Indian Map Pdf in Hindi / इंडिया मैप इन हिंदी Pdf

नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Indian Map Pdf in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Indian Map Pdf Download कर सकते हैं।

 

 

 

Indian Map Pdf in Hindi / इंडिया पॉलिटिकल मैप इन हिंदी PDF

 

 

 

Indian Map Pdf Download in Hindi

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्री कृष्ण यहां अर्जुन को समझाते हुए कहते है- चूँकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों से परे हूँ और चूंकि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, अतएव मैं इस जगत में तथा वेदो में परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ।

 

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – “शरीर से निकलकर परम आत्मा का प्रवेश निराकार ब्रह्म ज्योति में होता है। तब वे अपने आध्यात्मिक स्वरुप में बने रहते है। यह परम आत्मा ही परम पुरुष कहलाता है।” उस परम पुरुष का एक स्वरुप है अन्तर्यामी परमात्मा? भगवान के अन्तर्यामी परमात्मा स्वरुप का भी वेदो में वर्णन हुआ है।

 

 

 

 

 

निम्नलिखित श्लोक वेदो में (छान्दोग्य उपनिषद 8,12,13) आया है – इसका अर्थ यह हुआ कि परम पुरुष अपना आध्यात्मिक तेज प्रकट करते तथा प्रसारित करते रहते है और यही चरम प्रकाश है, इसे ही चरम प्रकाश कहते है। भगवान सत्यवती तथा पराशर के पुत्र रूप में अवतार ग्रहण कर व्यास देव के रूप में वैदिक ज्ञान की व्याख्या करते है।

 

 

 

 

यह सोचना एकदम ही गलत है भगवान तथा जीव समान स्तर पर है या सब प्रकार से एक समान है। इनके व्यक्तित्वों में सदैव ही श्रेष्ठता तथा निम्नता बनी रहती है, यहां उत्तम शब्द की सार्थकता इस बात से है कि भगवान से बढ़कर कोई नहीं है, न तो बद्ध जीव न तो मुक्त जीव, भगवान कृष्ण से बढ़कर कोई भी नहीं है।

 

 

 

 

अतएव वे ही पुरुषोत्तम है, अतः यहां अब स्पष्ट हो चुका है कि जीव तथा भगवान व्यष्टि है। दोनों में अंतर सिर्फ इतना है कि जीव शक्ति में भगवान की अकल्पनीय शक्तियों से बढ़कर कदापि नहीं हो सकता है।

 

 

 

 

 

चाहे वह (जीव) बद्ध अवस्था में रहे या फिर मुक्त अवस्था में, भगवान और जीव को इसी प्रकार से समझा जा सकता है। यहां लोके शब्द “पौरुष आगम (स्मृति-शास्त्र) में” के लिए प्रयुक्त हुआ है।

 

 

 

 

 

19- भगवान की पूर्ण भक्ति में रत (सब कुछ जानने वाला) – श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है कि जो कोई भी मुझे संसय रहित होकर पुरुषोत्तम भगवान के रूप में जानता है वह सब कुछ जानने वाला है। अतएव हे भरत पुत्र! वह व्यक्ति मेरी भक्ति में पूर्ण रत होता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां भजति शब्द अत्यंत सार्थक है। कई स्थानों पर भजति का संबंध भगवान की सेवा के अर्थ में व्यक्त हुआ है।

 

 

 

 

यदि कोई व्यक्ति पूर्ण कृष्ण भावनामृत में रत है अर्थात भगवान की भक्ति करता है तो यह समझना चाहिए कि उसने सारा वैदिक ज्ञान समझ लिया है।

 

 

 

 

जीव तथा भगवान की स्वाभाविक स्थिति के विषय में अनेक दार्शनिक उहापोह की स्थिति में रहते है, यहां इस श्लोक में भगवान स्पष्ट बताते है कि जो भी जीव भगवान कृष्ण को परम पुरुष के रूप में जानता है वह सारी वस्तुओ का ज्ञाता है।

 

 

 

 

वैष्णव परंपरा में यह कहा जाता है कि यदि कोई कृष्ण भक्ति में लगा रहता है तो उसे भगवान को जानने के लिए अन्य किसी भी आध्यात्मिक विधि की कोई भी आवश्यकता नहीं रहती है।

 

 

 

 

भगवान की भक्ति के कारण ही वह पहले से ही लक्ष्य तक पहुंचा हुआ रहता है। वह ज्ञान की सभी प्रारंभिक विधियों को पार कर चुका होता है।

 

 

 

 

लेकिन यदि कोई लाखो जन्मो तक चिंतन करने पर भी उस परम लक्ष्य तक चिंतन करने पर भी उस परम लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता कि श्री कृष्ण ही भगवान है और उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए तो उसका अनेकानेक जन्मो का चिंतन करना व्यर्थ है।

 

 

 

 

वैदिक ज्ञान श्रुति कहलाता है जिसका अर्थ है श्रवण करके सीखना। वास्तव में वैदिक सूचना कृष्ण तथा उनके प्रतिनिधियों जैसे अधिकारियो से ग्रहण करनी चाहिए।

 

 

 

 

लेकिन अपूर्ण ज्ञाता परम सत्य के विषय में केवल चिंतन ही करता रहता है। जबकि पूर्ण ज्ञाता समय का अवव्यय किये बिना ही सीधे कृष्ण भावनामृत में लग जाता है अर्थात भगवान की भक्ति करने लगता है।

 

 

 

 

सम्पूर्ण भगवद्गीता में पग-पग पर भक्ति पर बल दिया गया है अर्थात भक्ति करने पर प्रकाश डाला गया है फिर भी भगवद्गीता के अनेक ऐसे कट्टर भाष्यकार है जो परमेश्वर तथा जीव को एक ही मानते है जो परमेश्वर तथा जीव को एक ही मानते है।

 

 

 

 

मनुष्य को विनीत भाव से ही भगवद्गीता से सुनना चाहिए कि सारे जीव सदैव ही भगवान के अधीन है, यहां कृष्ण ने हर वस्तु का अंतर सुंदर ढंग से बताया है।

 

 

 

 

अतः इसी श्रोत से सुनना चाहिए। लेकिन केवल सूकरो की तरह सुनना पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को चाहिए कि गुरु परंपरा के अधिकारियो से समझे, केवल शुष्क चिंतन करने से कोई लाभ नहीं। जो भी अधिकारियो से श्रीकृष्ण को समझने का प्रयास करता है तथा समझ लेता है। वही भगवान श्रीकृष्ण के कथनानुसार वेदो के प्रयोजन को समझता है अन्य कोई नहीं समझ सकता है।

 

 

 

 

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