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Kamal Netra Stotra Pdf Hindi / कमल नेत्र स्तोत्र Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Kamal Netra Stotra Pdf Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Kamal Netra Stotra Pdf Hindi Download कर सकते हैं और आप यहां से Laghu Siddhant Kaumudi Pdf कर सकते हैं।

 

 

 

 

Kamal Netra Stotra Pdf Hindi Download

 

 

 

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

इन सबमे ब्रह्म बुद्धि करके इनकी एकता का निश्चय करे और वह ब्रह्म मैं हूँ ऐसी भावनापूर्वक प्रत्येक श्वास के साथ सोअहं का जप करे। उन्ही विद्येश्वर आदि की ब्रह्मरंध्र आदि में तथा इस शरीर से बाहर की भावना करे। प्रकृति के विकारभूत महत्तत्त्व से लेकर पंचभूत पर्यन्त तत्वों से बना हुआ जो शरीर है।

 

 

 

 

ऐसे सहस्रो शरीरो का एक-एक अजपा गायत्री के जप से एक-एक के क्रम से अतिक्रमण करके जीवो को धीरे-धीरे परमात्मा से संयुक्त करे। यह जप का तत्व बताया गया है। सौ अथवा अट्ठाईस मंत्रो के जप से उतने ही शरीरो का अतिक्रमण होता है। इस प्रकार जो मंत्रो का जप है इसी को अतिक्रमण से वास्तविक जप जानना चाहिए।

 

 

 

 

सौ बार किया हुआ जप इंद्र पद की प्राप्ति कराने वाला माना गया है। ब्राह्मणेतर पुरुष आत्मरक्षा के लिए जो स्वल्प मात्रा में जप करता है वह ब्राह्मण के कुल में जन्म लेता है। हर रोज सूर्योपस्थान करके उपर्युक्त रूप से जप का अनुष्ठान करना चाहिए।

 

 

 

 

बारह लाख गायत्री का जप करने वाला पुरुष पूर्ण रूप से ब्राह्मण कहा गया है। जिस ब्राह्मण ने एक लाख गायत्री का भी जप न किया हो उसे वैदृक कार्य में न लगाए। सत्तर वर्ष की अवस्था तक नियम पालन पूर्वक कार्य करे। इसके बाद घर त्याग कर सन्यास ले ले।

 

 

 

 

परिवाजक यया सन्यासी पुरुष रोज प्रातःकाल बारह हजार प्रणव का जप करे। यदि एक दिन इस नियम का उल्लंघन हो जाय तो दूसरे दिन उसके बदले में उतना मंत्र और अधिक जपना चाहिए और हमेशा इस प्रकार के जप को चलाने का प्रयत्न करना चाहिए।

 

 

 

 

अगर क्रमशः एक मास आदि काल का उल्लंघन हो गया तो डेढ़ लाख जप करके उसका प्रायश्चित करना चाहिए। इससे अधिक समय तक नियम का उल्लंघन हो जाय तो पुनः नए सिरे से गुरु से नियम ग्रहण करे। ऐसा करने से दोषो की शांति होती है। अन्यथा यह रौख नरक में जाता है।

 

 

 

 

जो सकाम भावना से युक्त गृहस्थ ब्राह्मण है उसी को अर्थ तथा धर्म के लिए यत्न करना चाहिए। मुमुक्ष ब्राह्मण को तो हमेशा ज्ञान का ही अभ्यास करना चाहिए। धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, अर्थ से भोग सुलभ होता है। फिर उस भोग से वैराग्य की संभावना होती है।

 

 

 

 

धर्म पूर्वक उपार्जित धन से जो भोग प्राप्त होता है उससे एक दिन अवश्य वैराग्य का उदय होता है। धर्म के विपरीत अधर्म से उपार्जित हुए धन के द्वारा जो भोग प्राप्त होता है उससे भोगो के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। मनुष्य धर्म से धन पाता है। तपस्या से उसे दिव्य रूप की प्राप्ति होती है।

 

 

 

 

कामनाओ का त्याग करने वाले पुरुष के अन्तः करण की शुद्धि होती है। उस शुद्धि से ज्ञान का उदय होता है इसमें संशय नहीं है। सत्य युग आदि में तप को ही प्रशस्त कहा गया है किन्तु कलियुग में द्रव्य साध्य धर्म अच्छा माना गया है। सत्य युग में ध्यान से द्वापर में यज्ञ करने से ज्ञान की सिद्धि होती है।

 

 

 

 

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