J. Krishnamurthy Books Hindi Pdf / जिद्दू कृष्णमूर्ति पुस्तकें Pdf

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J Krishnamurti Books Hindi Pdf / जिद्दू कृष्णमूर्ति पुस्तकें Pdf

 

 

 

 

 

 

1- शिक्षा क्या है ?

 

2- ध्यान जे.कृष्णमूर्ति द्वारा लिखित

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान के विश्व रूप का दर्शन (पहले किसी ने न देखा) – भगवान कह रहे है – हे अर्जुन ! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर तुम्हे इस संसार में अपने परम विश्व रूप का दर्शन कराया है। इसके पूर्व अन्य ने इस असीम तथा तेजोमय रूप को कभी नहीं देखा था।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – अर्जुन से पूर्व भगवान के इस विश्व रूप का किसी ने दर्शन नहीं किया था। किन्तु जब अर्जुन को यह विश्व रूप दिखाया गया था तो स्वर्ग लोक तथा अन्य लोको के भक्त भी इसे देख सके।

 

 

 

 

दूसरे शब्दों में कृष्ण की कृपा से भगवान के सारे शिष्य भक्त उस विश्व रूप का दर्शन कर सके जिसे अर्जुन देख रहा था। सभी लोगो ने इस विश्व रूप को पहले कभी नहीं देखा था केवल अर्जुन के कारण ही वह इस विश्व रूप को देख पा रहे थे।

 

 

 

 

किसी ने टीका की है कि जब कृष्ण संधि का प्रस्ताव लेकर दुर्योधन के पास गए थे तो उसे भी इसी रूप का दर्शन कराया गया था।

 

 

 

 

दुर्योधन ने शांति का प्रस्ताव स्वीकार किया यह उसका परम दुर्भाग्य था। किन्तु कृष्ण ने उस समय अपने कुछ रूप दिखाए थे। किन्तु वह रूप अर्जुन को दिखाए गए इस रूप से सर्वथा भिन्न थे। यहां यह स्पष्ट कहा गया है कि इस रूप को पहले किसी ने नहीं देखा था।

 

 

 

 

 

48- दिव्य दृष्टि से ही (विराट स्वरुप) को देखना – भगवान कह रहे है – हे कुरु श्रेष्ठ ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्व रूप को किसी ने नहीं देखा क्योंकि मैं न तो वेदाध्यययन के द्वारा, न यज्ञ, दान, पुण्य या कठिन तपस्या के द्वारा ही इस रूप में संसार में देखा जा सकता हूँ।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – इस प्रसंग में दिव्य दृष्टि को भली भांति समझ लेना चाहिए। तो यह दिव्य दृष्टि किसके पास हो सकती है?दिव्य दृष्टि का अर्थ दैवी।

 

 

 

 

जब तक कोई देवता के रूप में दिव्यता प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती है, और देवता कौन है? वैदिक शास्त्रों का कथन है, जो भगवान विष्णु के भक्त है वह देवता है।

 

 

 

 

जो लोग सचमुच ही दिव्य है वह भगवान के विश्वरूप को देख सकते है। किन्तु कृष्ण शुद्ध बने बिना कोई दिव्य नहीं बन सकता है।

 

 

 

 

जो नास्तिक है, अर्थात जो भगवान विष्णु में विश्वास नहीं करते है या जो कृष्ण के निर्विशेष अंश को परमेश्वर मानते है उन्हें यह दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती है। ऐसा कैसे संभव हो सकता है कि कृष्ण का विरोध करने पर भी दिव्य दृष्टि प्राप्त हो सकती है।

 

 

 

 

किन्तु जो भक्त सचमुच दिव्य प्रकृति के है और जिन्हे दिव्य दृष्टि प्राप्त है वह भगवान के विश्व रूप का दर्शन अवश्य ही कर सकते है।

 

 

 

 

दिव्य बने बिना दिव्य दृष्टि प्राप्त नहीं की जा सकती है। दूसरे शब्दों में जिन्हे दिव्य दृष्टि प्राप्त है वह भी अर्जुन की तरह ही विश्व रूप देख सकते है।

 

 

 

 

किन्तु जो लोग (भक्त) सचमुच दिव्य दृष्टि के है और जिन्हे दिव्य दृष्टि प्राप्त है वह भगवान के इस विश्व रूप का दर्शन करने के लिए कदापि उत्सुक नहीं रहते है।

 

 

 

 

जैसा पिछले श्लोक में कहा गया है कि अर्जुन ने कृष्ण के चतुर्भुज रूप को देखने की इच्छा व्यक्त किया था क्योंकि वह विश्व रूप को देखकर सचमुच ही भयभीत हो उठा था।

 

 

 

 

 

ऐसे अनेक पुरुष है जो अवतारों की शृष्टि करते है। वह झूठे सामान्य व्यक्ति को अवतार मानते है किन्तु यह तो मूर्खता है। छद्म अवतार के समर्थक कह सकते है कि उन्होंने भी ईश्वर के दिव्य अवतार विश्व रूप को देखा है।

 

 

 

 

 

किन्तु यह स्वीकार्य करने योग्य नहीं है। हमे तो भगवद्गीता का अनुसरण करना चाहिए अन्यथा पूर्ण प्रामाणिक ज्ञान की कोई संभावना नहीं है।

 

 

 

 

 

यद्यपि भगवद्गीता को भगवत्तत्व का प्राथमिक अध्ययन माना जाता है। तो भी यह इतना पूर्ण है कि कौन क्या है इसका अंतर बताया जा सकता है

 

 

 

 

यहां पर स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि कृष्ण का भक्त बने बिना ईश्वर के विश्व रूप को नहीं देखा जा सकता है। अतः पहले कृष्ण का शुद्ध भक्त बनना होता है तभी कोई दावा कर सकता है कि वह विश्व रूप का दर्शन करा सकता है।

 

 

 

 

 

जिसे उसने देखा है। कृष्ण का भक्त कभी भी छद्म अवतारों को या उनके अनुयायियों को मान्यता नहीं देता है। इस तरह मनुष्य भले ही इन सारे कार्यो – तपस्या, दान, वेदाध्ययन आदि करे किन्तु जब तक वह अर्जुन की भांति भक्त नहीं होता तब तक वह विश्व रूप का दर्शन कदापि नहीं कर सकता है।

 

 

 

 

 

इस श्लोक में कुछ महत्व पूर्ण शब्द है। जो वेदो तथा यज्ञ अनुष्ठानो से संबंधित विषयो के अध्ययन का निर्देश करता है। वेदो का अर्थ है समस्त प्रकार का वैदिक साहित्य यथा चारो वेद (ऋग, यजु, साम तथा अथर्व) एवं अठारहो पुराण सारे उपनिषद तथा वेदांत सूत्र।

 

 

 

 

मनुष्य इन सबका अध्ययन चाहे घर में करे या अन्यत्र। दानैः सुपात्र को दान देने का अर्थ में आया है। जैसे वह लोग जो भगवान की प्रेमाभक्ति में लगे रहते है यथा ब्राह्मण तथा वैष्णव।

 

 

 

 

इसी प्रकार क्रिया में शब्द अग्निहोत्र के लिए है और विभिन्न वर्णो में कर्मो का सूचक है। इसी प्रकार यज्ञ विधि करने के अनेक सूत्र है – (कल्प सूत्र तथा मीमांस सूत्र) तपस्या में शारीरिक कष्टों को स्वेच्छा से अंगीकार किया जाता है उसे ही तपस्या कहते है।

 

 

 

 

 

निर्विशेषवादी भी कल्पना करते है कि वह भगवान के विश्व रूप के दर्शन कर रहे है किन्तु भगवद्गीता से हम जानते है कि निर्विशेषवादी भक्त नहीं है।

 

 

 

 

 

फलस्वरूप वह भगवान के विश्व रूप को नहीं देख सकते है। भगवान अपने शुद्ध भक्तो को (जो अर्जुन की तरह होते है) ही अपने विश्व रूप का दर्शन देते है।

 

 

 

 

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