Hanuman Ank Pdf Free / हनुमान अंक पीडीऍफ़ फ्री डाउनलोड

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Hanuman Ank Pdf / हनुमान अंक पीडीऍफ़ डाउनलोड 

 

 

हनुमान अंक Pdf Download

 

 

 

 

 

 

 

सिर्फ पढ़ने के लिये 

 

 

 

श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि जो सुख आत्म-साक्षात्कार के प्रति अँधा है जो प्रारंभ से लेकर अंत तक मोह कारक है और जो निद्रा, आलस्य तथा मोह से उत्पन्न होता है वह तामसी कहलाता है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – तमोगुणी व्यक्ति के लिए सारी वस्तुए मोह (भ्रम) उत्पन्न करती है। तमोगुणी व्यक्ति न प्रारंभ सुख प्राप्त होता है न अंत में।

 

 

 

जो व्यक्ति आलस्य तथा निद्रा में सुख की अनुभूति करता है। वह निश्चय ही तमोगुणी है। रजोगुणी व्यक्ति के लिए प्रारंभ में कुछ क्षणिक सुख और अंत दुःख प्राप्त होता है।

 

 

 

 

लेकिन जो तमोगुणी व्यक्ति है उसे प्रारंभ में तथा अंत में दुःख ही दुःख प्राप्त होता है। जिस व्यक्ति को इस बात का कोई अनुमान नहीं रहता है कि किस प्रकार से कर्म किया जाय और किस प्रकार से नहीं वह भी तमोगुणी व्यक्ति होता है।

 

 

 

 

40- प्रकृति के तीन गुणों से बद्ध (स्वर्ग लोक, देवता, मनुष्य) – श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है। इस लोक में, स्वर्ग लोको में या देवताओ के मध्य में कोई भी ऐसा व्यक्ति विद्यमान नहीं है जो प्रकृति के तीन गुणों से मुक्त हो।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – भगवान इस श्लोक में, समस्त ब्रह्माण्ड में प्रकृति के तीनो गुणों का प्रभाव बताते हुए संक्षिप्त विवरण दे रहे है। भगवान के अनुसार स्वर्ग के देवता और अन्य देवताओ के बीच में या कि मनुष्यो के बीच मृत्यु लोक में भी ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो प्रकृति त्रिगुणो से अतीत हो अर्थात सभी लोग प्रकृति के गुणों से बद्ध है और प्रकृति का गुण सभी को बांधकर रखता है।

 

 

 

 

41- स्वभाव के द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद – श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि – हे परंतप ! ब्राह्मणो, क्षत्रियो, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद किया जाता है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – स्वभाव के द्वारा जो गुण उत्पन्न होता है उससे किसी भी मनुष्य या कि पशु या कि पुष्प इत्यादि की पहचान होती है और जब तक स्वभाव गुप्त रहता है तब तक किसी भी मनुष्य, पुष्प पक्षी में भेद कर पाना मुश्किल होता है।

 

 

 

 

जैसे क्षत्रिय का पुत्र है तो उसके अंदर निडरता अवश्य होगी। या वैश्य पुत्र है तो उसके अंदर विनयशीलता होगी क्योंकि वह बिना विनयशील के अपना व्यापार नहीं कर सकता है।

 

 

 

 

अगर ब्राह्मण पुत्र है तो वह किसी बात को सत्यता के साथ ही सबके सामने प्रस्तुत करेगा और अन्य के स्वभाव पर भी यह बात सही बैठती है जिससे उनके गुणों की पहचान द्वारा वर्गीकृत किया जाता है।

 

 

 

 

उदाहरणार्थ – गाय भी दूध देती है और बकरी भी दूध देती है। दोनों के दूध का रंग भी एक जैसा होता है। लेकिन उन दुग्ध का स्वभाव और गुण अलग-अलग होता है और विवेकशील के लिए उन दोनों में भेद करना कोई मुश्किल कार्य नहीं होता है।

 

 

 

कर्म के अनुसार (वर्ण) – श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि शांतिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता यह सारे स्वाभाविक गुण है जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते है।

 

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – यहां कर्म की प्रधानता पर प्रकाश डाला गया है और उपरोक्त कर्म जिसके अंदर विद्यमान रहता है वही ब्राह्मण है और ब्राह्मणो के गुण और कर्म को यहां भगवान द्वारा बताया गया है।

 

 

 

 

43- कर्म के अनुसार (क्षत्रिय वर्ण) – श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है कि – वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, उदारता तथा नेतृत्व यह सब क्षत्रियो के स्वाभाविक गुण है।

 

 

 

उपरोक्त शब्दों का तात्पर्य – प्राचीन काल में राजाओ की सेना में क्षत्रियो की संख्या अधिक होती थी और नेतृत्व क्षमता के कारण ही राजाओ मंत्री और सेनापति की बागडोर भी क्षत्रिय ही संभालते थे। एकाध अपवाद को छोड़कर।

 

 

 

 

इतिहास में कई उदाहरण प्राप्त होते है जब राजाओ ने अपने विरोधियो पर विजय प्राप्त करके भी उन्हें क्षमा दान दे दिया था। यह स्वाभाविक गुण क्षत्रियो में पाए जाते है।

 

 

 

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