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Best No 1 Jain Darshan Ke Siddhant Pdf Book जैन दर्शन के सिद्धांत Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Jain Darshan Ke Siddhant Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Jain Darshan Ke Siddhant Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  जैन पूजा संग्रह Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Jain Darshan Ke Siddhant Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  जैन दर्शन के सिद्धांत Pdf
भाषा हिंदी 
श्रेणी धार्मिक 
फॉर्मेट Pdf
साइज 44 Mb
पृष्ठ 354 

 

 

 

जैन दर्शन के सिद्धांत Pdf Download

 

जैन पूजा संग्रह पीडीऍफ़ डाउनलोड

 

जैन कथा संग्रह Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

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Jain Darshan Ke Siddhant Pdf
Jain Darshan Ke Siddhant Pdf
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वर्षा बीत गयी, निर्मल शरद ऋतु आ गयी। परन्तु हे तात! सीता की कोई भी खबर नहीं मिली। एक बार कैसे भी पता लग जाय तो काल को भी जीतकर पल भर में जानकी जी को ले आऊं।

 

 

 

 

कही भी रहे यदि जीवित होंगी तो हे तात! यत्न करके मैं उसे अवश्य ही लाऊंगा। राज्य, खजाना, नगर और स्त्री प्राप्त कर लिया इसलिए सुग्रीव ने भी मेरी सुधि भुला दिया।

 

 

 

 

मैने बालि को स्वर्ग पठाया  था कल उस मूढ़ का वही हाल होगा । शिव जी कहते है – हे उमा! जिनकी कृपा से मोह छूट जाते है उनको कही स्वप्न में भी क्रोध हो सकता है? यह तो लीला मात्र है।

 

 

 

 

जिन्होंने श्री रघुनाथ जी के चरणों में प्रीति मान ली है वह ज्ञानी मुनि ही इस चरित्र को जानते है। लक्ष्मण जी ने जब प्रभु को क्रोध युक्त जाना।

 

 

 

 

18- दोहा का अर्थ-

 

 

 

तब दया की सीमा श्री रघुनाथ जी ने छोटे भाई लक्ष्मण जी को समझाया कि हे तात! सखा सुग्रीव को केवल भय दिखलाकर ले आओ।

 

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

यहां किष्किंधा नगरी में पवन कुमार श्री हनुमान जी ने विचार किया कि सुग्रीव ने श्री राम जी के कार्य को भुला दिया। उन्होंने सुग्रीव के पास जाकर चरणों में सिर नवाया “साम, दाम, दंड, भेद” चारो प्रकार की नीति कहकर उन्हें समझाया।

 

 

 

 

हनुमान जी के वचन सुनकर सुग्रीव ने बहुत ही भय माना और कहा – विषय ने मेरे ज्ञान को हर लिया। अब हे पवन पुत्र! जहां-जहां वानरों के जूथ रहते है वहां दूतो के समूह को पठाओ।

 

 

 

 

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