Hindi Natak Ka Udbhav Aur Vikas Pdf / हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास Pdf

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Hindi Natak Ka Udbhav Aur Vikas Pdf / हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास Pdf

 

 

 

हिन्दी नाटक का उद्भव और विकास Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्रीकृष्ण अर्जुन को तपस्या के भेद बताते हुए कहते है कि परमेश्वर, ब्राह्मण, माता-पिता जैसे गुरुजनो की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां पर भगवान श्रीकृष्ण तपस्या के भेद बताते है। सर्वप्रथम वह शारीरिक तपस्या का वर्णन करते है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने को आंतरिक तथा बाह्य रूप से शुद्ध करने का प्रयास करे और शुद्ध रूप से अभ्यास करता रहे और अपने आचरण में सरलता लाना सीखे।

 

 

 

 

मनुष्य को ऐसा होने का प्रयास करना चाहिए कि वह ईश्वर या देव, योग्य ब्राह्मणो, गुरु तथा माता-पिता जैसे गुरुजनो या वैदिक ज्ञान में पारंगत व्यक्ति को प्रणाम करे या प्रणाम करना सीखे।

 

 

 

 

उसे कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए कि जो शास्त्र के विरुद्ध हो, उसे वैवाहिक जीवन के अतिरिक्त मैथुन में रत नहीं होना चाहिए। केवल वैवाहिक जीवन की अनुमति शास्त्रों में नहीं है और अतिरिक्त शास्त्र सम्मत भी नहीं है और यही ब्रह्मचर्य कहलाता है उपरोक्त सभी बातें तपस्या कहलाती है।

 

 

 

 

15- वाणी की तपस्या (सच्चे, हितकर वाक्य) – श्रीकृष्ण अर्जुन को अब वाणी की तपस्या बताते हुए कहते है कि सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यो को क्षुब्ध न करने वाले वाक्य बोलना चाहिए और वैदिक साहित्य का नियमित परायण करना चाहिए, यही वाणी तपस्या है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – आध्यात्मिक क्षेत्रो में बोलने की विधि यह है कि जो भी कहा जाय वह शास्त्र सम्मत हो। उसे तुरंत ही अपने कथन की पुष्टि के लिए शास्त्रों का प्रमाण देना चाहिए। ऐसी विवेचना से मानव समाज का उत्थान तथा सर्वोच्च लाभ प्राप्त होता है। मनुष्य को दूसरों के मन को क्षुब्ध करने वाला वाक्य बोलना चाहिए।

 

 

 

 

निःसंदेह जब शिक्षक अपने विद्यार्थियों से बोले तो वह अपने विद्यार्थियों को उपदेश देने के लिए सत्य बोल सकता है। लेकिन उसी शिक्षक को चाहिए कि यदि वह उनसे बोले जो उसके विद्यार्थी नहीं है तो उनसे ऐसा कदापि न बोले कि उनके मन क्षुब्ध हो जाये। इसके अतिरिक्त प्रलाप (व्यर्थ की वार्ता) नहीं करना चाहिए। वैदिक साहित्य का विपुल भंडार है और इसका अध्ययन करना चाहिए, यही वाणी की तपस्या, उपरोक्त सभी बातें वाणी की तपस्या है।

 

 

 

 

16- मन की तपस्या (आत्म-संयम, जीवन की शुद्धि) – श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि संतोष, सरलता, गंभीरता, आत्मसंयम एवं जीवन की शुद्धि यह सब मन की तपस्या है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – इन्द्रिय भोग के विचारो से मन को अलग रख करके ही मन की तुष्टि प्राप्त की जा सकती है। कोई भी इन्द्रिय भोग के बारे जितना सोचता है उतना ही उसका मन अतृप्त होता जाता है।

 

 

 

 

इस वर्तमान युग में मनुष्य व्यर्थ में ही अनेक प्रकार के इन्द्रिय तृप्ति के के साधनो में लगाए रखता है जिससे मन को संतुष्टि प्रदान नहीं होती है। अतएव मनुष्य का परम कर्तव्य है कि मन को संतोष प्रदान करने वाले वैदिक साहित्य की तरफ मोड़ा जाए जिससे उसे ज्ञान तो प्राप्त होगा ही और उसका कल्याण भी उसी में निहित है ऐसे साहित्य में क्रमशः पुराण, रामायण, महाभारत इत्यादि आते है। कोई भी इनमे वर्णित ज्ञान की बातो को ग्रहण करके लाभ उठा सकता है।

 

 

 

 

मन को संयत्रित बनाने का अर्थ है उसे इन्द्रिय तृप्ति से विलग करना। उसे इस तरह से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि जिससे उसकी दिशा परोपकार्य की तरफ मुड़ जाये।

 

 

 

मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचारो की श्रेष्ठता है। मनुष्य को कृष्ण भावनामृत से कभी विचलित नहीं होना चाहिए और इन्द्रियों की तृप्ति के साधन का परित्याग करना चाहिए।

 

 

 

 

अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना ही कृष्ण भावनाभावित है। मन को छल-कपट से मुक्त होना चाहिए और सर्व कल्याण के विषय में सोचना चाहिए।

 

 

 

मौन (गंभीरता) का अर्थ है कि मनुष्य निरंतर आत्म-साक्षात्कार के विषय में सोचता रहे। कृष्ण भावनाभावित व्यक्ति के पूर्ण मौन धारण करने का यही रहस्य है।

 

 

 

 

मननिग्रह का अर्थ है कि मन को इन्द्रिय भोग से पृथक करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में निष्कपट होना चाहिए और इस तरह उसे अपने जीवन (भाव) को शुद्ध बनाना चाहिए। यही सब गुण तपस्या के अंतर्गत आते है।

 

 

 

 

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