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Jyotish Books Pdf Hindi Free Download / ज्योतिष बुक्स पीडीएफ फ्री

मित्रों इस पोस्ट में Jyotish Books Pdf Hindi दी जा रही है। आप नीचे की लिंक से ज्योतिष बुक्स पीडीएफ फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।

 

 

 

Jyotish Books Pdf Hindi Free ज्योतिष बुक्स पीडीएफ फ्री

 

 

 

 

 

 

1- Jyotish Shastra Pdf

 

2-Samudra Shastra Pdf in Hindi

 

3-नक्षत्र फल दर्पण Pdf

 

4- सिद्धांत ज्योतिष Pdf

 

5- नंदी नाड़ी ज्योतिष Pdf

 

6- नक्षत्र ज्योतिष Pdf

 

7- अंक ज्योतिष Pdf

 

8- समुद्र शास्त्र Pdf Download

 

9- Jyotish Gyan in Hindi Pdf

 

 

Jyotish Shastra Pdf

 

 

 

भारत में ज्योतिष शास्त्र का इतिहास बहुत पुराना है। तमाम ऋषि मुनि ने इस विज्ञान (ज्योतिष विज्ञान) को और आगे बढ़ाया है। ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से आप आने वाले समय के बारे में जान सकते है।

 

 

 

कौन सी समस्याए जीवन में आने वाली है या फिर कौन से लाभ आपके जीवन में आने वाली और कौन सा ग्रह आपके जीवन में क्या प्रभाव डाल रहे है। यह सब कुछ ज्योतिष के माध्यम से जाना जा सकता है।

 

 

 

 

Jyotish Books Pdf Hindi Free
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सिद्धांत ज्योतिष Pdf 

 

 

प्राचीन समय में ऋषि-मुनियो, विद्वानों ने खगोलीय गणनाओ का अध्ययन किया। सूर्य की दृश्य कक्षा के 27 भाग करके उनका नाम भारिणी, अश्विनी और उसी के 30-30 अंशो के दस भाग करके उनका राशि नाम मेष आदि रखा और इसी तरह से मंगल बुध आदि ग्रहो का अध्ययन किया और इसी तरह से सिद्धांत ज्योतिष की शुरुआत हुई।

 

 

 

नंदी नाड़ी ज्योतिष Pdf नाड़ी ज्योतिष Pdf Free Download

 

 

 

भगवान शंकर के वाहन नंदी द्वारा इस ज्योतिष विद्या का निर्माण हुआ है। यह विद्या दक्षिण भारत में अधिक लोकप्रिय है। नंदी नाड़ी ज्योतिष के माध्यम से वे लोग भी अपना भविष्यफल आसानी से जान पाते है। जिन्हे अपनी जन्मतिथि और जन्म का समय ज्ञात नहीं होता है।

 

 

 

जब आप ज्योतिषशास्त्री के पास भविष्यफल के लिए जाते है तब ज्योतिषी पुरुषो दाए और महिलाओ को बाए हाथ के अंगूठो का निशान लेते है और फिर ताड़पत्र आपके समक्ष रखकर नाम का पहला अंतिम शब्द पूछा जाता है।

 

 

 

उसके बाद आपके नाम से जिस-जिस ताड़पत्र का मिलाप होता है उसी के माध्यम से कुछ और प्रश्न तथा माता-पिता या फिर पत्नी के नाम का मिलाप कराया जाता है। उसके हिसाब से ज्योतिषी भविष्यफल बताते है।

 

 

 

नक्षत्र ज्योतिष Pdf

 

 

हर कोई अपने भविष्य के बारे में जानना चाहता है और उस हिसाब से कार्य करता है। अगर आपको कुछ और कार्य करने है और आप दूसरा कार्य करेंगे तो आप सफल नहीं हो पायेंगे। इसीलिए हर कोई अपने भविष्य के बारे में जानना चाहता है।

 

 

 

ज्योतिष भी कई तरह की विद्याए है जैसे – नंदी नाड़ी, ज्योतिष, हस्तरेखा, समुद्र शास्त्र आदि और उसी तरह से नक्षत्र ज्योतिष भी है। नक्षत्र ज्योतिष एक तरह का विज्ञान है और पुराने समय में मात्र यही एक विज्ञान था। ऋषि मुनियो ने इसका ज्ञान प्राप्त कर लिया था। आज भी नामकरण विवाह या अन्य कर्मो में नक्षत्रो के हिसाब से कार्य किये जाते है। नक्षत्र ज्योतिष बहुत ही सटीक होता है।

 

 

 

समुद्र शास्त्र हिंदी Pdf Samudra Shastra Pdf in Hindi

 

 

 

समुद्र शास्त्र या सामुद्रिक शास्त्र एक बेहद ही रहस्य्मयी विद्या है। समुद्र शास्त्र के द्वारा की गई भविष्यवाणी लगभग सटीक होती है। समुद्र शास्त्र शरीर, मुखमंडल की बनावट तिल आदि के माध्यम से चलता है अर्थात समुद्र शास्त्र की भविष्यवाणी शरीर मुखमंडल की बनावट के हिसाब से की जाती है।

 

 

 

समुद्र शास्त्र की शुरुआत लगभग 5000 वर्ष पुर्व भारत में ही हुई थी। समुद्र शास्त्र का उल्लेख महाभारत, वाल्मीकि रामायण और कही-कही जैन धर्म ग्रंथो में भी है। यूनान के दार्शनिक भी भारतीय सामुद्रिक शास्त्र से भली-भांति परिचित थे।

 

 

 

अंक ज्योतिष Pdf

 

 

 

अंक ज्योतिष भी एक तरह का विज्ञान है। इसके माध्यम से किसी भी व्यक्ति के बारे में, उसके भविष्य के बारे में काफी कुछ जाना जा सकता है। अंक ज्योतिष में नौ ग्रहो को आधार बनाकर गणना की जाती है।

 

 

 

अंक ज्योतिष काफी हद तक सटीक रहता है क्योंकि अंको में बदलाव की गुंजाईश नहीं रहती है। अंक ज्योतिष 10000 से भी अधिक समय से पुरानी है। इसकी शुरुआत मिस्र, बेवीलोन और ग्रीस में हुई थी। इसे अंग्रजी में Numerology कहते है।

 

 

 

 

दिव्यज्ञान सिर्फ पढ़ने के लिए 

 

 

शरीर रूपी नगर और उसका स्वामी जीवात्मा – (देहधारी) श्री कृष्ण कहते है – शरीर रूपी नगर का स्वामी देहधारी जीवात्मा न तो कर्म करता है, न तो अन्य लोगो को कर्म करने के लिए प्रेरित ही करता है और न ही कर्मफल की रचना करता है। यह सब तो प्रकृति के गुणों द्वारा ही सम्पन्न होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य– बद्ध वातावरण में रहते हुए मनुष्य अपने आप को (अज्ञानवश) शरीर मानकर शरीर के कर्मफलो का भोग करता है। अनंत काल से उपार्जित यह अज्ञान ही शारीरिक सुख-दुख का कारण है। जैसा कि अग्रलेख में बताया जाएगा, जीव तो परमेश्वर की शक्तियों में से एक है। किन्तु वह भगवान की अपरा प्रकृति है जो पदार्थ से भिन्न है। संयोगवश परा प्रकृति या जीव अनादि काल से प्रकृति (अपरा) के संपर्क में रहता आया है।

 

 

 

 

ज्यों ही जीव शरीर के कार्यो से पृथक हो जाता है त्यों ही वह कर्म बंधन से भी मुक्त हो जाता है। जब तक शरीर रूपी नगर में निवास करता है तब तक वह इसका स्वामी प्रतीत होता है। जिस नाशवान शरीर या भौतिक आवास को वह प्राप्त करता है वह अनेक कर्मो और उसके फलो का कारण है। वह तो इस भवसागर में संघर्ष करता हुआ प्राणी है। संसार सागर की लहरे उसमें हमेशा ही उथल-पुथल मचाती रहती है किन्तु उनपर उसका वश नहीं चलता है। वास्तव में जीव न तो अपने शरीर का स्वामी होता है न तो इसके कर्मो और फलो का नियंता ही, उसके उद्धार का एक मात्र साधन दिव्य कृष्ण भावनामृत है। जिससे जीव संसार रूपी सागर से बाहर आ सकता है। इसके द्वारा समस्त अशांति से उसकी रक्षा हो सकती है।

 

 

 

 

15- आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अलग (परमेश्वर) – श्री कृष्ण कहते है – परमेश्वर न तो किसी के पापो को ग्रहण करता है न पुण्यो को। किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते है जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किए रहता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य– विभु का अर्थ है परमेश्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौंदर्य तथा त्याग से युक्त है। वह सदैव ही आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है। जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्व शक्तिमान भगवान के द्वारा की जाती है। वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता है। अपितु जीव अज्ञान से ग्रस्त होकर जीवन की ऐसी परिस्थिति की कामना करता है जिसके कारण कर्म तथा फल की लम्बी शृंखला आरम्भ हो जाती है।

 

 

 

भगवान परमात्मा रूप में सदैव जीव के संग रहते है। फलतः वह जीव की इच्छाओ को उसी तरह समझते है जिस तरह फूल के समीप रहने वाला फूल की सुगंध को। जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण होता है। उसकी शक्तिया सिमित रहती है अतः वह अज्ञान के वशीभूत हो जाता है। भगवान तो सर्वशक्तिमान है किन्तु जीव नहीं है। भगवान विभु अर्थात सर्वज्ञ है किन्तु जीव अणु है। अतः जब जीव अपनी इच्छाओ से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान उसे अपनी इच्छा पूर्ति करने देते है।

 

 

 

भगवान मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते है। यथा – ‘अपनी सोची होत नहीं, प्रभु सोची तत्काल’ अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओ को पूर्ण करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता है किन्तु भगवान इच्छाओ की पूर्ति कर सकते है। इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बंधन है। अतः मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थिति जन्य शरीर मान बैठता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख भोगता है।

 

 

 

 

भगवान निष्पक्ष होने के कारण स्वतंत्र अणु जीवो की इच्छाओ में व्यवधान नहीं डालते किन्तु जब कोई भी कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान उसकी विशेष चिंता करते है और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते है कि उसकी भगवान को प्राप्त करने की इच्छा पूरी हो जाय और वह सदैव ही सुखी रहे। अतएव वैदिक मंत्र कहते है –“एष उ ध्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्नि नीषते। एष उ एवा साधु कर्म कारयति यमधो निनीषते।” (भगवान जीव को अशुभ कर्मो में इसलिए प्रवृत्त करते है जिससे वह नरकगामी बने। (कौषीतकि उपनिषद 3. 8) 

 

 

 

 

जीव अपने सुख दुख में पूर्णतया आश्रित है। परमेश्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नर्क में जाता है। जिस तरह वायु के द्वारा वायु के द्वारा प्रेरित बादल। अतः देहधारी जीव कृष्ण भावनामृत की अपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है। अज्ञान के कारण ही जीव यह कहता है कि उसके भवबंधन के लिए भगवान ही उत्तरदायी है।

 

 

 

 

फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानंद स्वरुप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति को भूल जाता है और इस प्रकार अविद्या द्वारा बंदी बना लिया जाता है। भगवान की निष्पक्षता की पुष्टि वेदांत सूत्र (2. 1. 34) भी करते है। “भगवान न तो किसी के प्रति घृणा करते है, न किसी को चाहते है, यद्यपि ऊपर से ऐसा ही प्रतीत होता है।”

 

 

 

 

 

16- अविद्या का विनाश (ज्ञान) – श्री कृष्ण कहते है – जब कोई उस ज्ञान से प्रबुद्ध होता है जिससे अविद्या का नाश होता है तो उसके ज्ञान से सब कुछ उसी तरह प्रकट हो जाता है जैसे दिन में सूर्य से सम्पूर्ण वस्तुए प्रकाशमान हो जाती है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – जो लोग कृष्ण को भूल गए है वह निश्चित रूप से मोहग्रस्त है। किन्तु जो कृष्ण भावना भावित है वह मोहग्रस्त नहीं होते है। भगवद्गीता में कहा गया है ज्ञान सदैव ही सम्माननीय होता है।

 

 

 

जीव नाना प्रकार से मोहग्रस्त होता है। उदाहरण – जब वह अपने को ईश्वर मानने लगता है तो वह अविद्या के पास में गिर जाता है। यदि जीव ईश्वर है तो वह अविद्या से मोहग्रस्त कैसे हो सकता है ? क्या ईश्वर अविद्या से मोहग्रस्त होता है ?

 

 

 

 

 

जैसा कि गीता में (7. 19) कहा गया है। अनेकानेक जन्म बीत जाने पर ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके ही मनुष्य कृष्ण की शरण में जाता है। वह ज्ञान क्या है ? श्री कृष्ण के प्रति आत्म समर्पण करने पर ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। जब उसे कृष्ण भावनामृत प्राप्त हो जाता है तो सब कुछ स्वतः ही प्रकट होने लगता है। यथा सूर्योदय होने पर सारी वस्तुए दिखने लगती है।

 

 

 

वास्तविक ज्ञान उसी से प्राप्त हो सकता है जो पूर्ण रूप से कृष्ण भावना भावित है क्या अविद्या या शैतान भगवान से बड़ा है ? कदापि नहीं। अतः ऐसे प्रामाणिक गुरु की खोज आवश्यक होती है और उससे ही सीखना पड़ता है कि कृष्ण भावनामृत क्या है क्योंकि कृष्ण भावनामृत से सारी अविद्या का नाश सम्भव होता है। यथा – सूर्य के प्रकाश से तम दूर हो जाता है।

 

 

 

ईश्वर के प्रतिनिधि से भेट होने पर ही ईश्वर तथा ईश्वर के साथ अपने संबंधो को सही-सही जाना जा सकता है। भले ही किसी भी व्यक्ति को इसका पूरा ज्ञान हो कि वह शरीर नहीं आत्मा है और शरीर से परे है। तो भी हो सकता है कि वह आत्मा तथा परमात्मा में अंतर न कर पाए, ईश्वर का प्रतिनिधि अपने आप को कदापि ईश्वर नहीं कहता है यद्यपि उसका सम्मान ईश्वर की भांति ही किया जाता है। किन्तु पूर्ण प्रामाणिक कृष्ण भावना भावित गुरु की शरण ग्रहण करता है तो वह सब कुछ जान सकता है।

 

 

 

क्योंकि प्रामाणिक गुरु को ईश्वर का ज्ञान होता है। मनुष्य को ईश्वर और जीव के अंतर को समझना होता है। अतएव भगवान कृष्ण ने द्वितीय अध्याय में (2. 12) यह कहा है कि प्रत्येक जीव व्यष्टि है और भगवान भी व्यष्टि है। यह सब भूतकाल में भी व्यष्टि थे, सम्प्रति भी व्यष्टि है और भविष्य में मुक्त होने पर भी व्यष्टि बने रहेंगे। रात्रि के समय अन्धकार में हमे प्रत्येक वस्तु एक ही तरह दिखती है। किन्तु दिन में सूर्य के उदय होने पर सारी वस्तुए अपने-अपने वास्तविक स्वरुप में दिखती है। आध्यात्मिक जीवन में व्यष्टि की पहचान ही वास्तविक ज्ञान है।

 

 

 

 

17- भगवान में स्थिर होना – श्री कृष्ण कहते है – जब मनुष्य बुद्धि, मन, श्रद्धा तथा शरण के साथ (शरणांगत) भगवान में स्थिर हो जाता है तभी वह पूर्ण ज्ञान के द्वारा समस्त कल्मष से शुद्ध होता है और मुक्ति के पथ पर अग्रसर होता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – परम् दिव्य सत्य भगवान कृष्ण ही है। सारी गीता इसी घोषणा पर केंद्रित है कि कृष्ण श्री भगवान है। यही समस्त वेदो का भी अभिमत है। भगवान कहते है – सभी प्रकार से कृष्ण परम् सत्य (परमतत्व) है। कृष्ण निराकार ब्रह्म का भी अनुमोदन करते है।

 

 

 

जिनके मन, बुद्धि, श्रद्धा तथा शरण कृष्ण में है। अर्थात जो पूर्णतया कृष्ण भावना भावित है उसके सारे कल्मष धुल जाते है और उन्हें ब्रह्म संबंधी प्रत्येक वस्तु का पूर्णज्ञान रहता है। परतत्व का अर्थ परम् सत्य है जो भगवान को ब्रह्म परमात्मा तथा भगवान के रूप में जानने वालो द्वारा समझा जाता है। भगवान ही इस परतत्व की पराकाष्ठा है उनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।

 

 

 

कृष्ण भावना भावित व्यक्ति यह भली भांति समझ सकता है कि कृष्ण में द्वैत है (एक साथ एकता तथा भिन्नता) और ऐसे दिव्य ज्ञान से युक्त होकर वह मुक्ति पथ पर सुस्थिर प्रगति कर सकता है।

 

 

 

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