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10 + Hindi Poem Pdf Free Download / हिंदी कविता Pdf Free

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मित्रों इस पोस्ट में Hindi Poem Pdf Free दिया जा रहा है। आप नीचे की लिंक से Hindi Poem Pdf Free Download कर सकते हैं और आप यहां से  ग्राम श्री कविता pdf download कर सकते हैं।

 

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Hindi Poem Pdf Free Download

 

 

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यशोधरा कविता पीडीएफ Yashodhara Maithili Sharan Gupt Pdf Free Download 
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साकेत Poem Pdf
साकेत Poem Pdf Download
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जयद्रथ - वध pdf
जयद्रथ – वध Pdf Download
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द्वापर Poem Pdf Download
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रोटी का राग pdf
रोटी का राग pdf Download
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Subhadra Kumari Chauhan Poems in Hindi Pdf

 

 

1- गृह विधान 

 

2- मुकुल 

 

3- खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी 

 

4- फूलों का गुच्छा 

 

5- जलियांवाला बाग़ में बसंत 

 

6- दो सखियाँ 

 

7- कदंब का पेड़ 

 

 

हिंदी कविता Pdf Free

 

 

1- हजार पहेलियां 

 

2- देखो बेटी बादल आये 

 

3- रुक नदी 

 

4- शमशेर की कविता 

 

5- भूल नहीं पाया हूँ। 

 

 

 

गीता सार सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

संजय ने कहा – इस प्रकार कहने के बाद शत्रुओ का दमन करने वाला अर्जुन कृष्ण से बोला “हे गोविन्द ! मैं युद्ध नहीं करूँगा” और चुप हो गया।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – धृतराष्ट्र को यह जानकर परम प्रसन्नता हुई होगी कि अर्जुन युद्ध न करके युद्ध भूमि छोड़कर भिक्षाटन करने जा रहा है। कुछ समय के लिए अर्जुन अपने मिथ्या पारिवारिक स्नेह के प्रति मिथ्या शोक से अभिभूत था। किन्तु उसने शिष्य रूप में अपने गुरु की शरण ग्रहण कर लिया था। किन्तु संजय ने धृतराष्ट्र को पुनः यह कहकर निराश कर दिया था कि अर्जुन अपने शत्रुओ को मारने में सक्षम है (परन्तपः) श्री कृष्ण की शरण ग्रहण करने से अर्जुन शीघ्र ही शोक से मुक्त हो जाएगा और आत्मसाक्षात्कार या कृष्ण भावनामृत के पूर्ण ज्ञान से प्रकाशित होकर पुनः युद्ध करेगा। इस तरह से धृतराष्ट्र का सारा हर्ष भंग हो जाएगा।

 

 

 

 

10- कृष्ण को गुरु रूप में अंगीकार करना (अर्जुन के लिए) – संजय ने कहा – हे भरत वंशी (धृतराष्ट्र) ! उस समय दोनों सेनाओ के मध्य शोकमग्न अर्जुन से कृष्ण ने मानो हँसते हुए शब्द कहे।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – दो घनिष्ठ मित्रो अर्थात हृषिकेश तथा गुडाकेश के मध्य वार्ता चल रही थी। मित्र के रूप में दोनों का पद समान था। किन्तु इनमे से एक स्वेच्छा से दूसरे का शिष्य बन गया था। कृष्ण हंस रहे थे क्योंकि उनका मित्र अब उनका शिष्य बन गया तह। जब कृष्ण को गुरु के रूप में अंगीकार कर लिया गया तो उन्होंने तुरंत गुरु की भूमिका निभाने के लिए शिष्य से गुरु की भांति गंभीरता पूर्वक बातें की जैसा कि अपेक्षित है। सबके स्वामी होने के कारण ही कृष्ण सदैव श्रेष्ठ पद पर रहते है तो भी भगवान अपने भक्त के लिए सखा, पुत्र या प्रेमी बनना स्वीकार करते है। ऐसा प्रतीत होता है कि गुरु तथा शिष्य की यह वार्ता दोनों सेनाओ की उपस्थिति में हुई थी जिससे सभी लोग लाभान्वित हुए थे। अतः भगवद्गीता का संवाद किसी एक व्यक्ति समाज जाति के लिए नहीं अपितु सभी लोगो के लिए है और उसे सुनने के लिए शत्रु या मित्र समान रूप से अधिकारी है।

 

 

 

 

 

11- किसी भी अवस्था में शरीर के लिए शोक नहीं करना – श्री भगवान ने कहा – तुम पांडित्य पूर्ण वचन कहते हुए उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं है। जो विद्वान होते है वह न तो जीवित के लिए न तो मृत के लिए ही शोक करते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान ने तत्काल ही गुरु का पद संभाला और अपने शिष्य को अप्रत्यक्षतः मुर्ख कहकर डांटा उन का तर्क था कि राजनितिक या समाजनीति की अपेक्षा धर्म को अधिक मिलना चाहिए किन्तु उसे यह ज्ञान नहीं था कि पदार्थ, आत्मा तथा परमेश्वर का ज्ञान धार्मिक सूत्रों से भी अधिक महत्वपूर्ण है। कृष्ण ने कहा “तुम विद्वान की तरह बातें करते हो किन्तु तुम यह नहीं कि जो विद्वान होता है। अर्थात जो यह जनता है कि शरीर तथा आत्मा क्या है – वह किसी भी अवस्था में शरीर के लिए चाहे वह जीवित हो या मृत -शोक नहीं करता।” अगले अध्याय से यह स्पष्ट हो जाएगा कि ज्ञान का अर्थ पदार्थ तथा आत्मा एवं इन दोनों के नियामक को जानना है। चूंकि अर्जुन में ज्ञान का अभाव था अतः उसे विद्वान नहीं बनना चाहिए था और वह अत्यधिक विद्वान नहीं था इसलिए शोक के सर्वथा अयोग्य वस्तु के लिए शोक कर रहा था। यह शरीर जन्म लेता है और आज या कल इसका विनाश निश्चित है अतः शरीर उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आत्मा महत्वपूर्ण है। जो इस तथ्य को जनता है वही असली विद्वान है और उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं है।

 

 

 

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