India Map Pdf Download in Hindi / इंडिया मैप Pdf

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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

भगवान अर्जुन से कह रहे है जो समस्त परिस्थितियों में अविचलित भाव से पूर्ण भक्ति में प्रवृत्त होता है। वह तुरंत ही प्रकृति के गुणों को लाँघ जाता है और इस प्रकार ब्रह्म के स्तर तक पहुँच जाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – कृष्ण भावनामृत या कृष्ण-भक्ति में होने का अर्थ है कृष्ण के साथ समानता प्राप्त करना। भगवान कहते है कि उनकी प्रकृति सच्चिदानंद स्वरुप है और सारे जीव उस परम के अंश है।

 

 

 

 

जिस प्रकार सोने के कण सोने की खान के अंश होते है। इस प्रकार जीव अपनी आध्यात्मिक स्थिति में सोने के समान या कृष्ण के समान ही गुणवाला होता है किन्तु व्यक्तित्व का अंतर बना रहता है अन्यथा भक्तियोग का प्रश्न ही नहीं उठता है।

 

 

 

 

 

जैसा कि पहले बताया जा चुका है। यह सारा संसार भौतिक जगत ही प्रकृति के गुणों के चमत्कार के वशीभूत होकर उसके अंतर्गत कार्य कर रहा है।

 

 

 

 

यह श्लोक अर्जुन के तृतीय प्रश्न के उत्तर स्वरुप है। उसका प्रश्न है – दिव्य स्थिति प्राप्त करने का साधन क्या है? मनुष्य को गुणों के कर्मो से विचलित नहीं होना चाहिए उसे अपनी चेतना को ऐसे कार्यो में लगाना चाहिए कि जिससे कृष्ण के लिए कार्य सम्पन्न हो सके।

 

 

 

 

कृष्ण कार्य भक्तियोग के नाम से विख्यात है। भक्तियोग का अर्थ है कि – भगवान है, भक्त है, तथा भगवान और भक्त के बीच का प्रेम का आदान-प्रदान चलता रहता है।

 

 

 

 

इसमें न केवल कृष्ण ही आते है अपितु उनके पूर्णांश भी सम्मिलित है यथा – राम, नारायण आदि। उसके असंख्य अंश है, जो कोई भी कृष्ण के किसी भी रूप या उनके पूर्णांश की सेवा में प्रवृत्त होता है उसे दिव्य पद पर स्थित समझना चाहिए।

 

 

 

 

यदि कोई भगवान जैसे दिव्य स्तर पर स्थित नहीं है, तो वह भगवान की सेवा नहीं कर सकता है। अतः भगवान में और भक्त में दो व्यक्तियों का व्यक्तित्व वर्तमान रहता है अन्यथा भक्तियोग का कोई अर्थ नहीं है।

 

 

 

 

उदाहरण के लिए राजा का निजी सहायक बनने के लिए कुछ योग्यताये आवश्यक होती है। इसी तरह से भगवत सेवा के लिए योग्यता है कि ब्रह्म बना जाय या कि भौतिक कल्मष से मुक्त हुआ जाय।

 

 

 

 

यह ध्यान देना कि कृष्ण के सारे रूप पूर्णतया दिव्य और सच्चिदानंद स्वरुप है। ईश्वर के ऐसे रूप सर्वशक्तिमान तथा सर्वज्ञ होते है और उनमे समस्त प्रकार के दिव्य गुण पाए जाते है।

 

 

 

 

अतएव कोई कृष्ण या उनके पूर्णांशों की सेवा में दृढ संकल्प के साथ प्रवृत्त होता है तो वह प्रकृति के तीनो गुणों को आसानी से जीत सकता है अन्यथा उन तीनो गुणों को जीत पाना संभव ही नहीं है।

 

 

 

 

वैदिक साहित्य में कहा गया है कि गुणात्मक रूप से मनुष्य को ब्रह्म से एकाकार हो जाना चाहिए। लेकिन ब्रह्मत्व प्राप्त करने पर मनुष्य व्यष्टि आत्मा के रूप में अपने शाश्वत ब्रह्म स्वरुप को नहीं खोता है। कृष्ण की शरण में जाने से मनुष्य तुरंत ही प्रकृति के गुणों के प्रभाव को लाँघ सकता है। इसकी व्याख्या सातवे अध्याय में की जा चुकी है।

 

 

 

 

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