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Kamayani in Hindi PDF Free Download / कामायनी बुक्स हिंदी फ्री डाउनलोड

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Kamayani in Hindi PDF Free मित्रों इस पोस्ट में Kamayani Book के बारे में बताया गया है।  आप Kamayani PDF यहां से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

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Kamayani in Hindi PDF Free  कामायनी बुक्स हिंदी फ्री डाउनलोड

 

 

 

 

 

 

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Kamayani in Hindi PDF Free Download
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हिंदी के साहित्य श्रृजन में “जयशंकर प्रसाद” का नाम को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। “जयशंकर प्रसाद” हिंदी साहित्य जगत में अपने ‘महाकाव्य’ ‘कामायनी’ के द्वारा अवलोकित हुए है। इनका यह ‘महाकाव्य कामायनी’ एक जाज्वल्य मान कृति है।

 

 

 

 

 

यह रचना सर्वोच्चता के साथ-साथ हिन्दी का प्रतिनिधित्व करने वाला ‘महाकाव्य’ है। ‘प्रसाद’ जी की इस अंतिम काव्य रचना का प्रकाशन 1936 में हो गया था। इसमें मानव जीवन के आदि से और मानव के वर्तमान जीवन के मनोवैज्ञानिक और संस्कृत इतिहास की झलक मिलती है।

 

 

 

 

 

इस ‘महाकाव्य का श्रृजन’ चिंता से प्रारंभ होकर आनंद तक 15 सर्गो में वर्णित है। इसमें ‘प्रत्यभिज्ञा’ दर्शन के साथ ही अरविन्द दर्शन और गांधी वादी दर्शन का भी समावेश है।

 

 

 

 

 

कामायनी कला की दृष्टि से सर्वोत्तम कृति है। इसमें सौंदर्य, लज्जा, श्रद्धा का मानव रूप अवतरण हिंदी साहित्य की विशेष व अनमोल निधि है। रचनाकार ने इस कथानक के पात्र का प्रादुर्भाव अपनी लेखनी से अविस्मरणीय बनाकर भव्यता प्रदान की है।

 

 

 

कर्म योग सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

भक्तिमय कर्म की श्रेष्ठता – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है – मुक्ति के लिए कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय कर्म (कर्मयोग) दोनों ही उत्तम श्रेणी है। किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्ति युक्त कर्म अति उत्तम श्रेणी का है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सकाम कर्म (इन्द्रिय तृप्ति में लगना) ही भव बंधन का कारण है। मनुष्य अपने शारीरिक सुख का स्तर जब तक बढ़ाने के उद्देश्य से कर्म में रत होता रहता है तब तक उसे विभिन्न शरीर में देहांतरण करते हुए भवबंधन से मुक्ति कदापि नहीं प्राप्त होती है। इसकी पुष्टि भागवत (5. 5. 4. 6) में इस प्रकार हुई है।

 

 

 

“लोग इन्द्रिय तृप्ति के पीछे मत्त है। वह लोग यह नहीं जानते कि उनका विभिन्न क्लेशो से युक्त यह शरीर उनके विगत सकाम कर्मो का ही फल है। यद्यपि यह शरीर नाशवान है तो भी यह नाना प्रकार के कष्टों का कारण है और जब तक मनुष्य अपने स्वरुप को नहीं जान लेता तब तक उसे सकाम कर्म करना ही पड़ता है।”

 

 

 

अतः इन्द्रिय तृप्ति के हेतु कर्म करना नहीं चाहिए और यह श्रेयस्कर भी नहीं है। जब तक मनुष्य अपने असली स्वरुप के विषय में जिज्ञासा नहीं करता अर्थात खुद को जानने का प्रयास नहीं करता है तब तक उसका जीवन व्यर्थ ही रहता है और जब तक इन्द्रिय तृप्ति की इस चेतन अवस्था में उलझा रहता है तब तक उसका देहांतरण अवश्य ही होता रहेगा। भले ही उसका मन सकाम कर्मो में व्यस्त रहे और अज्ञान द्वारा प्रभावित हो किन्तु उसे वासुदेव के प्रति प्रेम उत्पन्न करना ही चाहिए केवल तभी उसे भवबंधन से मुक्त होने का अवसर प्राप्त हो सकता है।

 

 

 

 

अतः यह ज्ञान ही (कि वह आत्मा है शरीर नहीं) मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। जीवात्मा के स्तर पर कर्म मनुष्य को करना होगा अन्यथा भव बंधन से उबरने का अन्य कोई उपाय नहीं है। परन्तु कृष्ण भावना भावित कर्म तो कर्ता को स्वतः ही सकाम कर्म के फल से मुक्त बनाता है। जिसके कारण से उसे भौतिक स्तर तक उतरना ही नहीं पड़ता है।

 

 

 

किन्तु कृष्ण भावना भावित होकर कर्म करना सकाम कर्म नहीं है। पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर किए गए कर्म से वास्तविक ज्ञान बढ़ता है। बिना कृष्ण भावनामृत के केवल कर्मो के परित्याग से बद्ध जीव का हृदय शुद्ध नहीं होता है और जब तक हृदय शुद्ध नहीं होगा तब तक सकाम कर्म करना ही पड़ेगा।

 

 

 

अतः कृष्ण भावनामृत कर्म सन्यास सदैव ही श्रेष्ठ होता है क्योंकि सन्यास में नीचे गिरने की संभावना बनी रहती है। कृष्ण भावनामृत से रहित सन्यास अपूर्ण रहता है। जैसा कि श्रील रूप गोस्वामी ने भक्तिरसामृत सिंधु में (1. 2. 258) पुष्टि की है।

 

 

 

“जब मुक्ति कामी व्यक्ति श्री भगवान से संबंधित वस्तुओ को भौतिक समझकर उनका परित्याग कर देते है तो उनका सन्यास अपूर्ण कहलाता है।” सन्यास को पूर्ण तभी माना जाता है जब यह ज्ञात हो कि संसार की सभी वस्तु भगवान की है और कोई भी किसी वस्तु का स्वामित्व ग्रहण नहीं कर सकता है।

 

 

 

तो फिर सन्यास का प्रश्न ही कहा उठता है ? जो व्यक्ति यह समझता है कि सारी संपत्ति कृष्ण की है तो वह नित्य ही सन्यासी है। प्रत्येक वस्तु कृष्ण की है तो उसका उपयोग कृष्ण के निमित्त ही करना चाहिए। वस्तुतः यह समझने का प्रयास अवश्य करना चाहिए कि उसका अपना कुछ भी नहीं है। कृष्ण भावना भावित होकर इस प्रकार का पूर्ण कार्य करना, मायावादी सन्यासी के कृतिम वैराग्य से कही उत्तम है।

 

 

 

 

 

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