Kalidas Book in Hindi Free Pdf Download / अभिज्ञान शाकुंतलम Pdf Free

मित्रों इस पोस्ट में  Kalidas Book in Hindi Free दी जा रही है। आप नीचे की लिंक से कालिदास बुक्स इन हिंदी पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

Kalidas Book in Hindi Free Pdf कालिदास बुक्स इन हिंदी पीडीएफ 

 

 

1- कुमारसम्भवम पीडीएफ 

 

2- रघुवंश महाकाव्य 

 

3- अभिज्ञानशाकुंतलम पीडीएफ फ्री 

 

4- श्रृंगार तिलक 

 

5- कालीदास और उनकी कविता 

 

6- रघुवंशम Pdf 

 

7- Kalidas Meghdoot Book in Hindi

 

 

 

 

 

 

 

कालीदास के बारे में 

 

 

 

महाकवि कालीदास से प्रायः सभी लोग परिचित है। इस मूर्धन्य कवि को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। इनकी ख्याति इनकी अमर रचना ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ से ही बुलंदियों को छूने लगी थी।

 

 

 

कालीदास की सभी कृतियाँ संस्कृत भाषा में लिखी गई है। उन्होंने दर्शन और पौराणिक कथाओ के आधार पर ही अनेक रचनाए लिखी थी। कालीदास कृत ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ को ही सबसे पहले यूरोपीय भाषा में अनुवादित किया गया था।

 

 

 

कालीदास द्वारा मूर्तरूप प्राप्त ‘मेघदूतम’ भी अपनी विलक्षण पहचान रखता है। जिसमे कवि कल्पना और अभिव्यंजना शक्ति प्रखरता के शिखर पर विराजमान है। कालीदास की रचनाओं में अलंकार बहुतायत प्राप्त होते है लेकिन इन्हे सरल और मधुर भाषा के लिए जाना जाता है।

 

 

 

इनके द्वारा प्राकृतिक वर्णन अद्वितीय और मनोहर है और यह अपनी उपमाओ के लिए विशेष पहचान रखते है। उनकी कृतियों में श्रृंगार रस की प्रधानता के साथ ही परंपराओं और मूल्यों का ध्यान रखा जाता है। बाणभट्ट कवि ने कालीदास की रचनाओं में उनकी सूक्तियों की प्रशंसा की है।

 

 

 

अभिज्ञान शाकुंतलम Pdf Free

 

 

 

Kalidas Book in Hindi Free
Kalidas Book in Hindi Free

 

 

अभिज्ञान शाकुंतलम महाकवि कालीदास जी द्वारा रचित एक महान नाटक है। इस समय Abhigyan Shakuntalam का अनुवाद लगभग सभी विदेशी भाषाओ में हो चुका है। अभिज्ञान शाकुंतलम में राजा दुष्यंत और शकुंतला के प्रणय, विरह, प्रत्याख्यान और पुनर्मिलन को बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है।

 

 

 

यह महाभारत की कहानी से थोड़ी भिन्न है। इसमें कालीदास जी ने कुछ नाटक जोड़कर इसे और सुंदर बनाया है। महाभारत में आकाशवाणी से दुष्यंत को बोध होता है जबकि इसमें मुद्रिका से बोध कराया गया है। अभिज्ञान शाकुंतलम एक अनोखी कहानी है जो अपने आप में बहुत ही रोचक है। इसे पढ़ने पर एक सचित्र अनुभव होता है।

 

 

 

 

Abhigyan Shakuntalam Mahakavi Kalidas Ji Dwara Rachit Ek Mahan Natak Hai . Is Samay Abhigyan Shakuntalam Ka Anuwad Lagabhag Sabhi Videshi Bhashao Me Ho Chuka Hai . Abhigyan Shakuntalam Me Raja Dushyant Aur Shakuntala Ke Pranay, Virah, Prtyakhyan Aur Punarmilan Ko Bahut Hi Sundar Dhang Se Piroya Gaya Hai .

 

 

 

Yah Mahabharat Ki Kahani Se Thodi Bhinn Hai . Isame Kalidas Ji Ne Kuchch Natak Jodakar Ise Aur Sundar Banaya Hai . Mahabharat Me Akashawani Se Dushyant Ko Bodh Hota Hai Jabaki Isame Mudrika Se Bodh Karaya Jata Hai . Abhigyan Shakuntalam Ek Anokhi Kahani Hai Jo Apane Aap Me Bahut Hi Rochak Hai . Ise Padhane Par Ek Sachitra Anubhaw Hota Hai .

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

 

श्री कृष्ण कहते है – हे अर्जुन ! जय अथवा पराजय की समस्त आसक्ति को त्यागकर समभाव से अपना कर्म करो। ऐसी समता ही योग कहलाती है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण अर्जुन से कहते है कि वह योग में स्थित होकर कर्म करे और योग है क्या ? योग का अर्थ है सदैव चंचल रहने वाली इन्द्रियों को वश में रखते हुए परम तत्व में मन को एकाग्र करना और परमतत्व कौन है ? भगवान ही परमतत्व है और चूंकि वह स्वयं ही अर्जुन को युद्ध करने के लिए कह रहे है। अतः अर्जुन को युद्ध के फल से कोई सरोकार नहीं है।

 

 

 

अर्जुन क्षत्रिय है अतः वह वर्णाश्रम धर्म का अनुयायी है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि वर्णाश्रम धर्म का एक मात्र उद्देश्य विष्णु को प्रसन्न करना है।

 

 

 

 

सांसारिक नियम है कि लोग पहले अपनी तुष्टि करते है किन्तु यहां तो अपने को तुष्ट न करके कृष्ण को तुष्ट करना है। अतः कृष्ण को तुष्ट किए बिना कोई वर्णाश्रम धर्म का पालन भी नहीं कर सकता है। यहां परोक्ष रूप से अर्जुन को कृष्ण द्वारा बताई गई विधि के अनुसार कर्म करने का आदेश है।

 

 

 

जय तथा पराजय कृष्ण के लिए ही विचारणीय है। अर्जुन के लिए तो केवल श्री कृष्ण के निर्देशानुसार ही कर्म करना है। कृष्ण के निर्देश का पालन ही वास्तविक योग है और इसका अभ्यास कृष्ण भावनामृत नामक विधि द्वारा ही किया जाता है।

 

 

 

 

एकमात्र कृष्ण भावनामृत के माध्यम से ही स्वामित्व भाव का परित्याग किया जा सकता है। इसके लिए कृष्ण का दास या उनके दासो का दास बनना होता है। कृष्ण भावनामृत में कर्म करने की यही एक विधि है जिससे योग में स्थिर होकर कर्म किया जा सकता है।

 

 

 

 

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