Kalika Puran Hindi Pdf Free / श्री कालिका पुराण हिंदी पीडीएफ फ्री

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Kalika Puran Hindi Pdf Free श्री कालिका पुराण हिंदी पीडीएफ

 

 

 

 

 

कालिका पुराण पीडीएफ फ्री डाउनलोड करें।

 

 

 

कालिका पुराण में मां काली का वर्णन है। मां काली सच्चे मन से, निष्ठापूर्वक भक्ति करने वाले अपने भक्तो पर सदैव अपनी कृपा दृष्टि बनाई रखती है। मां के भक्तो को कभी कोई कष्ट नहीं होता है। कहा जाता है कि कलयुग के तीन जागृत देव है हनुमान जी, कालिका मां, भैरव।

 

 

 

मां काली की उपासना से घर में सुख शांति रहती है, धन में वृद्धि होती है, जीवन खुशियों से भरा रहता है। मां काली को हिन्दू धर्म की सबसे जागृत देवी कहा जाता है। मां काली को माता दुर्गा की 10 महाविद्याओ में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि अगर मां काली के दरबार में कोई मन्नत मांगे तो उसे जरूर पूरा करे, मां काली के दरबार में यदि दान मिलता है, अभय मिलता है, समृद्धि मिलती है तो दंड भी मिलता है।

 

 

 

 

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गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

अग्नि, शस्त्र, वायु तथा वर्षा से भी क्षति नहीं (आत्मा की) – श्री कृष्ण कहते है – यह आत्मा न तो कभी किसी शस्त्र द्वारा खंड-खंड किया जा सकता है, न अग्नि द्वारा जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगाया जा सकता है या वायु द्वारा सुखाया भी नहीं जा सकता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – सारे अस्त्र, आग्नेयास्त्र, वर्षा के अस्त्र, चक्रवात आदि के द्वारा भी आत्मा को मारना असंभव है या आत्मा किसी भी प्रकार से क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता है। अधुनिय युग में हथियारों (नाभिकीय) की तुलना भी आग्नेयास्त्रों से की जाती है। किन्तु पूर्वकाल में विभिन्न पार्थिव तत्वों के बने हथियार होते थे ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक आग्नेयास्त्रों के अतिरिक्त मिट्टी, जल, वायु, आकाश के भी अनेक प्रकार के हथियार होते थे। आग्नेयास्त्रों का सामना जल (वरुण) के हथियारों से किया जाता था जो आज भी इस आधुनिक विज्ञान के लिए अज्ञात है। जो भी हो आत्मा कभी भी खंड-खंड नहीं किया जा सकता है। आज भी आधुनिक विज्ञान चक्रवात के हथियार का पता लगाने में समर्थ नहीं हो पाए है। चाहे कितने भी घातक हथियार हो किसी भी प्रकार से एटीएम अक विखंडन असंभव है। चाहे इन घातक हथियारों की संख्या कितनी भी हो तो भी यह हथियार या कि घातक शस्त्र आत्मा आत्मा का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते है।

 

 

 

 

 

चूंकि वह सनातन अणु आत्मा है अतः माया द्वारा आवृत्त होने की उनकी प्रवृत्ति स्वाभाविक ही होती है। इस तरह से वह भगवान की संगति से पृथक हो जाते है जिस प्रकार से अग्नि के स्फुलिंग अग्नि से विलग होते ही बुझ जाते है। मायावादी इसकी व्याख्या नहीं कर सकते कि जीव किस प्रकार अपने अज्ञान के कारण उत्पन्न हुआ और तत्पश्चात माया की शक्ति से आवृत्त हो गया। न ही आदि परमात्मा से जीवो को विलग कर पाना संभव था प्रत्युत सारे जीव परमात्मा से विलग हुए अंश है।

 

 

 

 

वाराह पुराण में जीवो को परमात्मा का भिन्न अंश कहा गया है। भगवद्गीता के अनुसार भी वह शाश्वत रूप से ऐसे ही है। अतः मोह से युक्त होकर भी जीव अपना पृथक अस्तित्व रखता है। जैसा कि कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशो से स्पष्ट होता है। अर्जुन कृष्ण के उपदेश के कारण मुक्त तो हो गया किन्तु कभी भी कृष्ण से एकाकार नहीं हुआ।

 

 

 

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