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Kalidas Books Pdf Hindi / Ramcharit Manas Pdf / Krishna Story Pdf

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Kalidas Books Pdf Hindi
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Shri Krishna Story In Hindi Pdf Free
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सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

विचरणशील इन्द्रिया-बुद्धि हरण का कारण –  श्री कृष्ण कहते है – जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को प्रचंड वायु दूर ले जाती है उसी प्रकार विचरणशील इन्द्रियो में से कोई एक जिस पर मन निरंतर लगा रहता है मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यदि समस्त इन्द्रिया भगवान की सेवा में  रहे (जैसा कि महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है) इनमे से एक भी अपनी तृप्ति में लगी रहती है तो भक्त को दिव्य प्रगति पथ से विपथ कर सकती है। अतः समस्त इन्द्रियों को कृष्ण भावनामृत में लगा रहना ही चाहिए क्योंकि मन को वश में करने की यही सही सरलतम विधि है।

 

 

 

 

68- विषयो से विरत इन्द्रिया-स्थिर बुद्धि – श्री कृष्ण कहते है – अतः हे महाबाहु ! जिस पुरुष की इन्द्रिया अपने-अपने विषयो से सब प्रकार से विरत होकर उसके वश में है उसी की बुद्धि निःसंदेह स्थिर है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावनामृत के द्वारा या सारी इन्द्रियों को भगवान की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगाकर इन्द्रिय तृप्ति की बलवती शक्तियों को दमित किया जा सकता है। जो व्यक्ति यह हृदयंगम कर लेता है कि कृष्ण भावनामृत के द्वारा बुद्धि स्थिर होती है और इस कला का अभ्यास प्रामाणिक गुरु के पथ-प्रदर्शन में करता है। वह साधक अथवा मोक्ष का अधिकारी कहलाता है। जिस प्रकार शत्रुओ का दमन श्रेष्ठ सेना द्वारा किया जाता है उसी प्रकार इन्द्रियो का दमन किसी मानवीय प्रयासों के द्वारा नहीं, अपितु उन्हें भगवान की सेवा में लगाए रखकर किया जा सकता है।

 

 

 

 

 

69- आत्मसंयमी के जागने का समय-जीवो के लिए रात्रि – श्री कृष्ण कहते है जो सब जीवो के लिए रात्रि का समय होता है, वह आत्मसंयमी के लिए जागने का समय होता है। जब सब जीवो के जागने का समय होता है वह आत्म-निरीक्षक के लिए रात्रि होती है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – विचारवान पुरुषो या आत्मनिरिक्षक मुनि के कार्य भौतिकता में लीन पुरुषो के लिए रात्रि के समान है, भौतिकतावादी व्यक्ति ऐसी रात्रि में अनभिज्ञता के कारण आत्म साक्षातकार के प्रति सोए रहते है। आत्म निरीक्षक मुनि भौतिकतावादी पुरुषो की रात्रि में जागे रहते है।

 

 

 

 

बुद्धिमान मनुष्यो की दो श्रेणियाँ होती है। एक श्रेणी के मनुष्य इन्द्रिय तृप्ति के लिए भौतिक कार्य करने में निपुण होते है और दूसरी श्रेणी के मनुष्य आत्म निरीक्षक होते है जो आत्म साक्षातकार के अनुशीलन के लिए ही जागते है

 

 

 

 

मुनि को आध्यात्मिक अनुशीलन की क्रमिक उन्नति में दिव्य आनंद का अनुभव होता है किन्तु भौतिकतावादी कार्यो में लगा हुआ व्यक्ति आत्म-साक्षातकार के प्रति सोया रहकर अनेक प्रकार के इन्द्रिय सुखो का स्वप्न देखता रहता है और उसी सुप्तावस्था में कभी सुख तो कभी दुख का अनुभव करता है। आत्मनिरिक्षक मनुष्य भौतिक सुख तथा दुख के प्रति अन्यमनस्क रहता है। वह भौतिक कार्यो से अविचलित रहकर आत्म-साक्षातकार कार्यो में लगा रहता है।

 

 

 

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