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Best No 1 Gupt Hanuman Mantra Pdf / गुप्त हनुमान मंत्र Pdf

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नमस्कार मित्रों, इस पोस्ट में हम आपको Gupt Hanuman Mantra Pdf देने जा रहे हैं, आप नीचे की लिंक से Gupt Hanuman Mantra Pdf Download कर सकते हैं और आप यहां से  7 + हनुमान मंत्र Pdf Download कर सकते हैं।

 

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Gupt Hanuman Mantra Pdf 

 

 

 

पुस्तक का नाम गुप्त हनुमान मंत्र
भाषा संस्कृत, हिंदी 
श्रेणी धार्मिक, मंत्र 
साइज 0.81 MB
फॉर्मेट Pdf
पृष्ठ 7

 

 

 

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Gupt Hanuman Mantra Pdf
गुप्त हनुमान मंत्र Pdf Download
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Panchasiddhantika Pdf In Hindi
पंचसिद्धांतिका Pdf Download
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गुप्त हनुमान मंत्र

 

 

 

दनुजवनकृशानुं, ज्ञानिनामग्रगण्यम्. – ओम नमो हनुमते रुद्रावतराय वज्रदेहाय वज्रनखाय वज्रसुखाय वज्ररोम्णे वज्रनेत्राय वज्रदंताय वज्रकराय वज्रभक्ताय रामदूताय स्वाहा. – ओम नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसहांरणाय सर्वरोगाय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा। 

 

 

 

Gupt Hanuman Mantra Pdf
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सिर्फ पढ़ने के लिए

 

 

 

शिव जिनका अहंकार है, ब्रह्मा बुद्धि है, चन्द्रमा मन है और विष्णु ही महान चित्त है। उन्ही चराचर रूप भगवान श्री राम जी ने मनुष्य रूप में निवास किया है। हे प्राणपति! सुनिए, ऐसा विचार कर प्रभु से बैर छोड़कर श्री रघुवीर जी के चरणों में प्रेम कीजिए जिससे कि मेरा सुहाग न जाय।

 

 

 

चौपाई का अर्थ-

 

 

 

पत्नी के वचन सुनकर रावण खूब हंसा और बोला – अहो! मोह ‘अज्ञान’ की महिमा बहुत बलवान है। स्त्री का स्वभाव सब सत्य ही कहते है उसके हृदय में आठ अवगुण सदा रहते है।

 

 

 

साहस, झूठ, चंचलता, छल, भय, अविवेक, मूर्खता अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रु का समग्र विराट रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया।

 

 

 

हे प्रिये! वह सब चराचर विश्व तो स्वभाव से ही मेरे वश में है। तेरी कृपा से ही मुझे अब यह समझ में आया है। हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया। तू इसी प्रकार से मेरी प्रभुता का बखान कर रही है।

 

 

 

हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ और रहस्य भरी है। समझने पर सुख देने वाली और सुनने से भय छुड़ाने वाली है। मंदोदरी ने मन ऐसा निश्चय कर लिया कि पति को काल वश मतिभ्रम हो गया है।

 

 

 

16- दोहा का अर्थ-

 

 

 

इस प्रकार अज्ञानता वश बहुत ही विनोद करते हुए रावण को सबेरा हो गया। तब स्वभाव से ही निडर और घमंड में अंधा लंकापति सभा में गया।

 

 

 

यद्यपि बादल अमृत के जैसा जल बरसाते है तो भी वेत फूलता-फलता नहीं है। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान ही ज्ञानी गुरु क्यों न मिले मुर्ख के हृदय में ज्ञान नहीं होता है।

 

 

 

नीति जाने बिना क्या राज्य रह सकता है? श्री हरि के चरित्र का वर्णन करने से क्या पाप रह सकते है? बिना पुण्य के क्या पवित्र यश प्राप्त हो सकता है? बिना पाप के भी क्या कोई अपयश प्राप्त कर सकता है? जिसकी महिमा वेद, संत और पुराण गाते है उस हरि भक्ति के समान क्या कोई दूसरा लाभ भी है?

 

 

 

हे भाई! क्या इस जगत में इससे बढ़कर कोई दूसरी हानि है कि मनुष्य का शरीर मिलने पर भी श्री राम जी का भजन न किया जाय? चुगलखोरी के समान क्या कोई दूसरा पाप है? हे गरुण जी! दया के समान क्या कोई दूसरा धर्म है? इस प्रकार मैं अगिनत युक्तियाँ मन में विचार करता था और आदर के साथ मुनि का उपदेश नहीं सुनता था।

 

 

 

जब मैने बार-बार सगुण का पक्ष स्थापित किया तब मुनि क्रोध युक्त वचन बोले – अरे मूढ़! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ तो भी तू उसे नहीं मानता और बहुत से उत्तर और दलीले लाकर रखता है। मेरे सत्य वचन पर विश्वास नहीं करता। कौए की भांति सभी से डरता है।

 

 

 

अरे मुर्ख! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बहुत भारी हठ है अतः तू शीघ्र पक्षी कौआ हो जा। मैंने आनंद के साथ मुनि के शाप को सिर पर धारण किया। उसे मुझे कुछ न भय हुआ न दीनता ही आई।

 

 

दोहा का अर्थ-

 

 

तब मैं तुरंत ही कौआ हो गया फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर और रघुकुल शिरोमणि श्री राम जी का स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला।

 

 

 

शिव जी कहते है – हे उमा! जो श्री राम जी के चरणों के प्रेमी है और काम, अभिमान तथा क्रोध से रहित है, वह सारे जगत को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते है फिर वह किससे बैर करे?

 

 

 

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