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Itihas Kya Hai Pdf / इतिहास क्या है pdf Download

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Itihas Kya Hai Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Itihas Kya Hai Pdf download कर सकते हैं और आप यहां से Panchtantra ki Kahani in Hindi Pdf कर सकते हैं।

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Itihas Kya Hai Pdf Download

 

 

 

पुस्तक का नाम  Itihas Kya Hai Pdf
पुस्तक के लेखक  इस्मत चुगताई 
फॉर्मेट  Pdf 
भाषा  हिंदी 
साइज  3.5 Mb 
श्रेणी  इतिहास 
पृष्ठ  185 

 

 

 

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Itihas Kya Hai Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

इससे उन्हें तत्काल महान ज्ञान की प्राप्ति हो गयी। फिर तो मेना देवी प्रिय वचनो द्वारा भक्ति भाव से अपने सामने खड़ी हुई कालिका की स्तुति करने लगी। मेना बोली – जो महामाया जगत को धारण करने वाली चंडिका, लोकधारिणी तथा सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थो को देने वाली है उन महादेवी को मैं प्रणाम करती हूँ।

 

 

 

जो नित्य आनंद प्रदान करने वाली माया, योगनिद्रा, जगज्जननी तथा सुंदर कमलो की माला से अलंकृत है उन नित्य सिद्धा उमादेवी को मैं नमस्कार करती हूँ। जो सबकी मातामही, नित्य आनंदमयी, भक्तो के शोक को दूर करने वाली तथा कल्पपर्यन्त नारियो एवं प्राणियों की बुद्धिरूपिणी है उन देवी को मैं प्रणाम करती हूँ।

 

 

 

आप यतियों के अज्ञानमय बंधन के नाश की हेतुभूता ब्रह्मविद्या है। फिर मुझ जैसी नारियां आपके प्रभाव का क्या वर्णन कर सकती है। अथर्ववेद की जो हिंसा है वह आप ही है। देवी! आप मेरे अभीष्ट फल को सदा प्रदान कीजिए। भावहीन तथा अदृश्य नित्यानित्य तन्मात्राओ से आप ही पंचभूतों के समुदाय को संयुक्त करती है।

 

 

 

आपका स्वरुप नित्य है। आप समय-समय पर योगयुक्त एवं समर्थ नारी के रूप में प्रकट होती है। आप ही जगत की योनि और आधार शक्ति है। आप ही प्राकृत तत्वो से परे नित्या प्रकृति कही गयी है। जिसके द्वारा ब्रह्म के स्वरुप को वश में किया जाता है। वह नित्या विद्या आप ही है।

 

 

 

मातः! आज मुझपर प्रसन्न होइए। आप ही अग्नि के अंदर व्याप्त उग्र दाहि का शक्ति है। आप ही सूर्य किरणों में स्थित प्रकाशिका शक्ति है। चन्द्रमा में जो आह्लादिका शक्ति है वह भी आप ही है। ऐसी आप चंडी देवी का मैं स्तवन और वंदन करती हूँ। आप स्त्रियों को बहुत प्रिय है।

 

 

 

ऊर्ध्वरेता ब्रह्मचारियों की ध्येयभूता नित्या ब्रह्मशक्ति भी आप ही है। सम्पूर्ण जगत की वांछा तथा श्रीहरि की माया भी आप ही है। जो देवी इच्छानुसार रूप धारण करके सृष्टि पालन और संहारमयी हो उन कार्यो का सम्पादन करती है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र के शरीर की भी हेतुभूता है वे आप ही है।

 

 

 

आज आप मुझ पर प्रसन्न हो। आपको पुनः मेरा नमस्कार है। ब्रह्मा जी कहते है – नारद! मेना के इस प्रकार स्तुति करने पर दुर्गा कालिका ने पुनः उन मेना देवी से कहा – तुम अपना मनोवांछित वर मांग लो। हिमाचल प्रिये! तुम मुझे प्राणो के समान प्यारी हो। तुम्हारी जो इच्छा हो वर मांगो।

 

 

 

उसे मैं निश्चय ही दे दूंगी। तुम्हारे लिए मुझे कुछ भी अदेय नहीं है। महेश्वरी उमा का यह अमृत के समान मधुर वचन सुनकर हिमगिरि कामिनी मेना बहुत संतुष्ट हुई और इस प्रकार बोली – शिवे! आपकी जय हो, जय हो। उत्कृष्ट ज्ञान वाली महेश्वरी! जगदंबिके! यदि मैं वर पाने के योग्य हूँ तो फिर आपसे श्रेष्ठ वर मांगती हूँ।

 

 

 

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