Free Download कर सकते हैं।

 

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Karm kand Book In Hindi Free / कर्मकांड बुक इन हिंदी फ्री 

 

 

 

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Karm Kand Book In Hindi Free
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अगर हम अन्य सम्प्रदाय के कर्म कांड को देखे और उनका विश्लेषण करे तो ज्ञात होगा कि हिन्दू धर्म के कर्म कांड की अपेक्षा अन्य धर्म के कर्म कांड में वैसी अनास्था नहीं है जैसी अनास्था हिन्दू धर्म के कर्म कांड में व्याप्त है।

 

 

 

हिन्दू धर्म में उदार और खुली परंपरा विद्यमान है जबकि अन्य सम्प्रदाय में उदार और खुली छूट का अभाव है और संकीर्ण विचारो का बाहुल्य है। हिन्दू धर्म में कर्म कांडो की भ्रांतिया दूर करने और हिन्दू धर्म के प्रति श्रद्धा भाव जगाने और विकसित करने का इस पुस्तक में प्रयास किया गया है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

इन्द्रिय वेग या क्रोध वेग को रोकना – श्री कृष्ण कहते है – कोई भी मनुष्य इस शरीर को त्यागने से पूर्व इन्द्रियों के वेग को सहन करने तथा इच्छा एवं क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होता है तो ऐसा व्यक्ति इस संसार में सुखी रह सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि कोई व्यक्ति आत्म साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होना चाहता है तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेग को रोकने का अवश्य प्रयास करना चाहिए। इन वेग की निम्न श्रेणियाँ है – वाणी वेग, क्रोध वेग, मनोवेग, उदर वेग, जिह्वा वेग तथा उपस्थ वेग।

 

 

 

भौतिक इच्छाए पूर्ण न होने पर क्रोध का वेग बढ़ जाता है और इस प्रकार मन, नेत्र तथा वक्ष स्थल उत्तेजित हो जाते है ,जो व्यक्ति इन इन्द्रियों के वेग को रोककर मन को अपने वश में कर लेता है वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है। ऐसे गोस्वामी नितांत संयमित जीवन बिताते है और इन्द्रिय जनित वेग का तिरस्कार करते है।

 

 

 

अतः मनुष्य को शरीर का परित्याग करने से पूर्व मनुष्य को इन्हे वश में करने का अभ्यास करना चाहिए। जो ऐसा करने में समर्थ होता है वह सिद्ध माना जाता है और आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में वह सुखी रहता है। योगी का यह कर्तव्य है कि वह इच्छा तथा क्रोध पर नियंत्रण रखने का भरसक प्रयास करे।

 

 

 

 

24- अंतर्मुखी (योगी) – श्री कृष्ण कहते है – जो व्यक्ति या फिर योगी अन्तःकरण में सुख का अनुभव करता है और जो कर्मठ है और अन्तःकरण में ही रमण करता है तथा जिसका लक्ष्य अंतर्मुखी होता है। वह मनुष्य पूर्ण योगी है। वह परब्रह्म में मुक्ति पाता है और अंततोगत्वा परब्रह्म को ही प्राप्त होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जब तक मनुष्य अपने अंतःकरण में सुख का अनुभव नही करता है तब तक भला बाह्य सुख प्राप्त कराने वाली बाह्य क्रियाओ से वह किस प्रकार छूट सकता है ?

 

 

 

मुक्त पुरुष कभी बाह्य सुख की (भौतिक) कामना नहीं करता है। यह अवस्था ब्रह्मभूत अवस्था कहलाती है, जिसे प्राप्त करने पर भगवद्धाम जाना निश्चित है। ऐसा मुक्त पुरुष वास्तविक अनुभव द्वारा सुख भोगता है अतः वह किसी भी स्थान में मौन भाव से बैठकर अपने अंतःकरण में जीवन के कार्य कलापो का आनंद लेता है।

 

 

 

 

 

25- ब्रह्म निर्वाण (मुक्ति) की प्राप्ति – जो लोग संसय से उत्पन्न होने वाले द्वैत से परे है, जिनके मन आत्मसाक्षात्कार में रत है, जो समस्त जीव के कल्याण कार्य करने में सदैव व्यस्त रहते है और जो समस्त पापो से रहित  है, वह ब्रह्म निर्वाण (मुक्ति) को प्राप्त होते है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो व्यक्ति मानव समाज का भौतिक कल्याण करने में ही व्यस्त रहता है। वह वास्तव में किसी की भी सहायता नहीं कर सकता है। शरीर तथा मन की क्षणिक ख़ुशी संतोष जनक नहीं होती है। कठिनाइयों का वास्तविक कारण जीवन संघर्ष में परमेश्वर से अपने संबंध की विस्मृति में ढूंढा जाना चाहिए। जब कृष्ण के साथ अपने संबंध के प्रति पूर्णतया सचेष्ट रहता है तब वह वास्तव में मुक्तात्मा होता है भले ही वह भौतिक शरीर के जाल में आबद्ध हो।

 

 

 

 

केवल वही व्यक्ति सभी जीव के कल्याण कार्य में रत कहा जाएगा जो पूर्णतया कृष्ण भावना भावित हो। जब व्यक्ति को यह वास्तविक ज्ञान हो जाता है कि कृष्ण ही सभी वस्तुओ के उद्गम है तब वह जो भी कर्म करता है सभी के हित को ध्यान में रखकर करता है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति के हृदय में कृष्ण की सर्वोच्चता पर बिलकुल संदेह नहीं रहता है। वह इसलिए संदेह नहीं करता क्योंकि वह समस्त पापो से रहित होता है।

 

 

 

परम् भोक्ता परम् नियंता तथा परम् सखा कृष्ण को भूल जाना मानवता के क्लेशो का कारण है। कोई भी मनुष्य ऐसे श्रेष्ठ कार्यो में तब तक नहीं लग पाता है जब तक वह स्वयं मुक्त न हो जाय। कृष्ण भावनामृत के कार्य करना सर्वोच्च होता है। ऐसा है यह दैवीय प्रेम।

 

 

 

 

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