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Hawaldar Bahadur Comics Pdf / हवलदार बहादुर कॉमिक्स Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Hawaldar Bahadur Comics Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Hawaldar Bahadur Comics Pdf कर सकते हैं और आप यहां से Sanskrit Bharti Book Pdf कर सकते हैं।

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Hawaldar Bahadur Comics Pdf Download

 

 

 

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Hawaldar Bahadur Comics Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

ब्रह्मा जी कहते है – मुने! उधर सती ने आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को उपवास करके भक्ति भाव से सर्वेश्वर शिव का पूजन किया।

 

 

 

 

इस प्रकार नंदा व्रत पूरा होने पर नवमी तिथि को दिन में ध्यान मग्न हुई सती को भगवान शंकर ने प्रत्यक्ष दर्शन दिया। उनका श्री विग्रह सर्वांग सुंदर एवं गौर वर्ण था। उनके पांच मुख थे और प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र थे। भलदेश में चन्द्रमा शोभा दे रहा था।

 

 

 

 

उनका चित्त प्रसन्न था और कंठ में नील चिन्ह दृष्टिगोचर होता था। उन्होंने हाथो में त्रिशूल, वर, ब्रह्मकपाल और अभय धारण कर रखे थे। भस्ममय अंगराग से उनका सारा शरीर उद्धासित हो रहा था। गंगा जी उनके मस्तक की शोभा बढ़ा रही थी। उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे।

 

 

 

 

वे महान लावण्य की धाम जान पड़ते थे। उनके मुख करोड़ो चन्द्रमाओं के समान प्रकाशमान एवं आह्लादजनक थे। उनकी अंगकान्ति करोडो कामदेवों को तिरस्कृत कर रही थी तथा उनकी आकृति स्त्रियो के लिए सर्वथा ही प्रिय थी। सती ने ऐसे सौंदर्य माधुर्य से युक्त प्रभु महादेव जी को प्रत्यक्ष देखकर उनके चरणों की वंदना की।

 

 

 

 

उस समय उनका मुख लज्जा से झुका हुआ था। तपस्या के पुंज का फल प्रदान करने वाले महादेव जी उन्ही के लिए कठोर व्रत धारण करने वाली सती को पत्नी बनाने के लिए प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए भी उनसे इस प्रकार बोले – उत्तम  करने वाली दक्ष नंदिनी! मैं तुम्हारे इस व्रत से प्रसन्न हूँ। इसलिए कोई वर मांगो।

 

 

 

 

तुम्हारे मन को जो अभीष्ट होगा वही वर मैं तुम्हे दूंगा। ब्रह्मा जी कहते है – मुने! जगदीश्वर महादेव जी यद्यपि सती के मनोभाव को जानते थे तो भी उनकी बात सुनने के लिए बोले – कोई वर मांगो। परन्तु सती लज्जा के अधीन हो गयी थी इसलिए उनके हृदय में जो बात थी।

 

 

 

 

उसे वे स्पष्ट शब्दों में नहीं कह सकी। उनका जो अभीष्ट मनोरथ था वह लज्जा से आच्छादित हो गया। प्राण वल्लभ शिव का प्रिय वचन सुनकर सती अत्यंत प्रेम में मग्न हो गयी। इस बात को जानकर भक्त वत्सल भगवान शंकर बड़े प्रसन्न हुए और शीघ्रतापूर्वक बारंबार कहने लगे – वर मांगो, वर मांगो।

 

 

 

 

सत्पुरुषों के आश्रय भूत अन्तर्यामी शंभु सती की भक्ति के वशीभूत हो गए थे। तब सती ने अपनी लज्जा को रोककर महादेव जी से कहा – वर देने वाले प्रभो! मुझे मेरी इच्छा के अनुसार वर दीजिए जो टल न सके। भक्त वत्सल शंकर भगवान ने देखा सती अपनी पूरी बात नहीं कह पा रही है।

 

 

 

 

तब वे स्वयं ही उनसे बोले – देवी! तुम मेरी भार्या हो जाओ। अपने अभीष्ट फल को प्रकट करने वाले उनके इस वचन को सुनकर आनंदमग्न हुई सती चुपचाप खड़ी रह गयी क्योंकि वे मनोवांछित वर पा चुकी थी। फिर दक्ष कन्या खुश हो दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुका भक्त वत्सल शंकर से बारंबार कहने लगी।

 

 

 

 

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